Friday, April 24, 2026
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भूली-बिसरी उम्मीदें

Ravivani 29

पत्रकार रामेश्वरी नेहरू

हेमलता म्हेस्के

आज से 115 साल पहले ‘स्त्री दर्पण’ पत्रिका निकालकर स्त्री आंदोलन शुरू करने वाली संपादक रामेश्वरी नेहरू ने केवल पत्रकारिता ही नहीं की, उन्होंने दलितों और विभाजन के समय दंगा पीड़ितों की भी भरपूर सेवा की थी। ‘स्त्री दर्पण’ हिंदी की एक ऐतिहासिक पत्रिका थी, जिसकी शुरूआत 1909 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से रामेश्वरी नेहरू ने की थी। रामेश्वरी नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के चचेरे भाई की पत्नी थीं। पत्रिका की प्रबंधक पंडित नेहरू की पत्नी और इंदिरा गांधी की मां कमला नेहरू थीं।

‘स्त्री दर्पण’ को निकालने का ज्यादातर काम महिलाएं ही करती थीं। यह पत्रिका 1929 तक प्रकाशित होती रही। इस पत्रिका का अपना ही ऐतिहासिक महत्व है। आजादी की लड़ाई के दौर में गांधी सहित अनेक महापुरुषों के साथ इनकी भागीदारी के प्रभाव से अपने देश में सबसे पहले महिलाओं को मताधिकार हासिल हुआ था।

अपने देश में महिला पत्रकारिता के पहले दौर में, खासकर महिला केंद्रित पत्रिकाओं में स्त्रियों के आचरण, घर द्वार की साज-सम्भाल, यौन-शुचिता, स्त्री शिक्षा से संबंधित लेख ही छपते थे तो दूसरे दौर में ‘स्त्री दर्पण’ ने पहली बार क्रांतिकारी दखल दिया। बौद्धिक क्षेत्र में सदियों से व्याप्त पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दी। स्त्रियों को कथित स्त्री-योग्य भूमिकाओं तक सीमित रखने का विरोध किया गया और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वाधीनता आंदोलन में स्त्रियों को भागीदारी के लिए प्रेरित किया। स्त्री को बौद्धिक चेतना संपन्न हस्ती बताकर पुरुषों के बराबर रखकर देखने की वकालत भी की गई। नवजागरण के अध्येताओं ने इस पत्रिका को सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका करार दिया। ‘स्त्री दर्पण’ हिंदी पट्टी में स्त्री आंदोलन का सबसे सशक्त माध्यम बनी।

रामेश्वरी नेहरू ‘अखिल भारतीय महिला सम्मेलन’ की संस्थापकों में से एक थीं और 1942 में इसकी अध्यक्ष चुनी गर्इं। उन्होंने कोपेनहेगन में ‘विश्व महिला कांग्रेस’ और काहिरा (1961) में पहले ‘अफ्रो- एशियाई महिला सम्मेलन’ में प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। इसके पहले रामेश्वरी देवी ने 1930 में लंदन जाकर भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया। 1931 में ‘लीग आॅफ नेशंस’ के बुलावे पर वे जिनेवा गईं। 1934 में महात्मा गांधी के हरिजन उत्थान कार्य में जुटीं और 1939 में ठक्कर बाबा के साथ मध्य भारत की प्रमुख 14 रियासतों में हरिजन सेवा के निमित्त प्रयास किया। सामाजिक कार्यों में उनकी खूब रुचि थी। उन्होंने नारी निकेतन, बाल आश्रम और विधवा आश्रम शुरू किए। वे 1950 में दिल्ली में स्त्रियों के उद्धार के लिए नारी निकेतन की संस्थापक थीं। ‘स्त्री दर्पण’ के जरिए तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में क्रांतिकारी शुरूआत की। स्त्री मताधिकार की जोरदार वकालत करने वाली रामेश्वरी नेहरू को बरसों बाद उनकी जन्मतिथि 10 दिसंबर की पूर्व संध्या पर दिल्ली में याद किया गया। ‘रजा फाउंडेशन,’ ‘स्त्री दर्पण’ और ‘ड्रीम फाउंडेशन’ द्वारा 8 दिसंबर को आयोजित ‘रामेश्वरी नेहरू स्मृति समारोह’ का आयोजन किया गया।

दस दिसम्बर 1886 में लाहौर में जन्मी रामेश्वरी नेहरू की याद में पहली बार साहित्य-समाज द्वारा कोई समारोह किया गया। समारोह में रामेश्वरी नेहरू के योगदानों के साथ तवायफों की जिंदगी पर विस्तार से चर्चा हुई। जिनके सम्मान के लिए रामेश्वरी नेहरू ने अपने समय में आवाज बुलंद की थी। उन्होंने तवायफ कहलाने वाली महिलाओं के लिए तवायफ शब्द के इस्तेमाल नहीं करने की हुंकार भरी थी। इस समारोह में प्रख्यात लेखिका ममता कालिया, वरिष्ठ कवि-पत्रकार इब्बार रब्बी, ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित लेखिका नासिरा शर्मा, बनारस घराने की प्रसिद्ध ठुमरी गायिका एम सविता देवी की शिष्या मीनाक्षी प्रसाद और पत्रकार और लेखक प्रियदर्शन, कथाकार प्रभात ने अपने विचार व्यक्त किये।

श्रीमती मीनाक्षी प्रसाद ने कहा कि पुरुषों ने स्त्रियों की प्रतिभा को कमतर आंकने के लिए उस जमाने की भूली बिसरी गायिकाओं को तवायफ गायिकाएं कहकर पुकारना शुरू किया। श्रीमती प्रसाद ने ‘रामेश्वरी नेहरू स्मृति समारोह’ में वरिष्ठ कवि विमल कुमार के कविता संग्रह ‘तवायफ नामा’ के विमोचन के अवसर पर कहा कि उन दिनों कोठे पर पुरुष कलाकार और महिला कलाकार साथ गाते-बजाते और सीखते थे, लेकिन महिला गायिकाओं को बाई या जान कहकर पुकारा गया, जबकि उन्हें सम्मान-जनक भाषा में पुकारा जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि वे महिलाएं विदुषी थीं, लिखती-पढ़ती थीं, उम्दा गायिकाएं थीं। उन्होंने हिंदुस्तानी मौसिकी को बचाया, लेकिन पुरुष कलाकारों को उस्ताद या पंडित कहा गया, जबकि महिला कलाकारों को बाई या जान या तवायफ गायिकाएं। श्रीमती प्रसाद ने कहा कि यह भाषा बदलनी चाहिए। हमारी भाषा पितृसत्त्ता से संचालित है। महिलाओं में भी पितृसत्त्तात्मक मानसिकता काम करती है। उसे भी बदले जाने की जरूरत है।

इस मौके पर ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित लेखिका नासिरा शर्मा ने कहा कि 1857 के विद्रोह के बाद औरतों की, विशेषकर मुस्लिम महिलाओं के लिए आजीविका का संकट पैदा हो गया और महिलाएं कोठे पर नाच-गाकर अपना हुनर बेचने लगीं और तवायफ कहलाने जाने लगीं, जबकि वे उस अर्थ में तवायफ नहीं थीं, जिस अर्थ में लोग समझते हैं। तब तवायफ का अर्थ भी वह नहीं था। उन्होंने कहा कि हमें औरतों के इतिहास की बात करते हुए स्त्री-विमर्श की बात करते हुए मुस्लिम महिलाओं को छोड़ नहीं देना चाहिए। बिना उनके हिंदुस्तान में स्त्री विमर्श अधूरा है। उन्होंने बताया कि उस जमाने में मुस्लिम महिलाएं क्या-क्या लिख रहीं थीं।

‘जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय’ में इतिहास की प्रोफेसर लता सिंह ने कहा कि इन तवायफ महिलाओं औ? कलाकारों ने राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उन्हें इतिहास में जगह नहीं मिली हालांकि अब उनके बारे में काफी कुछ लिखा गया और लिखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि ‘नटी विनोदिनी’ से लेकर ‘पारसी थिएटर’ की महिला कलाकारों ने अपनी कला से मुक्ति और आजादी की बात की।

समारोह की अध्यक्ष ममता कालिया ने अपने शहर की मशहूर गायिका जानकी बाई छप्पन छुरी का जिक्र करते हुए कहा कि तब पुरुष स्त्री की प्रतिभा से जलते-भुनते थे। यही कारण है कि जानकी बाई पर चाकू से 56 वार किए गए। उन्होंने बताया कि हुस्ना जान ने किस तरह गांधी जी के साथ बनारस में आजादी की अलख जगाने का काम किया। समारोह में ‘स्त्री दर्पण’ की अध्येता प्रज्ञा पाठक ने विस्तार से रामेश्वरी नेहरू के अवदान के बारे में बताया और कहा कि उस दौर में ‘स्त्री दर्पण’ और अन्य महिला पत्रिकाओं ने स्त्री आंदोलन खड़ा किया था।

समारोह में इब्बार रब्बी ने पुरुष कवियों की स्त्री विषयक कविताओं की पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा कि हिंदी कविता में पुरुषों ने स्त्रियों पर बहुत कविताएं लिखीं, लेकिन समाज में महिला बलात्कार की शिकार हो रही हैं। वरिष्ठ कवि-पत्रकार प्रियदर्शन ने कहा कि इस समय हिन्दी में स्त्री लेखन का बहुत बड़ा विस्फोट हुआ है। इतनी तादाद में वे अच्छा लिख रही हैं। समारोह में रीता दास राम और अलका तिवारी द्वारा संपादित पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।

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