
खाने में तो स्वाद होता ही है लेकिन क्या बोलने में भी! हां भाई हां, जिस तरह टूथपेस्ट में नमक होता है, वैसे ही बोलने में भी स्वाद होता है! सच बोलने पर सुनने वाले को कड़वे स्वाद का आभास हो सकता है, वहीं झूठ मूठ के बोल मीठे स्वाद का अहसास करा सकते हैं। हालांकि सच बोलने वाले लोग लुप्तप्राय प्रजाति में गिने जाने लगे हैं। अब जमाना उन लोगों का है जो झूठ को इस अंदाज में परोसते हैं कि सुनने वाला उसे रसगुल्ले की तरह मुंह में डालकर ‘वाह-वाह’ करता रहे। वैसे आपसे भी एक सवाल पूछ रहा हूं। आप किसी को कह दीजिए-‘भाई, आप मोटे हो रहे हैं’ तो वह तुरंत बुरा मान जाएगा। मगर वही बात इस तरह कहिए-‘क्या राज है आपकी फिटनेस का, आजकल तो आप और हेल्दी लग रहे हैं’-तो उसकी प्रसन्नता की सीमा नहीं रहेगी। इसी तरह, किसी दुबले से पूछ लीजिए-‘इतने दुबले क्यों हो रहे हो?’ तो वह देवदास बन जाएगा, लेकिन अगर पूछ लीजिए-‘क्या बात है, बॉडी इतनी मेंटेन कैसे रखते हो?’ तो वह खुद को फिटनेस गुरुओं की फेहरिस्त में शामिल मान बैठेगा और फूल के कुप्पा हो जाएगा।
समस्या यह है कि लोगों के कान मिठाई के रसगुल्ले खाने के आदी हो चुके हैं। कसैली बात का स्वाद उन्हें बर्दाश्त ही नहीं होता। यही कारण है कि राजनीति में भी नेता कभी सच नहीं बोलते। वे कभी नहीं कहते कि ‘महंगाई बढ़ रही है।’ बल्कि कहते हैं-‘देश तरक्की की राह पर है, जनता के पास पहले से ज्यादा खर्च करने का अवसर है।’ अब जनता चाहे प्याज के दाम पर आंसू बहाए या पेट्रोल के भाव पर खून के घूंट पिए, नेता का ‘सच’ हमेशा मीठी कोटिंग में ही मिलेगा। सोशल मीडिया पर तो यह कला और ऊंचाई पर पहुंच चुकी है। कोई अपनी फोटो पर सच लिख दे कि ‘आज बहुत थका हुआ हूं’ तो लाइक की जगह सहानुभूति के इमोजी बरसने लगेंगे। मगर वही व्यक्ति अगर लिख दे-‘आज खूब वर्कआउट किया, एनर्जी से भरा हूं’ तो लोग उसे फिटनेस आइकन मानकर दिल और ताली बजाने वाले इमोजी उछाल देंगे। सच तो यह है कि दोनों ही हालत में वह बेचारा पस्त पड़ा है।
घर-परिवार में भी यही हाल है। किसी से कह दीजिए-‘तुम्हारी चाय बहुत फीकी है’ तो रसोई का वातावरण युद्धभूमि बन जाएगा। लेकिन उसी चाय को पीकर कहिए-‘वाह, कितनी हेल्दी चाय है, शुगर-फ्री लाइफस्टाइल का बेहतरीन उदाहरण’-तो बनाने वाला गर्व से भर जाएगा और अगली बार और फीकी चाय पिलाने का साहस जुटा लेगा। सच की हालत भी आजकल वैसी ही हो गई है जैसी किसी बुजुर्ग की—घर में सब उसकी इज्जत तो करते हैं लेकिन कोई उसकी सुनता नहीं। सब उसे घुमा-फिराकर ही काम की बात बताते हैं। शायद इसलिए ही सच को अब ‘कड़वा’ कहा जाने लगा है, जबकि असल में वह बेचारा तो सिर्फ अनसुना पड़ा रह जाता है और मीठा झूठ कहने वाले दुनिया के महानायक बने फिरते हैं। हालांकि अब नायक और खलनायक में कोई फर्क नहीं रह गया है।

