Thursday, May 7, 2026
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क्या भगवान भी पक्षपात करते हैं?

Sanskar 8

 


सत्यनारायण भटनागर

भक्त संसारी पद, प्रतिष्ठा से ऊपर आध्यात्मिक गुणों से संपन्न होगा, तभी भगवान का मित्र हो सकता है। हमें यह ध्यान रखकर भक्त बनना चाहिए। कर्मकाण्ड का, पूजा पाठ, भक्ति की प्राथमिकता तपस्या हो सकती है किंतु भक्त बनने का मार्ग बड़ा लंबा है और तपपूर्ण है। उसको पाने के लिए हृदय को शुद्ध और निर्मल बनाना होगा। भौतिक वस्तुओं की भीख मांग कर हम भगवान के भक्त नहीं हो सकते। वह तो संपूर्ण समर्पण चाहता है। यही भगवान की निष्पक्षता है।

हमारे देश में जितने भी धर्म हैं और धर्म गुरु हैं उनका यह विश्वास है कि भगवान बड़ा न्यायी है लेकिन वह भक्त के प्रति उदार रहता है भक्त की हर समय सहायता करता है। हमारे कीर्तन में, प्रार्थना में हम गाते हैं कि हमारे रखवाले हमें यह दे और वह दे। हम भगवान की पूजा करते हैं तो पुत्र प्राप्ति, धन-संपत्ति, सफलता मांगते हैं और हमारा विश्वास है कि भगवान हमारी पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर हमें वह सब देगा भी। हमारा भगवान प्रसाद चढ़ाने से प्रसन्न होता है। कहने वाले तो यह तक कहते हैं कि भगवान अपने भक्तों को सब कुछ देते हैं किंतु जो भक्त नहीं हैं, उन्हें दुर्बुद्धि दे देते हैं ताकि उनका पतन हो।

लेकिन क्या यह सच है

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, परमेश्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है, न पुण्यों को किंतु सारे देहधारी जीवन अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैें जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किए रहता है। आगे भी वे वीर अर्जुन से कहते हैं, हे धनंजय! ये सारे कर्म मुझे नहीं बांध पाते हैं। मैं उदासीन की भांति इन सारे भौतिक कर्मों से सदैव विरक्त रहता हूं। इसके आगे भगवान कृष्ण कहते हैं मैं न तो किसी से द्वेष करता हूं, न किसी के साथ पक्षपात करता हूं। मैं सबों के लिए समभाव हूं किंतु जो भी भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है, मुझमें स्थित रहता है और मैं भी उसका मित्र हूं।
वेदांत सूत्र में कहा गया है, भगवान न तो किसी के प्रति घृणा करते हैं, न किसी को चाहते हैं यद्यपि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है।

उपरोक्त कथन स्वयं श्री भगवान कृष्ण के हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि भगवान किसी के साथ पक्षपात नहीं हैं। हर व्यक्ति अपने अपने कर्मों के अनुसार संसारी सुख और दु:ख भोगता है। इसलिए शुद्ध भक्त तो भगवान से दु:ख मांगते हैं क्योंकि दु:ख में व्यक्ति पूर्ण लगन और विश्वास से श्रद्धा भक्तिपूर्वक भगवान की शरण में जाता है। भगवान श्री कृष्ण कहते भी हैं, जो कोई मेरी भक्तिपूर्वक भक्ति करेगा, वह मेरा मित्र है। मुझमें स्थित रहता है और मैं भी उसका मित्र हूं।

कौन है भगवान का भक्त

अब प्रश्न यह है कि भगवान यदि पक्षपात नहीं करते, तब वे भक्ति करने वाले को अपना मित्र क्यों घोषित करते हैं? अपने भक्त के प्रति क्या यह भगवान का पक्षपात नहीं है। सामान्य रूप से भगवान की आरती पूजा करने वाले व्यक्ति को भक्त माना जाता है। ऐसे भक्तों से हमारे देवालय भरे रहते हैं। जो भगवान के उत्सव मनाता है, भोग चढ़ाता है, मंदिर में जाता है, उसे हम भगवान का भक्त मान लेते हैं लेकिन भगवान जिनके मित्र होने की घोषणा करते हैं उसमें ऐसे कर्मकाण्ड करने वाले भक्तों का उल्लेख नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से भक्तों के गुणों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि इन गुणों वाला व्यक्ति ही भक्त है। वही मुझे प्रिय है। उसी की मैं सहायता करता हूं और वही मेरा मित्र है।

कौन है भगवान का मित्र

महाभारत के भीष्म पर्व तथा गीता के बारहवें अध्याय में भक्त के संबंध में बड़ी विशद व्याख्या की गई है। भक्त के संबंध में कहा गया है, जो सब प्राणियों से द्वेष न करने वाला, सबका मित्र, दयावान, ममता रहित, निरहंकारी, सुख और दुख को समान समझनेवाला, क्षमाशील, सदा संतुष्ट योगी, संयमी और दृढ़ निश्चयी है और जिसने अपने मन और बु़िद्ध को परमात्मा को अर्पण कर दिया है, वह भक्त परमात्मा को प्रिय है। गीता के अध्याय बारह के श्लोक क्र मांक पंद्रह से उन्नीस तक भक्त के गुणों का वर्णन है तथा कहा गया है कि ऐसे ही भक्त भगवान को प्रिय हैं। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि ये वे गुण हैं जिन्हें हम भागवत गुण मानते हैं। ये वे गुण हैं जो किसी एक व्यक्ति में समाहित हों तो वह स्वयं भगवत रूप हो जाएगा लेकिन हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि इसमें भौतिक समृद्धि सुख, सफलता, पुत्रदि की इच्छा का कहीं उल्लेख नहीं है। कर्मकाण्ड भगवान के राज्य के प्रिय विषय नहीं हैं और जो भौतिक इच्छाओं का दास है, उसे भगवान ने अपना भक्त या मित्र घोषित नहीं किया है। भगवान के भक्त के निश्चित गुण हैं। केवल उनके प्रति भगवान का मित्र भाव है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि वे पक्षपाती हैं।

भागवत पुराण में कहा गया है, ‘अंिकंचन, जितेन्द्रिय, शांत, समचित तथा ईश्वर में संतुष्ट मनवाले को संपूर्ण संसार ही सुख से परिपूर्ण है। नारद भक्ति सूत्र में कहा जाता है, ‘उन भक्तों में जाति, विद्या, रूप, कुल, धन क्रि या आदि का भेद नहीं होता।’

भक्त संसारी पद, प्रतिष्ठा से ऊपर आध्यात्मिक गुणों से संपन्न होगा, तभी भगवान का मित्र हो सकता है। हमें यह ध्यान रखकर भक्त बनना चाहिए। कर्मकाण्ड का, पूजा पाठ, भक्ति की प्राथमिकता तपस्या हो सकती है किंतु भक्त बनने का मार्ग बड़ा लंबा है और तपपूर्ण है। उसको पाने के लिए हृदय को शुद्ध और निर्मल बनाना होगा। भौतिक वस्तुओं की भीख मांग कर हम भगवान के भक्त नहीं हो सकते। वह तो संपूर्ण समर्पण चाहता है। यही भगवान की निष्पक्षता है।


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