Tuesday, March 17, 2026
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महिलाओं को आर्थिक मदद जीत का नुस्खा

Samvad 47

10 14यह सत्य है कि हर हार के बाद भाजपा के नेता सबक लेते हैं। लेकिन हर जीत के बाद विपक्ष के गुब्बारे फूल जाते हैं। जैसा लोकसभा चुनाव के बाद देखने को मिला कि भाजपा जीत के बाद भी खामोश नहीं रही। जबकि विपक्ष सत्ता से दूर रहने के बाद भी रणनीतिक भूल करता रहा। यहां तक कि वह ठीक से गठबंधन धर्म भी नहीं निभा सका। उत्तर प्रदेश में सपा अपनी सफलता पर इतना इतराने लगी कि उसने उप चुनाव में कांग्रेस से बिना बात किए हुए ही नौ में से सात सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए। ऐसे में कांग्रेस ने मैदान से हटना ही बेहतर समझा। राहुल गांधी एक बार भी यूपी नहीं आए। वह केरल और महाराष्ट्र में ही डटे रहे। लोकसभा की तर्ज पर इंडिया गठबंधन जाति जनगणना का कार्ड खेलता रहा। जबकि एनडीए ने योगी के नारे बंटेंगे तो कटेंगे के साथ एक हैं तो सेफ हैं जोड़ कर जातीय एकजुटता से इसकी काट निकाल ली।

नतीजे बताते हैं कि उत्तर प्रदेश से महाराष्ट्र तक वोटों की गोलबंदी में ये नारा रामबाण साबित हुआ। इसी नारे की बिना पर योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश की 9 विधानसभा के उपचुनाव में 7 पर भगवा फहरा गए। हां, झारखंड में कांग्रेस भले ही गुब्बारे फुलाती रहे, लेकिन महाराष्ट्र और यूपी उप चुनाव के नतीजे कई साफ संदेश दे गए हैं। अब तक ये रवायत रही है कि उप चुनाव सत्ता पक्ष के समर्थन वाला प्रस्ताव ले कर खामोशी से गुजर जाते हैं, लेकिन ये उपचुनाव शोरगुल मचाते हुए अखिलेश यादव और इंडिया गठबंधन के पीडीए और माई समिकरण पर भी सवालिया निशान लगा कर गुजरें हैं। कुंदरकी और करहल विधानसभा सीटों के नतीजे काबिले गौर हैं। सपा मुखिया की पुश्तैनी सीट करहल में 22 के चुनाव में सपा 64 हजार मतों से जीती थी, लेकिन इस बार जीत का अंतर केवल 14 हजार रहा। वहीं कुंदरकी जहां भाजपा तीन दशक से जीत के लिए तरस रही थीं, वहां सपा के मुस्लिम उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। जबकि यहां 65 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं। इस सीट पर सपा सहित 11 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन वोटों का बंटवारा ऐसा नहीं हुआ जिससे सपा की हार होती।

भाजपा के रामवीर सिंह को 170371 वोट मिले और वह 144791 वोट के भारी अंतर से जीत गए। सपा के रिजवान को केवल 25580 वोट मिले। वोटों का अंतर बताता है कि यहां मुस्लिम वोट भाजपा के खाते में भी गए। मतदान प्रतिशत और भाजपा उम्मीदवार को मिले मत ये साबित करते हैं कि बिना मुस्लिम समर्थन के रामवीर सिंह की इतनी बड़ी जीत सम्भव नहीं। इसी तरह करहल में सपा की जीत का अंतर कम होना ये बताता है कि उसके वोट बैंक में सेंधमारी उसके परम्परागत गढ़ तक पहुंच गई है। फूलपुर में भी सपा का पीडीए हवा में ही रहा, लोकसभा में यहां 18000 की बढ़त 11 हजार की हार में बदल गई। सपा पीडीए का नारा देती है और सुरक्षित सीट पर परिवार को प्रमुखता देती है, जाहिर है ये बात कार्यकर्ताओं के साथ मतदाताओं को भी खटकी होगी। ये भी काबिले गौर है कि महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ भाजपानीत महा आघाड़ी की प्रचंड जीत और विपक्षी कांग्रेसनीत महाविकास आघाड़ी की दारूण पराजय एवं झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा की अगुवाई में यूपीए की सत्ता में शानदार वापसी के मूल में कॉमन? बात इन राज्यों में सत्तारूढ़ सरकारों द्वारा महिलाओं को सीधा आर्थिक लाभ देना है।

मध्य प्रदेश से निकला फॉर्मूला अब रंग दिखा रहा है, यह बात शीशे की तरह साफ है कि महिलाओं को आर्थिक मदद देकर मतदाता के रूप में उनका समर्थन जीतने का जो गेमचेंजर प्लान मप्र में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने ईजाद किया था, वह न सिर्फ भाजपा बल्कि हर सत्तारूढ़ पार्टी के लिए जीत का शर्तिया नुस्खा साबित हो रहा है। यही कारण है कि महिलाएं बड़ी संख्या में वोट कर रही हैं और उस सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में वोट कर रही हैं, जो हर माह उनके खाते में निश्चित राशि सीधे जमा कर रही है। महाराष्ट्र में चुनाव से पहले ‘लाडकी बहिण योजना’ शुरू की थी। इस योजना के तहत, 21 से 65 साल की उन महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये की मदद दी जाएगी, जिनकी सालाना कमाई 2.5 लाख से कम होगी इस योजना के तहत राज्य की एक करोड़ महिलाओं को फायदा मिलता है। महाराष्ट्र में 65.22 फीसदी महिला वोटरों ने वोटिंग की थी। इसी तरह झारखंड में भी सोरेन सरकार ‘मंईयां योजना’ चलाती है। इसके तहत 21 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को हर महीने 1 हजार रुपये की मदद मिलती है। हालांकि, ये मदद उन्हीं महिलाओं को मिलती है, जिनकी सालाना कमाई 3 लाख रुपये से कम है। इस योजना से 48 लाख महिलाओं को फायदा होता है। चुनाव से पहले सोरेन सरकार ने मंईयां योजना की राशि एक हजार रुपये से बढ़ाकर 2,500 करने का ऐलान किया। कुल महिला वोटरों में से 70.46 फीसदी ने वोट डाला। महिलाओं की ये जबरदस्त वोटिंग सोरेन सरकार के लिए निर्णायक साबित हुई। यानी महंगाई और बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर मुफ्त की रेवड़ी भारी है।

योगी आदित्यनाथ के बंटेंगे तो कटेंगे नारे के बाद महिला धन योजना ने महाराष्ट्र में बहुसंख्यक वोटरों को महायुति और एनडीए के पक्ष में एकजुट होने को इस कदर प्रेरित किया कि महायुति के घटक अजित पवार की राकांपा और शिंदे द्वारा खड़े किए कुछ मुस्लिम उम्मीदवार भी इस लहर में जीत का सेहरा बांध गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व,राष्ट्रवाद के सामने राहुल गांधी का संविधान बचाने का मुद्दा उस काठ की हांडी की तरह साबित हुआ, जो विस चुनाव के चूल्हे पर नहीं चढ़ सकी।

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