
नरेंद्र देवांगन
महिलाओं को अपनी हड्डियों व जोड़ों को स्वस्थ रखना चाहिए। हालांकि आॅस्टियो आर्थराइटिस से हुए नुकसान को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता लेकिन विभिन्न निवारक उपायों से इसके स्तर को कम किया जा सकता है। नियमित कसरत, वजन कम करना, प्रोटीन व कैल्शियमयुक्त आहार लेना, कैफीन से परहेज और चाय व सोडा वाले ड्रिंक कम लेने से जोड़ों को सेहतमंद रखा जा सकता है।
युवतियां माहवारी शुरू होने के बाद ही किशोरावस्था में पहुंचती हैं। फिर धीरे-धीरे बॉयोलॉजिकल, हार्मोनल और मनोवैज्ञानिक बदलावों से गुजरते हुए वे वयस्क होती हैं। जिंदगी के ये पड़ाव उनके शरीर में कई बदलाव लेकर आते हैं। इन सबसे यादा परेशानी उन्हें हड्डियों व जोड़ों की होती हैं क्योंकि युवतियां अपने शरीर में हो रहे बदलावों के प्रति लापरवाह होती हैं जिससे उन्हें कई तरह की बीमारियों जैसे आॅस्टियोपोरोसिस व आॅस्टियो आर्थराइटिस का सामना करना पड़ता है।
आमतौर पर दुनियाभर में महिलाओं को मीनोपॉज 45 से 55 वर्ष की उम्र में होता है, लेकिन हाल ही में द इंस्टिट्यूट फॉर सोशल ऐंड इकोनॉमिक चेंज के सर्वे से पता चला है कि करीब 4 फीसदी भारतीय महिलाओं को मीनोपॉज 29 से 3 4 साल की उम्र में ही हो जाता है। वहीं जीवनशैली में बदलाव के चलते 55 से 59 साल के बीच की महिलाओं का आंकड़ा 8 फीसदी है।
एस्ट्रोजन हार्मोन महिला-पुरुष दोनों में पाया जाता है और यह हड्डियों को बनाने वाले आॅस्टियोब्लास्ट कोशिकाओं की गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मीनोपॉज के दौरान महिलाओं का एस्ट्रोजन स्तर गिर जाता है जिससे आॅस्टियोब्लास्ट कोशिकाएं प्रभावित होती हैं। इससे महिलाओं की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। शरीर में एस्ट्रोजन की कमी से कैल्शियम सोखने की क्षमता कम हो जाती है और हड्डियों का घनत्व गिरने लगता है। इससे महिलाओं को आॅस्टियोपोरोसिस और आॅस्टियो आर्थराइटिस जैसी हड्डियों से जुड़ी बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है।
हालांकि भारत में सूरज की रोशनी प्रचुर मात्रा में है, इसके बावजूद कई अध्ययन दशार्ते हैं कि भारत में करीब 80 फीसदी लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। दरअसल, विटामिन डी शरीर में कैल्शियम सोखने में मदद करता है। अगर विटामिन डी की कमी होगी तो शरीर के लिए कैल्शियम सोखना संभव नहीं होगा जिससे हड्डियों में कमजोरी होगी। इससे आॅस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के टूटने का खतरा अधिक रहता है। हड्डियों का सीधा असर जोड़ों पर पड़ता है और कमजोर हड्डियां जोड़ों को प्रभावित करती हैं।
हम सभी जानते हैं कि हड्डियों का निर्माण व उन्हें मजबूत रखने में कैल्शियम का खास महत्व है। इसके बावजूद महिलाएं कैल्शियमयुक्त आहार जैसे दूध, पनीर, दही, हरी पत्तेदार सब्जियां, मेवे, अंडे, मछली इत्यादि प्रचुर मात्रा में नहीं लेतीं। इससे ढलती उम्र में कैल्शियम की कमी शरीर की हड्डियों को कमजोर कर देती है।
वैसे भी 40 साल की उम्र के बाद शरीर में कैल्शियम की कमी होने लगती है और ऐसे में अगर उम्र से पहले ही मीनोपॉज हो जाए तो एस्ट्रोजन का स्तर गिरने से बोन डैंसिटी तेजी से कम होने लगती है क्योंकि हार्मोन के प्रभाव से शरीर में कैल्शियम सोखने की क्षमता कम हो जाती है। इसलिए कैल्शियम और विटामिन डी युक्त खाना खाएं। कई बार हड्डियों से जुड़ी बीमारियों का कारण कैल्शियम या विटामिन डी की कमी नहीं होती बल्कि इसका कारण पैराथायरायड हार्मोन होते हैं।
पैराथायरायड ग्रंथियों का उद्देश्य रक्त के भीतर कैल्शियम को नियंत्रित करना है जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं। अगर शरीर में हार्मोन ज्यादा बनने लगे तो कैल्शियम कम होने लगता है जिससे हड्डियों की बीमारियां होने लगती हैं। महिलाओं में हड्डियों की क्षति का स्तर औसतन दो-तीन फीसदी प्रतिवर्ष होता है जबकि पुरूषों में हार्मोन फेज कम होने के बाद हड्डियों की क्षति का स्तर सिर्फ 0.4 फीसदी होता है। इसलिए अगर महिलाओं को
आस्टियोपोरोसिस हो जाए तो उसका समय रहते इलाज कराएं।
शुरुआती अवस्था में आस्टियोआर्थराइटिस का इलाज अक्सर दर्द निवारक दवा और कसरत से किया जाता है जबकि दर्द निवारक दवा अस्थायी राहत के लिए दी जाती है। कसरत करने से जोड़ों के आसपास की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। इससे न सिर्फ जोड़ों से बल्कि भविष्य में होने वाली अन्य बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है। गंभीर आर्थराइटिस में रोगी के लिए चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है और तेज दर्द रहता है। इससे मरीज की जिंदगी काफी प्रभावित होती है। ऐसे में क्षतिग्रस्त जोड़ों को बदलना ही आखिरी विकल्प बचता है।
नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के दौरान जांच और पिंडली की हड्डी के जोड़ के बेकार हिस्से को हटा दिया जाता है और उस पर कृत्रिम इंप्लांट लगाया जाता है। इंप्लांट से दर्द में आराम मिलता है और जोड़ों की कार्यक्षमता सुचारू रहती है। महिलाओं को अपनी हड्डियों व जोड़ों को स्वस्थ रखना चाहिए। हालांकि आॅस्टियो आर्थराइटिस से हुए नुकसान को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता लेकिन विभिन्न निवारक उपायों से इसके स्तर को कम किया जा सकता है। नियमित कसरत, वजन कम करना, प्रोटीन व कैल्शियमयुक्त आहार लेना, कैफीन से परहेज और चाय व सोडा वाले ड्रिंक कम लेने से जोड़ों को सेहतमंद रखा जा सकता है।


