
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण व उससे जुड़ी ‘त्रेता की वापसी’ की कवायदों और श्रद्धालुओं की प्रायोजित रेलमपेल के हद से गुजर (और उतार पर आ) जाने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का बुरी कहें या असुविधाजनक खबरों से पीछा छूटता नहीं दिखाई देता। उल्टे राम मंदिर निर्माण का भरपूर श्रेय लूटने के बाद उसने अपनी राह में जैसे गलीचे बिछे होने की कामना की थी, उनके विपरीत बरबस उग आए कांटों में उलझती दिखाई देती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो गत लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट (जिसके अंतर्गत अयोध्या स्थित है) हारने और मिल्कीपुर विधानसभा उपचुनाव में जैसे-तैसे ