Sunday, March 22, 2026
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प्लास्टिक से विनाश, कागज से समाधान

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योगेश कुमार गोयल

Ravivani 33

प्लास्टिक प्रदूषण के विरुद्ध वैश्विक चेतना के प्रतीक और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में प्रतिवर्ष 12 जुलाई को ‘विश्व पेपर बैग दिवस’ मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को प्लास्टिक के बजाय पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों की ओर प्रेरित करना है ताकि पृथ्वी को प्लास्टिक के कहर से बचाया जा सके। दरअसल प्लास्टिक की थैलियां आज जिस भयावह रूप में हमारे पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही हैं, उस पर नियंत्रण के लिए पेपर बैग एक मजबूत समाधान बनकर उभरा है। दुनिया में हर साल 500 अरब से भी अधिक प्लास्टिक बैग का उपयोग किया जाता है, जो न केवल हमारी सड़कों, नालियों, नदियों और समुद्रों को भर देता है बल्कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संकट और मानव स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को भी जन्म देता है। प्लास्टिक बैग इतने खतरनाक होते हैं कि समुद्री जीव-जंतु इन्हें भोजन समझकर निगल लेते हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है। समुद्री पक्षियों की 100 से अधिक प्रजातियां प्लास्टिक खा रही हैं, वहीं 250 से अधिक प्रजातियों को प्लास्टिक में उलझे हुए देखा गया है। समुद्री शेरों और सील की कई प्रजातियों में आठ प्रतिशत तक की उलझाव दर देखी गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि प्लास्टिक बैग केवल कचरा नहीं बल्कि धरती पर एक घातक आपदा बन चुके हैं।

प्लास्टिक की थैलियां पारदर्शी, सस्ती, हल्की और सुविधाजनक होती हैं लेकिन इनका पर्यावरणीय मूल्य अत्यंत महंगा है। ये नालियों को जाम करती हैं, जिससे शहरी बाढ़ की समस्या बढ़ती है। खेतों में प्लास्टिक थैलियों की मौजूदगी मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित करती है और जल के रिसाव को रोकती है, जिससे भूजल पुनर्भरण की दर में कमी आती है। प्लास्टिक कई शताब्दियों तक नष्ट नहीं होता और इसके जलाने से जो रसायन निकलते हैं, वे हवा और वातावरण को जहरीला बना देते हैं। यही कारण है कि अब इस पर गंभीर चिंता जताई जा रही है और दुनिया के कई हिस्सों में इसे प्रतिबंधित किया जा चुका है। भारत में भी इस दिशा में प्रयास किए जा चुके हैं। कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक पर आंशिक या पूर्ण प्रतिबंध लगाए हैं। साथ ही, राष्ट्रीय स्तर पर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ और ‘सिंगल यूज प्लास्टिक प्रतिबंध’ जैसे कदमों से इस समस्या के समाधान की कोशिशें हो रही हैं। भारत सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्रतिदिन लगभग 26 हजार टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से 10 हजार टन का कोई निस्तारण नहीं होता। यही वह कचरा है, जो अंतत: हमारे जलस्रोतों और समुद्रों तक पहुंचकर पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाता है।

इस गंभीर समस्या का एक सशक्त समाधान है ‘पेपर बैग’। पेपर बैग शत-प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल होते हैं और कुछ ही हफ्तों में स्वयं विघटित होकर मिट्टी में मिल जाते हैं। वे न तो समुद्री जीवों के लिए खतरा हैं, न ही भूजल या वायु प्रदूषण के कारक। पेपर बैग न केवल पर्यावरण-अनुकूल हैं बल्कि आज एक बड़ा आर्थिक अवसर भी बनते जा रहे हैं। भारत सहित कई देशों में पेपर बैग निर्माण का एक बड़ा उद्योग खड़ा हो रहा है, जो न केवल हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे रहा है बल्कि रोजगार भी पैदा कर रहा है। आज विभिन्न स्टार्टअप और नवाचारों के माध्यम से बायोडिग्रेडेबल विकल्पों का निर्माण हो रहा है। भारत में डीआरडीओ ने कुछ निजी संस्थानों के साथ मिलकर प्लास्टिक के स्थान पर खाद्य-ग्रेड पौधों से बनने वाले बैग विकसित किए हैं, जो केवल 90 दिनों में स्वयं नष्ट हो जाते हैं। इन बैगों का डिजाइन इस तरह किया गया है कि ये न केवल उपयोगी हैं बल्कि जानवरों के लिए भी सुरक्षित हैं। इसी प्रकार, कनाडा, इजरायल, डेनमार्क जैसे देशों में घास, ताड़ के पत्ते, पराली, कपास और चुकंदर की खोई से जैव-प्लास्टिक तथा बायोपैकिंग सामग्री का निर्माण हो रहा है। यह सामग्री सस्ती, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल होती है तथा इस्तेमाल के बाद कंपोस्ट बन जाती है।

