
6 अगस्त 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद के चलते अतिरिक्त 25 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने का आदेश जारी किया है जिससे कुल अमेरिकी शुल्क अब 50 प्रतिशत हो गया। अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और आर्थिक हितों की रक्षा हेतु जारी इस कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि यदि रूस या कोई अन्य प्रभावित देश अमेरिका के साथ समन्वय स्थापित कर आपात-स्थिति के समाधान की दिशा में कदम उठाता है, तो राष्ट्रपति को आदेश संशोधित करने का अधिकार भी है। इससे यह नीति लचीली बनती है। इस आदेश के लागू होने की समय-सीमा 21 दिन तय की गई है, अर्थात भारत और रूस को इस अवधि के भीतर अमेरिका से बातचीत कर शुल्कों में किसी संभावित बदलाव की संभावनाएं तलाशने का अवसर मिलेगा। इस आदेश से स्पष्ट है कि अमेरिका उन देशों पर दबाव बनाना चाहता है जो यूक्रेन युद्ध के बाद भी रूसी ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं। ट्रंप के इस कदम से भारत की आर्थिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। जहां एक ओर भारत ने ऊर्जा जरूरतों एवं परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात हेतु रूस से तेल की खरीद जारी रखी है, वहीं अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव बढ़ने का खतरा है।
यह स्थिति भारत के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है, खासकर जब कई अमेरिकी कंपनियां उसे चीन के विकल्प के रूप में देख रही थीं। इसका प्रतिकूल प्रभाव प्रवासी भारतीयों पर भी होगा। आयातित भारतीय वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि उनके उपभोग व्यय को बढ़ाएगी, जिससे न केवल उनकी बचत क्षमता पर असर पड़ेगा, बल्कि भारत को भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा में भी गिरावट आने की संभावना है। चीन भी रूस से तेल खरीदता है, फिर भी उसे अतिरिक्त अमेरिकी शुल्कों का सामना नहीं करना पड़ा, संभवत: इसलिए कि अमेरिका-चीन के बीच व्यापार वातार्एं जारी हैं। फिलहाल अमेरिका ने चीनी वस्तुओं पर शुल्क लगाए हैं, जिसके जवाब में चीन ने अमेरिकी उत्पादों पर प्रतिशोधात्मक कर लगाया है।
भारत पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए दंडात्मक शुल्क ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है और वैश्विक व्यापार, ऊर्जा-नीति और भू-राजनीतिक समन्वय को जटिल बना दिया है। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने ट्रंप के फैसले का समर्थन करते हुए उन्हें साहसी और तार्किक बताया, साथ ही यूरोप से भी वैसा ही रुख अपनाने की अपील की। हालाकि ऐसा कहा जा सकता है कि जॉनसन ने इस बहाने वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर पर कटाक्ष किया है, लेकिन यदि ब्रिटेन और यूरोपीय संघ, वहां के विपक्ष व स्वदेशी के दबाव में अमेरिका की राह पर चलते हैं, तो भारत के लिए स्थिति और जटिल हो सकती है।
रूस से ऊर्जा खरीद पर अमेरिका के दबाव के बीच चीन ने पहली बार भारत का समर्थन करते हुए कहा कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है। यह चीन की ओर से भारत को मिला एक दुर्लभ सार्वजनिक समर्थन है, विशेषकर ऐसे समय में जब अमेरिका दोनों देशों के साथ व्यापारिक टकराव की राह पर है जो दोनों देशों के बीच संभावित रणनीतिक समीकरण का संकेत देता है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी की इस महीने शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन हेतु प्रस्तावित चीन यात्रा, जो गलवान झड़प के बाद पहली होगी, अमेरिका को यह अप्रत्यक्ष संदेश भी देती है कि भारत के पास वैकल्पिक कूटनीतिक रास्ते मौजूद हैं। इस तरह चीन द्वारा भारत को दिया गया यह समर्थन केवल एक कूटनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में संभावित बदलाव की ओर संकेत करता है।
अब भारत को आत्मनिर्भरता और वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में अपने प्रयास तेज करने होंगे। अमेरिका के टैरिफ युद्ध ने कई देशों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार के लिए मजबूर किया है। फ्रांस, जर्मनी और कनाडा जैसे देश आर्थिक सुधार और सुरक्षा सुदृढ़ीकरण की दिशा में सक्रिय हैं। अमेरिका के आक्रामक कदमों ने अन्य देशों को सुधार का अवसर देकर सकारात्मक बदलाव की राह खोली है। भारत ने इस बार कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भारत के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को जारी एक बयान में अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है। बयान में कहा गया है कि अमेरिका स्वयं अपनी परमाणु ऊर्जा उद्योग के लिए यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र के लिए पैलेडियम और उर्वरकों व रसायनों का रूस से आयात करता है। ऐसे में केवल भारत को निशाना बनाना अन्यायपूर्ण और तर्कहीन है। भारत, जो अब तक अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक संबंधों को प्राथमिकता देता रहा है, अब शायद यह दशार्ने की कोशिश कर रहा है कि यदि उस पर अत्यधिक दबाव डाला गया, तो वह अपनी विदेश नीति में विविधता लाने से नहीं हिचकिचाएगा।
भारत के लिए यह क्षण केवल प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि दूरदर्शी आत्ममंथन और रणनीतिक सशक्तिकरण का है। जब अन्य देश टैरिफ युद्ध के दबाव में भी अवसर तलाशते हुए आगे बढ़ सकते हैं, तो भारत क्यों नहीं बढ़ सकता? यह समय है जब भारत को अपने आंतरिक व्यापार को सरल और पारदर्शी बनाना चाहिए, विनिर्माण क्षेत्र को नई ऊर्जा देना चाहिए, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहिए और तकनीकी व नवाचार क्षमताओं को उभारते हुए वैश्विक नेतृत्व की दिशा में ठोस कदम बढ़ाना चाहिए। यदि भारत इस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति से एक सकारात्मक, परिवर्तनकारी रास्ता निकाल पाता है, तो यही तथाकथित अनपेक्षित प्रभाव उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक जीत सिद्ध हो सकता है।
निस्संदेह, हर संकट अपने साथ एक छिपा हुआ अवसर लेकर आता है। टैरिफ युद्ध के इस दौर में भारत को आत्मनिर्भर, सजग और रणनीतिक दृष्टि से परिपक्व बनकर न केवल वर्तमान दबावों का सामना करना है, बल्कि स्वयं को भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित भी करना है।
अब देखने की बात यह है कि भारत सरकार इस चुनौती का सामना किस तरह करती है? क्या वह कूटनीतिक संवाद और विवेकपूर्ण व्यापारिक रणनीतियों के माध्यम से इसे अवसर में बदल पाएगी, या फिर अमेरिकी प्रतिबंधों के आर्थिक दबाव को मौन रूप से सहने के लिए मजबूर होगी? यही निर्णय भारत की आगामी वैश्विक भूमिका को परिभाषित करेगा।
कुल जमा सात महीने के अपने दूसरे और अंतिम कार्यकाल में अमरीकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने दुनियाभर के व्यापार-धंधे में जिस तरह का बवाल काटा है, उसकी कोई बानगी नहीं मिलती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भले ही हाउउ डी मोदी, नमस्ते ट्रंप और अबकी बार ट्रंप सरकार की फूहड हरकतों से डोनॉल्ड ट्रंप को अपना सहोदर बताते नहीं अघाते हों, टैरिफ युद्ध की चपेट में भारत भी आ गया है।

