
फलस्तीन के गजा में लगभग दो साल से जारी मानव संहार पर ध्यान दें, तो बेशक यह धारणा बनेगी कि ‘निरीह’ फिलस्तीनियों का सफाया अब तय है। और इस तरह इस्राइल नदी से सागर (जॉर्डन नदी से भूमध्य सागर तक- जहां 76 साल पहले पूरे इलाके पर फिलस्तीनी बसते थे) तक कब्जा जमाने में कामयाब हो जाएगा। इस तरह अब मानव संहारक रूप ले चुकी यहूदीवादी परियोजना सफल हो जाएगी। सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद से जारी इस्राइली मानव संहार की प्रत्यक्ष कार्रवाइयों में 65 हजार से अधिक फलस्तीनी मारे जा चुके हैं। इनमें दो तिहाई संख्या महिलाओं और बच्चों की है। परोक्ष रूप से कितनी मौतें हुई हैं, इसका ठोस आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
तकरीबन एक साल पहले ब्रिटिश पत्रिका द लासेंट ने अनुमान लगाया था कि बेघर होने, अस्पतालों के नष्ट होने से इलाज के अभाव, भोजन-वस्त्र के अभाव और इस्राइली हमलों के बाद फैली बीमारियों के कारण लगभग दो लाख 80 हजार लोग मरे हैं। उसके आधार पर अंदाजा लगाया जाता है कि आज ये संख्या छह लाख पार कर चुकी है। इस दौरान गजा में आवास और बुनियादी सुविधाओं का जो विनाश हुआ है, वह एक अलग कहानी है।
अब दो साल बाद सूरत यह है कि गजा में इस्राइल की मानव संहारक कार्रवाइयों ने हमास नेतृत्व को काफी कमजोर कर दिया है (हालांकि जवाबी हमले करने की हमास की क्षमता अब भी बरकरार है)। इस्राइल अब गजा पर कब्जा करने और वहां से फलस्तीनियों को खदेड़ने के लिए जमीनी युद्ध छेड़ चुका है। हिज्बुल्लाह के पूरे तत्कालीन नेतृत्व को पिछले वर्ष उसने खत्म कर दिया, जिससे यह संगठन आज काफी कमजोर अवस्था में है। सीरिया में तख्ता पलट हो गया, जिसके बाद अमेरिकी प्रॉक्सी की वहां सरकार बन गई है। इस तख्ता पलट में तुर्किये ने संदिग्ध भूमिका निभाई, जिससे यह संदेश गया कि फिलस्तीन के लिए मुस्लिम देशों का समर्थन दिखावा भर है।
यमन के हूती अब भी लड़ाई जारी रखे हुए हैं, लेकिन इसकी महंगी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी है। अमेरिकी और इस्राइली हमलों में यमन को भारी क्षति हुई है। इराक स्थित इस्लामिक रेजिस्टैंस फोर्स की पहले भी सीमित भूमिका ही थी। इस बीच इस्राइल के साथ 12 की सीधी लड़ाई के बाद ईरान अपनी ताकत को पुनर्संगठित करने में जुटा हुआ है। फिलहाल उसकी कोशिश संभल कर चलने की है। तो साफ है कि प्रतिरोध धुरी की स्थिति इस समय अच्छी नहीं है। इसीलिए इस्राइल का मनोबल इतना बढ़ा कि उसने गुजरे नौ सितंबर को कतर की राजधानी दोहा पर हमला बोल दिया। इसके बावजूद कि कतर इस्राइल और हमास के बीच मध्यस्थ की भूमिका में रहा है। जिस समय इस्राइल ने दोहा पर बम गिराए, उस समय भी कतर इसी भूमिका में था। गजा में युद्धविराम पर वार्ता के लिए उस वक्त हमास के नेता दोहा में थे। वे वहां के डिप्लोमैटिक एरिया में ठहरे हुए थे, जहां बमबारी हुई।
अमेरिका का दावा है कि उसे इस्राइल ने हमले से ठीक पहले सूचित किया। इसलिए हमला रोकने के लिए वह कुछ नहीं कर पाया। लेकिन ये बात शायद ही किसी के गले उतरी हो। इस्राइल बिना ट्रंप प्रशासन की सहमति के पश्चिम एशिया में अमेरिका से सबसे करीबी सहयोगी देश पर हमला करेगा, यह मुमकिन नहीं है। यह बात इससे भी साबित होती है कि हमले के बाद भी ट्रंप प्रशासन ने उसकी दो टूक निंदा नहीं की। ना ही उसने इस्राइल को ‘अनुशासित करने’ के कदम उठाए। उलटे उस हमले के विरोध में जिस रोज मुस्लिम एवं अरब देशों के नेता दोहा में जुटे, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस्राइल को समर्थन देने वहां गए। उन्होंने गजा में जमीनी हमले की इस्राइली योजना को वहां ‘हरी झंडी’ भी दी।
