- कलयुग की रामायण: इस बार भी ‘रावण’ राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: राजनीति में देश के सबसे बड़े सिंहासन पर इस बार एक नया इतिहास बनने जा रहा है। पुराने दौर में राम और रावण को तो एक साथ बैठने का मौका भले ही न मिला हो, लेकिन इस बार की लोकसभा में राम और रावण को एक साथ न सिर्फ बैठने का मौका मिलेगा। बल्कि दोनों एक-दूसरे के बगलगीर होकर संविधान पर नुकता चीनी भी कर सकेंगे।
कहा जाता है कि देश की राजनीति का गलियारा उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। यहां सबसे ज्यादा जिस पार्टी के सांसद चुने जाते हैं। उसको ही सत्तासीन होने का मौका मिलता है। उत्तर प्रदेश में इस समय सबसे बड़ी राजनीतिक दल में शुमार समाजवादी पार्टी बनी है। लेकिन इंडिया गठबंधन में होने की वजह से उनको विपक्ष में बैठने का मौका मिल रहा है।
हां इस बार का विपक्ष पिछली बार की तरह कमजोर नहीं है। बल्कि यह विपक्ष भी इतना मजबूत है कि कुछ भी गलत होते देख वह उस कानून का न सिर्फ विरोध कर सकता है। बल्कि उस विधेयक को फेल करने की कुव्वत भी रखता है। इस बार जनता ने ऐसा करिश्मा कर दिया है कि सदन में एक ही छत के नीचे राम और रावण को एक साथ बैठने का मौका मिलेगा। मेरठ-हापुड़ लोकसभा से सांसद चुने गये भारतीय जनता पार्टी के नवनिर्वाचित सांसद अरुण गोविल के लिए सियासत बिल्कुल नई है,लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि टीवी के लोकप्रिय सीरियल रामायण में उन्होंने ‘राम’ का किरदार निभाया।
अरुण गोविल ने राम के नाम पर वोट बटोरीं और जनता ने भी उनका भरपूर साथ देकर राजनीति के सर्वोच्च मुकाम पर बैठा दिया। अब हम बात करें रावण उर्फ चन्द्रशेखर की। तो यह राजनीतिक कौशल के मंजे हुए खिलाड़ी हैं। आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चन्द्रशेखर उर्फ रावण को जनता ने मेरठ के बगल की बिजनौर जिले की नगीना लोकसभा सीट से सांसद चुना है। इस चुनाव में एक नये दलित नेता रावण ने डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज की है। यह जीत दलित वोटों में स्पष्ट बदलाव का संकेत है।
दलित बच्चों के लिए स्कूल चलाते हैं आधुनिक रावण
नगीना सीट से सांसद चुने गये चन्द्रशेखर उर्फ रावण बताते हैं कि उनकी टीम पश्चिमी यूपी के विभिन्न शहरों में दलित बच्चों के लिए स्कूल चलाती है। वह पीड़ित परिवारों को कानूनी मदद भी देते हैं। पूर्व सीएम मायावती ने कभी भी पीड़ित परिवारों तक पहुंचने की जहमत नहीं उठाई। रावण बेबाकी से कहते हैं कि हमारे समुदाय के लोग, खासकर युवा, धीरे-धीरे भीम आर्मी की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिसे आजाद समाज पार्टी के नाम से भी जाना जाता है. नगीना में अपने नेता चंद्रशेखर की जीत से खुश भीम आर्मी अब पूरे राज्य में अपना संगठन बनाने की योजना बना रहे हैं।
हार के बाद एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप
प्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी की तो मेरठ में फिर से फजीहत हुई है। इस बार अपने पक्ष में तमाम आंकलन व एकमत से वोटें मिलने के बाद भी हार मिलने से समाजवादी पार्टी के नेता सदमे में हैं, लेकिन एकजुट होने के बजाये यह नेता एक-दूसरे के उपर हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं। हालांकि एक पक्षीय वोटिंग होने के बाद भी दस हजार से अधिक वोटों से पार्टी प्रत्याशी की हार के बाद अब भी समीक्षा बैठक नहीं बुलाई जा रही है। पार्टी की ऐसी फजीहत देख सपा सुप्रीमो ने सख्त नाराजगी जताई है।
टिकट वितरण से पहले सपा अध्यक्ष ने पूरे प्रदेश में सर्वे कराया था। इस सर्वे में यह बात सामने आई थी कि कई सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन केवल मुस्लिम वोटों के सहारे ही जीत हासिल नहीं हो सकती है। यदि मुसलमानों के साथ-साथ दलित वर्ग की वोटें भी जुड़ जायेंगी तो ऐतिहासिक जीत मिल सकेगी। यही वजह रही कि सरधना विधायक अतुल प्रधान ने अपनी नजदीकियों के चलते जुगत भिड़ाकर मेरठ सीट पर टिकट तो हासिल कर लिया, लेकिन सपा अध्यक्ष ने तुरंत ही नामांकन के अंतिम दिन दलित वर्ग की सुनीता वर्मा को टिकट और सिंबल देकर अपने हवाई जहाज से मेरठ भेजा।
संदेश साफ था कि मेरठ सीट प्रतिष्ठा पूर्ण मानते हुए इस तरह के जातिगत आंकड़े लगाये गये थे कि आसानी से जीत हासिल हो जाये, लेकिन अपनी जीती हुई बाजी भी सपा नेता हार बैठे और अपने पक्ष में हवा होने के बावजूद सपा को मेरठ सीट पर हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में हार के बाद अब एक-दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ा जा रहा है। किसकी तरफ इशारा किया जा रहा है, सबको पता है, लेकिन खुलकर बोलने से सब बच रहे हैं कि कभी किसी की कोई बात पकड़ी जाये। उधर, अपने पक्ष में हवा होने के बाद भी हार मिलने से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव बेहद नाराज बताये जा रहे हैं।

