Tuesday, March 17, 2026
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राजनीतिक दलों का जातिगत दृष्टिकोण

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विभिन्न राजनीतिक दल अलग-अलग जातीय समूह को साधने के लिए प्रयासरत रहा करते हैं। लोकतंत्र में अपने दल की रीति-नीति के प्रति जनसमूह का विश्वास प्राप्त करना, एक प्रकार से सहज स्वाभाविक हो सकता है। लेकिन राजनीतिक दलों के ऐसे प्रयास अलग-अलग समाज में जातीय ध्रुवीकरण की स्थिति निर्मित कर रहे हैं। हालांकि व्यावहारिक तौर पर ऐसा बहुत कम संभव हो पाता है कि कोई भी जाति या कोई भी समूह पूर्णरूपेण किसी एक राजनीतिक दल पर निर्भर रह सके। बावजूद इसके लोकतंत्र की स्वाभाविक अवधारणा के अनुरूप अलग-अलग जातियों को अलग अलग राजनीतिक दल के समर्थक के रूप में ही देखा जा रहा है।

यह स्थिति प्रकारांतर से अनेकता में एकता के ताने-बाने को ध्वस्त करती दिखाई देती है। लोकतंत्र के संख्याओं के खेल में अलग-अलग जातियों को अलग-अलग दल के समर्थक के रूप में देखा जाना, तथाकथित एकता की अनेकता को रेखांकित करता है। राजनीतिक दृष्टि से सामाजिक ध्रुवीकरण लोकतंत्र की सेहत के लिए अंतत: हानिकारक ही सिद्ध होता है। विभिन्न राजनीतिक नेतृत्व त्वरित लाभ की दृष्टि से जातीय समूह पर निर्भरता को दलीय हित में पाते हैं। किंतु इनका ऐसा नजरिया कालांतर में सकल समाज में नकारात्मक संदेश का कारक सिद्ध होता है। ऐसे में विभिन्न समाजों का संतुलित विकास हो पाना संभव नहीं होता। कभी-कभी तो राजनीतिक संरक्षण के चलते समाज विशेष की मनमानी के उदाहरण भी देखने को मिलते हैं।

चुनावी दौर में जब राजनीतिक सक्रियता चरम पर होती है, एकमुश्त मतों को पाने की दृष्टि से अलग-अलग जाति की कुत्सित परंपराओं को भी राजनीतिक दल समर्थन देने से बाज नहीं आते। ऐसे में जाति समूह का अंधविश्वास और पाखंड राजनीतिक स्वीकृति पा जाता है। स्वस्थ समाज की संरचना में यह स्थिति बाधक सिद्ध होती है। निरंतर परिवर्तित दौर में शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ अब आधुनिक विचारधाराएं कुलांचे भरने लगी है। इसके बावजूद अलग-अलग समाज की परंपरागत अवधारणाएं बिना तर्क की कसौटी पर कसे राजनीतिक दलों के वरदहस्त के चलते मान्यता प्राप्त कर रही है। परंपराओं के नाम पर कभी-कभी कानूनी प्रक्रियाएं भी ताक पर रख दी जाती है।

इन हालात के चलते विभिन्न समाजों का परंपरावादी सोच राजनीतिक संरक्षण के चलते विस्तार पा रहा है। ऐसे में न तो समाज में स्वस्थ वातावरण बन पाता है और न ही नागरिकों द्वारा सोच-समझकर मतदान करने की प्रक्रिया को बल मिलता है। अलग-अलग जातीय समूह को दल विशेष का समर्थक या विरोधी माना जाना, अनावश्यक रूप से अलगाव को जन्म देता है। लेकिन राजनीतिक स्वार्थसिद्धि की प्रबलता का यह आलम है कि कुछ राजनीतिक दल तो जाति विशेष की ही राजनीति को राजनीतिक सक्रियता का पर्याय मानते हैं। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि जातीय हितों का संरक्षण करने के निमित्त अलग-अलग जाति समूह ने अलग-अलग राजनीतिक दल खोल दिए हैं। इससे ऐसा आभास होता है कि इनकी राजनीति का नीति और सिद्धांतों से कोई सरोकार नहीं है। इन दलों का सिर्फ और सिर्फ एकमात्र यही उद्देश्य है कि जाति विशेष के बलबूते पर अपनी राजनीतिक सक्रियता रखते हुए परंपरागत वोट को साध कर रखा जाए। ऐसी स्थिति में कभी-कभी राजनीतिक सौदेबाजी भी की जाती रही है। आज भी छोटे बड़े चुनाव में लगभग हर एक प्रत्याशी भी जातीय समूह के थोक बंद वोट पाने की गरज से अपनी रीति-नीति को लचीला बनाते हैं। कुछ परंपरागत सीट से लड़ने वाले अपने जातीय समूह के बहुमत के आधार पर चुनाव में बहुमत पाते रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे में इनके एजेंडे में अपने समर्थक जातीय समूह के हित के आगे अन्य हित सदैव गौण ही रहा करते हैं।

हर छोटे-बड़े चुनाव में जातिगत समीकरण के आधार पर टिकट वितरण किया जाता है। ऐसे में यह मान लिया जाता है कि जाति विशेष के प्रत्याशी को जाति विशेष के मतदाता समर्थन देंगे ही देंगे। निश्चित रूप से ऐसा समर्थन विवेक शून्य ही हुआ करता है। ऐसी स्थिति में क्षेत्र विशेष में शेष जातियां एक प्रकार से अल्पसंख्यक सिद्ध होती चली जाती हैं। निश्चित रूप से जब समाजों के समूह में जाति विशेष का राजनीतिक दबदबा होगा, तब मनमानी के दौर को थामना भी आसान नहीं होगा। सत्ता के संचालन में बहुमत को स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन विभिन्न समाजों की परस्पर गतिविधियों को सत्ता से संचालित किया जाना उचित नहीं है।

राजनीतिक दलों के जातीय दृष्टिकोण के चलते विभिन्न समाजों के परस्पर तालमेल को बनाए रखना आसान नहीं है। निश्चित ही जब अलग-अलग समाज अलग-अलग राजनीतिक हैसियत रखेगा, 19/20 वाला अंतर तो आएगा ही आएगा। प्रत्येक नागरिक अपने मताधिकार के महत्व को पहचाने।

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