पिछले दो साल में गजा में जारी मानव संहार में भी अमेरिका ने इस्राइल को हर तरह की मदद दी है। पूर्व जो बाइडेन की छवि ‘जिनोसाइड जो’ की बनी थी, फिर उनका प्रशासन कभी-कभार नाराजगी का दिखावा जरूर करता था। मगर डॉनल्ड ट्रंप ऐसे पाखंड नहीं करते। उन्होंने और उनके प्रशासन ने गजा से फलस्तीनियों की बेदखली की इस्राइली योजना को खुल कर समर्थन दिया है। इसीलिए दुनिया का बहुत बड़ा जनमत गजा में जारी मानव संहार को अमेरिका- इस्राइल की साझा परियोजना मानता है।
पहले जब कहा जाता था कि इस्राइल सेटलर कॉलोनियल प्रोजेक्ट के जरिए बना मध्य पूर्व में पश्चिमी साम्राज्यवाद की चौकी है, तो इसे समझना बहुत से लोगों के लिए कठिन होता था। मगर पिछले दो साल में यह समझना अधिक आसान हो गया है। इस दौरान सब कुछ इतना बेलाग-लपेट के हुआ है कि नंगी आंखों से भी उसके सच को देखना संभव बना रहा है। और यही वो बात है, जिससे कहानी बदल जाती है। इस कथा ने उस सॉफ्ट पॉवर को क्षीण कर दिया है, जो अमेरिकी/ पश्चिमी साम्राज्यवाद को एक किस्म का नैतिक आवरण देता था। यह सॉफ्ट पॉवर मीडिया, थिंक टैंक्स, हॉलीवुड आदि के जरिए लोगों के दिमाग में बैठा कर बनाया गया था कि पश्चिमी सभ्यता लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानव अधिकार, खुला समाज और नियम आधारित विश्व व्यवस्था के खंभों पर टिकी है। वैसे तो आम जन में बढ़ती जागरूकता ने इस धारणा को पहले ही कमजोर करना शुरू कर दिया था, मगर गजा में दुनिया ने जो देखा, उसने इस कथानक को छिन्न-भिन्न कर दिया है।
खुद यूरोपीय और अमेरिकी अवाम का एक बड़ा हिस्सा अपने शासकों के दोमुंहेपन को लेकर आक्रोश में भरा नजर आया है। इन देशों में लाखों लोग गजा में मानव संहार के खिलाफ लगातार सड़कों पर उतरे हैं। उन्होंने मानव अधिकारों के प्रति अपनी सरकारों की वचनबद्धता पर प्रश्न खड़े किए हैं। अमेरिका में तो यह धारणा आज काफी मजबूत हो गई है कि अमेरिकी नीतियां इस्राइली लॉबी तय करती है। इस प्रकरण ने एंटी-सिमेटिज्म के नैरेटिव को बेअसर कर दिया है। यहूदियों के प्रति नफरत और सिर्फ यहूदी होने के कारण उनसे अत्याचार का यूरोप में इतिहास रहा है। इसे ही एंटी-सिमेटिज्म कहा जाता है। दूसरे विश्व युद्ध से पहले जर्मनी में यहूदियों के हुए संहार के पीछे नाजियों की एंटी-सिमेटिक भावना को कारण समझा गया था। तब से पश्चिम में यह एक संवेदनशील मुद्दा रहा है।
ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, आयरलैंड, कनाडा, पुर्तगाल, न्यूजीलैंड आदि जैसे पश्चिमी खेमे के अनेक देशों की सरकारें हाल में एक संप्रभु देश के रूप में फलस्तीन को मान्यता देने के लिए मजबूर हुई हैं। यूरोपीय संघ की प्रमुख उरसुला वान डेर लियेन की छवि अभी हाल तक इस्राइल के कट्टर समर्थक की थी। लेकिन अब उन्होंने फलस्तीन के पुनर्निर्माण के लिए यूरोपीय सहायता कोष बनाने का एलान किया है। इस क्रम में इन तमाम देशों/क्षेत्रों ने अमेरिका की अवहेलना की है। ये देश फलस्तीन को मान्यता ना दें, इसके लिए डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने इन देशों को समझाने और धमकाने- दोनों तरह के तरीके अपनाए। मगर अपनी जनता का दबाव ऐसा है कि वहां की सरकारों को अपने ‘बॉस’ की मंशा के खिलाफ जाना पड़ा है।

