Sunday, April 5, 2026
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‘इंडिया’ का हिस्सा बनने का पूरा फायदा मिला सपा को

  • देश में इस बार कांग्रेस को लेकर मुस्लिम थे एकजुट
  • जनता का रुझान देख सपा सुप्रीमो ने किया समझौता

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: असली नेता वही होता है जो हवा का रुख पहचान ले और उसके मुताबिक अपनी सियासी पारी खेले। फिर उसे मुकद्दर का सिकंदर बनने से कोई नहीं रोक सकता है। अपने वालिद मरहूम मुलायम सिंह यादव जैसा ही कुछ ऐसा सियासी दांव अखिलेश यादव ने खेला और पहले ही दांव में तमाम सियासी दलों को चारों खाने चित्त कर दिया। अखिलेश ने मुस्लिमों में कांग्रेस को लेकर बढ़ रहे रुझान के बाद अपनी पार्टी को फिर से मजबूत करने के लिए जो फैसला लिया।
मेरठ में भले ही समाजवादी पार्टी ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन न किया हो,

लेकिन पूरे उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो कांग्रेस, आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर यूपी में चुनाव के लिए इस बार समाजवादी पार्टी ने इंडिया गठबंधन बनाया था। इससे पहले समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन था, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले रालोद सुप्रीमो जयंत चौधरी ने अखिलेश की साइकिल छोड़कर भाजपा के साथ समझौता कर लिया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर नजर डालें तो कैराना, नगीना, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, संभल सीट पर गठबंधन को आसानी से जीत नसीब हुई है।

कैराना में इकरा हसन ने पहले ही राउंड से जो बढ़त पकड़ी तो उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को आखिर तक पछाड़े रखा। उधर, मुजफ्फरनगर सीट पर हरेन्द्र मलिक और भाजपा के दो बार के सांसद संजीव बालियान में कांटे की टक्कर रही, लेकिन आखिर में बाजी हरेन्द्र मलिक के हाथ रही। सहारनपुर सीट में गठबंधन ने यहां कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद को उतारा था। उन्होंने बड़ी जीत हासिल करके गठबंधन की झोली में यह सीट डाल दी। मुरादाबाद सीट पर सपा प्रत्याशी रूचि वीरा ने पहले ही राउंड से जो बढ़त बनाई,

वह आखिर तक बाकी रही और उनके सिर ही जीत का सेहरा बंधा। संभल में जिया उर्रहमान बर्क के सामने अपने दादा मरहूम शफीकुर्रहमान बर्क की विरासत को बचाने की चुनौती थी। जबकि भाजपा से परमेश्वर लाल सैनी अपनी हारी हुई सीट को वापस लेने के लिए मजबूती से लड़ते हुए दिखाई दिए, लेकिन यहां आखिरकार जीत जियाउर्रहमान बर्क के खाते में गई।

मुस्लिमों में बसपा से नाराजगी का मिला फायदा

सपा और कांग्रेस के आगे बढ़ने की एक बड़ी वजह उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों का कांग्रेस के पक्ष में खुलकर मतदान करना रहा। मुसलमानों को लग रहा था कि बसपा को वोट देना सिर्फ भाजपा को ही मजबूत करना है। इसके चलते ही दलित वोटों का बसपा से दुराव और सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ जाना भी इसकी एक वजह रही।

हापुड़ की कमजोरी बनी हार का कारण: योगेश

मेरठ: मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट पर इंडिया गठबंधन की प्रत्याशी सुनीता वर्मा के पति योगेश वर्मा ने पत्नी की हार का कारण हापुड़ की कमजोरी रही। पत्रकारों से बातचीत में योगेश ने कहा कि सुनीता को इस लोकसभा चुनाव में शहर विधानसभा क्षेत्र से जबरदस्त बढ़त मिली, दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से भी भरपूर बढ़त मिली, इसी तरह किठौर विधानसभा क्षेत्र से भी जनता ने हमें बड़ी बढ़त दी। कैंट विधानसभा क्षेत्र भाजपा का शुरू से गढ़ रहा है।

इस क्षेत्र से भाजपा ने जबरदस्त बढ़त बनाई। हमें हापुड़ में अच्छी लीड मिली, लेकिन हम हापुड़ को पूरी तरह कवर नहीं कर पाए। मतगणना निष्पक्ष होने के सवाल पर योगेश वर्मा ने कहा कि मतगणना सही हुई है। कुछ मशीनें खराब हुर्इं। उनके वीवीपैट से निकली पर्चियों से गिनती की गई। अब जो पर्चियां निकलीं, उनकी गिनती की गई। हम इससे संतुष्ट हैं।

मतगणना केन्द्र पर पहुंची ही नहीं सुनीता वर्मा

मेरठ: मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट पर इंडिया गठबंधन प्रत्याशी सुनीता वर्मा शुरू से आखिर तक मतगणना केन्द्र पर नहीं पहुंची। सपा के साथ-साथ कांग्रेस के समर्थक भी उनका बेसब्री से इंतजार करते रहे, लेकिन सुनीता वर्मा आखिर तक नहीं आर्इं। इस बार मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट पर सपा गठबंधन ने पूर्व महापौर सुनीता वर्मा को चुनाव मैदान में उतारा। वैसे इस सीट पर हस्तिनापुर के पूर्व विधायक योगेश वर्मा दावेदार थे, लेकिन कुछ राजनीतिक कारणों से उनके स्थान पर सुनीता वर्मा को टिकट दिया गया।

सुनीता वर्मा के स्थान पर योगेश वर्मा सुबह सवेरे से ही मतगणना केन्द्र पर अपने समर्थकों के साथ मोर्चा संभाले हुए थे। जब 19वें चक्र में सुनीता वर्मा को 12 हजार वोटों से लीड बताई जाने लगी तो सुनीता वर्मा को मतगणना केन्द्र बुलाने का संदेश भेजा गया, लेकिन 23वें चक्र आते-आते हालात बदलने लगे तो सुनीता वर्मा को फिर आने से रोक दिया गया। आखिर नजीजा आने के बाद योगेश वर्मा ने जब पूर्ण चुनाव परिणाम आने से पहले ही अपनी हार स्वीकार कर ली तो सुनीता वर्मा को आने से मना कर दिया गया।

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