- वोट प्रतिशत बढ़ा, कभी बसपा के साथ रहा समझौता तो कभी कांग्रेस का मिला साथ
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: लोकसभा चुनाव में सूबे में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरने वाली समाजवादी पार्टी मेरठ में कभी भी अव्वल पायदान पर नहीं आ सकी। वह हमेशा दोयम दर्जे की पार्टी ही बनकर रही। सांसद बनाने के लिए समाजवादी पार्टी को कभी बसपा का साथ लेना पड़ा, तो कभी रालोद के सहारे उसे अपनी चुनावी नैया को पार लगाने की कोशिश करनी पड़ी। और तो और कभी उसे हाथ का साथ लेना पड़ा। कुल मिलाकर मेरठ में समाजवादी पार्टी के जनाधार को बढ़ाने के लिए कभी भी यहां के नेताओं ने कोशिश नहीं की।
कहा जाता है कि दिल्ली का राजसिंहासन उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारे से होकर पहुंचता है। यहां जिस पार्टी को जनता का साथ मिलता है, वह आसानी से केन्द्र में अपनी सरकार बना लेता है। मेरठ की बात करें तो यहां आजादी के बाद तो मेरठ लोकसभा सीट पर आजादी से लेकर अब तक कुल 17 बार चुनाव हुए हैं। इनमें सबसे पहले वर्ष-1952, 1957 तथा 1962 में जनरल शाहनवाज खान ने जीत हासिल की थी। जनरल शाहनवाज कांग्रेस के टिकट पर चुनावी मैदान में थे और जीत का सेहरा उनके ही सिर बंधा था।
वर्ष-1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से महाराज सिंह भारती ने जीत का स्वाद चखा तो वर्ष 1971 में जनरल शाहनवाज फिर से कांग्रेस का टिकट पाकर मेरठ लोकसभा सीट से आसानी से जीत हासिल कर गये थे। इसके बाद जनता पार्टी के सहारे वर्ष-1977 में कैलाश प्रकाश को सांसद बनने का मौका मिला तो वर्ष-1980 तथा वर्ष 1984 में कांग्रेस ने फिर से यह सीट मोहसिना किदवई के सहारे जीत ली। मोहसिना किदवई भी मेरठ में पैराशूट प्रत्याशी के तौर पर ही आई थीं तथा जीत हासिल कर मेरठ के कांग्रेसियों को सबक दिया था कि उनकी गुटबंदी खत्म न हुई तो पार्टी बाहरी उम्मीदवारों को ही मौका देगी।
फिर वर्ष-1989 में हुए चुनाव में जनता दल के टिकट पर हरीश पाल को जीत हासिल हुई। वर्ष-1991 का चुनाव हिंसा के चलते रद्द कर दिया गया। इसके बाद वर्ष-1996 में हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर ठाकुर अमर पाल सिंह के सिर जीत का सेहरा बंधा। ठाकुर अमर पाल सिंह दोबारा वर्ष-1998 में हुए चुनाव में भाजपा के ही टिकट पर फिर से सांसद चुने गये। इसी बीच वर्ष-1999 का चुनाव हुआ तो कांग्रेस ने एक बार फिर से पैराशूट प्रत्याशी के तौर पर अवतार सिंह भड़ाना को मैदान में उतारा। भड़ाना की आंधी में सभी कयास धरे रह गये।
भड़ाना अपने साथ पूरी चुनावी टीम भी हरियाणा से ही लेकर आये थे। मेरठ वाले बताते हैं कि भड़ाना आंधी की तरह आये तथा सभी पार्टियां और उनके उम्मीदवार इस आंधी का सामना नहीं कर सके तथा भड़ाना जीत हासिल करके कामयाबी हासिल कर गये। इसके बाद वर्ष-2004 में चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने भी अपना खाता खोला तथा तब के मेयर रहे हाजी शाहिद अखलाक ने सांसद बनकर जीत हासिल की। इसके बाद वर्ष-2009, वर्ष-2014 तथा वर्ष 2019 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर राजेन्द्र अग्रवाल ने जीत हासिल की।
समाजवादी पार्टी ने मेरठ सीट पर सीधे अपना प्रत्याशी उतारा भी तो वह कोई दमदार प्रदर्शन नहीं कर सके। वर्ष-1999 में समाजवादी पार्टी को मेरठ में काफी पीछे रहना पड़ा तो वर्ष-2004 के चुनाव में भी पार्टी प्रत्याशी की फजीहत हुई। इसी तरह वर्ष-2009 तथा 2014 के चुनाव में भी समाजवादी पार्टी प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा। वर्ष-2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बसपा प्रत्याशी का समर्थन कर खुद को दूसरे दर्जे पर रहना साबित किया।
सात बार मेरठ को सांसद देने वाली कांग्रेस पार्टी ने इस बार खुद अपना प्रत्याशी न उतारकर समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया तथा यहां की सीट परोसकर समाजवादी पार्टी को दे दी। समाजवादी पार्टी इस बार बेहतर प्रदर्शन तो कर सकी, लेकिन वह दूसरी पायदान से ऊपर नहीं उठ सकी।
सपा का प्रदर्शन एक नजर में
वर्ष प्रत्याशी कुल प्रतिशत
2019 संयुक्त प्रत्याशी 47.80%
2014 शाहिद मंजूर 19.0%
2009 शाहिद मंजूर 25.22%
2004 समर्थन 24%
वर्ष-2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मेरठ सीट से अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था। बल्कि उसने यहां बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी हाजी याकूब कुरैशी को समर्थन दिया था। सपा-बसपा के संयुक्त गठबंधन की बदौलत यहां पार्टी को एकमुश्त 47.80 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। वर्ष-2014 के चुनाव में भाजपा की लहर के आगे समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी शाहिद मंजूर तीसरी पायदान पर खिसककर रह गये। उन्हें महज 25.22 प्रतिशत ही वोट हासिल हुए। जबकि वर्ष-2004 के चुनाव में भी पार्टी ने अपना प्रत्याशी न उतारकर जेडीयू प्रत्याशी केसी त्यागी को समर्थन दिया था तथा उसके खाते में जेडीयू को मिली 24 प्रतिशत वोटें ही गिनी जायेंगी।

