Saturday, March 28, 2026
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डायन के नाम पर औरतों की हत्या

Samvad 44

PANKAJ CHATURVEDI 3घटना है 15 सितंबर 2024 की है। बस्तर के घनघोर नक्सली इलाके सुकमा के कोन्टा थाने के इटकल गांव में राज्य पुलिस के हेड कांस्टेबल सहित उसके परिवार के पांच लोगों को ग्रामीणों ने पीट-पीट कर मार डाला। मरने वालों में तीन महिलाएं हैं। पिछले कुछ दिनों में गांव में तीन बच्चे मरे और यह अफवाह हो गई कि हेड कांस्टेबल बच्चा मुआ के पिता के जादू-टोने के कारण बच्चे मारे गए। देश के अधिकांश राज्यों में डायन प्रथा उन्मूलन या अंध विश्वास निरोधक कानून हैं, लेकिन इस तरह की सामाजिक कुरीति को अपराध घटित हो जाने के बाद मुकदमे दर्ज कर रोक नहीं जा सकता। डायन कुरीति अकेले आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ या झारखंड तक सीमित नहीं है, यह असम, बिहार ,तेलंगाना, राजस्थान और मध्यप्रदेश सहित कोई आधा दर्जन राज्यों में हर साल सैंकड़ों औरतों को इस अंधविश्वास की आड़ में बर्बर तरीके से मारा जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में मुख्य रूप से जादू-टोना से जुड़े लगभग 85 हत्या के मामले दर्ज किए गए।

देश के आदिवासी अंचलों में जमीन हदबंदी कानूनों के लचरपन और पंचायती राजनीति के नाम पर शुरू हुर्इं जातीय दुश्मनियों की परिणति महिलाओं की हत्या के रूप में हो रही है। कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य शासन ने एक जांच रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें बताया गया है कि अंधविश्वास, अझान और अशिक्षा के कारण टोनही या डायन करार दे कर किस तरह निरीह महिलाओं की आदिकालीन लोमहर्षक ढंग से हत्या कर दी जाती है। औरतों को ना केवल जिंदा जलाया जाता है, बल्कि उन्हें गांव में नंगा घुमाना, बाल काट देना, गांव से बाहर निकाल देना जैसे निर्मम कृत्य भी डायन या टोनही के नाम पर होते रहते हैं। इन शर्मनाक घटनाओं का सर्वाधिक अफसोसजनक पहलू यह है कि इन महिला प्रताड़नाओं के पीछे ना सिर्फ महिला की प्रेरणा होती है, बल्कि वे इन कुकर्मों में बढ़-चढ़ कर पुरुषों का साथ भी देती हैं।

आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ राज्य में बेगा, गुनियाओं और ओझाओं के झांसे में आ कर पिछले तीन वर्षों में तीन दर्जन से अधिक औरतों को मार डाला गया है। कोई एक दर्जन मामलों में आदमियों को भी ऐसी मौत झेलनी पड़ी है। मरने वालों में बूढ़े लोगों की संख्या ज्यादा है। किसी को जिंदा जलाया गया तो किसी को जीवित ही दफना दिया गया। किसी का सिर धड़ से अलग करा गया तो किसी की आंखें निकाल ली गईं। ये आंकड़े मात्र वही हैं, जिनकी सूचना पुलिस तक पहुंची। खुद पुलिस भी मानती है कि दर्ज नहीं हो पाए मामलों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है। किसी गांव में कोई बीमारी फैले या मवेशी मारे जाएं या फिर किसी प्राकृतिक विपदा की मार हो, आदिवासी इलाकों में इसे ‘टोनही’ का असर मान लिया जाता है। भ्रांति है कि टोनही के बस में बुरी आत्माएं होती हैं, इसी के बूते पर वह गांवों में बुरा कर देती है।

ग्रामीणों में ऐसी धारणाएं फैलाने का काम नीम-हकीम, बेगा या गुनिया करते हैं। छत्तीसगढ़ हो या निमाड़ या फिर झारखंड व ओडिशा; सभी जगह आदिवासियों की अंधश्रद्धा इन झाड़-फूंक वालों में होती है। इन लोगों ने अफवाह उड़ा रखी है कि टोनही आधी रात को निर्वस्त्र हो कर श्मशान जाती है और वहीं तंत्र-मंत्र के जरिए बुरी आत्माओं को अपना गुलाम बना लेती है। उनका मानना है कि देवी अवतरण के पांच दिनों-होली, हरेली, दीवाली और चैत्र व शारदीय नवरात्रि के मौके पर टोनही सिद्धी प्राप्त होती है। गुनियाओं की मान्यता के प्रति इस इलाके में इतनी अगाध श्रद्धा है कि ‘देवी अवतरण’ की रातों में लोग घर से बाहर निकलना तो दूर, झांकते तक नहीं हैं।

गुनियाओं ने लोगों के दिमाग में भर रखा है कि टोनही जिसका बुरा करना चाहती है, उसके घर के आस-पास वह अभिमंत्रित बालों के गुच्छे, तेल, सिंदूर, काली कंघी या हड्डी रख देती है। ये लोग केवल इशारा करते हैं जैसे कि- डायन के घर का दरवाजा पश्चिम को है या उसके दरवाजे साल का पेड़ है या कुआं है। फिर भीड़ सबसे कमजोर शिकार का अंदाजा लगाती है और टूट पड़ती है। मध्य प्रदेश के झाबुआ-निमाड़ अंचल में भी महिलाओं को इसी तरह मारा जाता है ; हां, नाम जरूर बदल जाता है-डाकन। गांव की किसी औरत के शरीर में ‘माता’ प्रविष्ठ हो जाती है। यही ‘माता’ किसी दूसरी ‘माता’ को डायन घोषित कर देती है। और फिर वही अमानवीय यंत्रणाएं शुरू हो जाती हैं।

यह समझना जरूरी है कि अधिकांश आदिवासी गांवों तक सरकारी स्वास्थ महकमा पहुंच नहीं पाया है। जहां कहीं अस्पताल खुले भी हैं तो कर्मचारी इन पुरातनपंथी वन पुत्रों में अपने प्रति विश्वास नहीं उपजा पाए है। तभी मवेशी मरे या कोई नुकसान हो, गुनिया हर मर्ज की दवा होता है। उधर गुनिया के दांव-पेंच जब नहीं चलते हैं तो वह अपनी साख बचाने कि लिए किसी महिला को टोनही घोषित कर देता है। गुनिया को शराब, मुर्गे, बकरी की भेंट मिलती है; बदले में किसी औरत को पैशाचिक कुकृत्य सहने पड़ते हैं। ऐसी महिला के पूरे कपड़े उतार कर गांव की गलियों में घुमाया जाता है, जहां चारों तरफ से पत्थर बरसते हैं। ऐसे में हंसिए से आंख फोड़ दी जाती है।

ठेठ आदिम परंपराओं में जी रहे आदिवासियों के इस दृढ़ अंधविश्वास का फायदा इलाके के असरदार लोग बड़ी चालाकी से उठाते हैं। अपने विरोधी अथवा विधवा-बूढ़ी औरतों की जमीन हड़पने के लिए ये प्रपंच किए जाते हैं। थोड़े से पैसे या शराब के बदौलत गुनिया बिक जाता है और किसी भी महिला को टोनही घोषित कर देता है। अब जिस घर की औरत को ‘दुष्टात्मा’ बता दिया गया हो या निर्वस्त्र कर सरेआम घुमाया गया हो, उसे गांव छोड़ कर भागने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। कई मौकों पर ऐसे परिवार की बहु-बेटियों के साथ गुनिया या असरदार लोग कुकृत्य करने से बाज नहीं आते हैं। यही नहीं अमानवीय संत्रास से बचने के लिए भी लोग ओझा को घूस देते हैं।

डायन प्रथा से निबटने के लिए बिहार में सन 1999 में व झारखंड में 2001 में अलग से कानून भी बना। छत्तीसगढ़ में भी सन 2005 में टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम लागू हुआ। राजस्थान और असम में 2015 में इस पर कड़े कानून आए। कानून अपराध होने के बाद काम करता है, लेकिन आज जरूरत तो लोगों की मिथ्या धारणाओं से ओतप्रोत जनजातीय लोगों में औरत के प्रति दोयम नजरिए को बदलना है। एक तो गांवों में स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं हों, दूसरा समाज के बीच से ही ऐसे लोगों को तैयार किया जाए जो पर्व-त्योहर पर आदिवासियों को सहज तरीके से इसकी जानकारी दे सकें।

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