Saturday, April 25, 2026
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वोटरों के बदलते मिजाज को भांपने में चूक गए जयंत चौधरी!

  • जिसकी एवज में राष्ट्रीय लोकदल के हिस्से में दो सीट बागपत और बिजनौर आर्इं, जिन्हें उसने जीत भी लिया

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: जिस समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके राष्ट्रीय लोकदल विधानसभा में जीरो से नौ विधायकों तक पहुंचने में कामयाब रही, उसी का साथ छोड़कर लोकसभा चुनाव में भाजपा का दामन थाम लिया। जिसकी एवज में राष्ट्रीय लोकदल के हिस्से में दो सीट बागपत और बिजनौर आर्इं, जिन्हें उसने जीत भी लिया। लेकिन राजनीतिक जानकारों के अनुसार अगर जयंत चौधरी ने मतदाताओं का मिजाज भांप लिया होता, तो आज उसके सांसदों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती थी। 2017 के चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल के पास उत्तर प्रदेश में एक भी विधायक नहीं बचा था। हालांकि उसने छपरौली सीट जीती जरूर थी, लेकिन वहां चुने गए विधायक सतेन्द्र रमाला ने भाजपा का दामन थाम लिया था।

इसके बाद 2022 के चुनाव में जयंत चौधरी ने सपा के साथ गठबंधन किया। जिसका फायदा राष्ट्रीय लोकदल को यह मिला कि विधानसभा में उसके नौ विधायक चुने गए। इतना ही नहीं, सपा के दमखम पर खुद जयंत चौधरी भी राज्यसभा में पहुंच गए। इसके बाद लोकसभा चुनाव की तैयारी का सिलसिला शुरू हुआ। साल के शुरू तक समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच सीटों का बंटवारा लगभग फाइनल हो भी चुका था।

जिसमें जयंत चौधरी को सात सीटें आॅफर की गई थीं। कई स्थानों पर प्रत्याशियों की घोषणा भी लगभग हो चुकी थी। इसी बीच मतदाताओं के मिजाज को भांपने में विफल रहे जयंत चौधरी ने एकाएक पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया। इस गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल के हिस्से में बागपत और बिजनौर की सीटें आर्इं। चुनाव परिणाम के दृष्टिकोण से कर देखा जाए, तो इन दोनों ही सीटों पर विजय पताका फैलाकर राष्ट्रीय लोकदल ने 100 प्रतिशत सफलता हासिल कर ली है।

भारत रत्न देने का नहीं मिला राजनीतिक लाभ

भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन की घोषणा करते हुए उस समय जयंत चौधरी ने एक्स पर लिखा कि चौ. चरण सिंह को भारत रत्न देकर पीएम नरेन्द्र मोदी ने दिल जीत लिया। लेकिन इस गठबंधन के जरिये एक भी सीट सीधे तौर पर ऐसी नहीं रही, जिस पर जयंत चौधरी जाट वोटों को भाजपा के पक्ष में कराने में कामयाब रहे हों। हालांकि सपा को छोड़कर भाजपा से गठबंधन करने के पीछे रालोद नेताओं के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव के दौरान अपने ही उम्मीदवारों को रालोद का सिंबल दिए जाने की शर्त रखी।

यही बात लोकसभा चुनाव के दौरान देखने को मिली, जिसमें रालोद के हिस्से में कही जाने वाली कई प्रमुख सीटों पर अखिलेश यादव अपने ही प्रत्याशियों को रालोद के सिंबल से चुनाव लड़ाने पर जोर दे रहे थे। रालोद नेताओं का कहना है कि भाजपा से गठबंधन करके रालोद दोनों सीटों को जीतने के साथ-साथ कई तरह से फायदे में ही रहा है।

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