- चार से पांच हजार मरीज रोज आते हैं मेडिकल में इलाज के लिए
- एक एमआरआई मशीन और स्टॉफ की कमी से जूझ रहा विभाग
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में वैसे तो तमाम तरह की चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध है लेकिन यहां एमआरआई कराना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। रेडियो डाइग्नोस्टिक विभाग में जो मरीज एमआरआई के लिए पहुंच रहे हैं। उन्हें दो माह बाद का समय दिया जा रहा है। मेडिकल प्रशासन इसकी वजह स्टॉफ की कमी बता रहा है। बुधवार को एलएलआरएम कॉलेज के रेडियो डाइग्नोस्टिक विभाग में अल्ट्रासाउंड और एमआरआई कराने वाले मरीजों की खासी भीड़ नज़र आई। फिलहाल एमआरआई के लिए दो माह की वेटिंग चल रही है।
ऐसे में उन मरीजों को खासी परेशानी हो रही है जो यहां भर्ती है। हालांकि मेडिकल प्रशासन का दावा है कि ज्यादा गंभीर और इमरजेंसी में भर्ती मरीजों को एमआरआई के लिए एक सप्ताह का समय दिया जा रहा है। मेडिकल में एमआरआई कराने के लिए दो हजार रूपये की रसीद कटानी पड़ती है। जबकि निजी रेडियोलॉजी सेंटरों पर यह चार से साढेÞ चार हजार रूपये में होता है। ऐसे में निजी सेंटरो की तुलना में कम खर्च होने की वजह से ज्यादातर मरीज मेडिकल में ही एमआरआई कराते हैं। वहीं, मेडिकल के पास केवल एक एमआरआई मशीन है,
जबकि इसके लिए जरूरी स्टॉफ व टेक्निशियन की भी कमी है। मेडिकल के रेडियो डाइग्नोस्टिक विभाग में एक दिन में आठ से 10 एमआरआई ही हो पाते हैं। जबकि मरीजों की संख्या 100 से अधिक रहती है। ऐसे में इमरजेंसी के मरीजों को प्राथमिकता दी जा रही है। जबकि ओपीडी के मरीजों को दो माह बाद का समय दिया जा रहा है। यदि मेडिकल प्रशासन द्वारा एमआरआई मशीनों की संख्या बढ़ाई भी जाती है तो इसके लिए जरूरी स्टॉफ उपलब्ध नहीं है।