भारत में भी कई स्टार्टअप केले और बड़े पत्तों से खाद्य पैकेजिंग का विकास कर रहे हैं। यह पारंपरिक भारतीय ज्ञान का पुनरुद्धार भी है, जहां पहले पत्तलों और दोने का चलन था। इन प्राकृतिक साधनों से बनी पैकेजिंग सामग्री न केवल पूर्णत: जैविक होती है बल्कि स्थानीय किसानों और हस्तशिल्पियों के लिए एक आय का स्रोत भी बनती है। वहीं दूसरी ओर, प्लास्टिक की थैलियों का स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है। जब हम प्लास्टिक में पैक खाद्य सामग्री का सेवन करते हैं तो उसमें मौजूद हानिकारक रसायन हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। अध्ययन बताते हैं कि प्लास्टिक पैकेजिंग में मौजूद बिस्फिनॉल-ए (बीपीए) और फथेलेट्स जैसे रसायन गैस, हार्मोन असंतुलन, प्रजनन संबंधी समस्याओं, पेट की बीमारियों और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। यह खतरा विशेषकर बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए और भी अधिक है। भारत की स्थिति को देखें तो पॉलीथीन की थैलियों ने न केवल शहरी इलाकों की साफ-सफाई व्यवस्था को अस्त-व्यस्त किया है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी यह संकट गहराता जा रहा है। गांवों की गलियों से लेकर खेतों तक प्लास्टिक के टुकड़े बिखरे दिखाई देते हैं, जो मवेशियों द्वारा निगले जा रहे हैं और अंतत: उनकी मृत्यु का कारण बन रहे हैं। विभिन्न पशु चिकित्सकीय अध्ययन बताते हैं कि हर साल हजारों गायें और भैंसें प्लास्टिक खाने के कारण मर जाती हैं।

इन स्थितियों को देखते हुए यह आवश्यक है कि हम न केवल सरकारी प्रतिबंधों और योजनाओं पर निर्भर रहें बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी जिम्मेदारी लें। हमें अपने दैनिक जीवन में प्लास्टिक के स्थान पर कपड़े के थैले, जूट बैग, पेपर बैग, स्टील या तांबे की बोतलों का उपयोग बढ़ाना होगा। स्कूलों, कॉलेजों, संस्थानों और बाजारों में ‘नो प्लास्टिक’ अभियान को एक आंदोलन की तरह फैलाना होगा। बच्चों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाना आज की प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी स्वच्छ और सुरक्षित भविष्य की दिशा में सोच सके। विकसित देशों में अब ‘जीरो वेस्ट शॉपिंग’ की अवधारणा तेजी से लोकप्रिय हो रही है, जहां ग्राहक अपने साथ खुद के कंटेनर और थैले लाकर खरीदारी करते हैं और इस तरह प्लास्टिक पैकेजिंग से बचते हैं। भारत में भी इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। कुछ शहरी क्षेत्रों में अब ऐसे स्टोर खुल रहे हैं, जहां ग्राहकों को थैला या डिब्बा लाना आवश्यक होता है। यह न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी है बल्कि उपभोक्ताओं को अपने कचरे की मात्रा का भी आकलन करने की आदत डालता है।

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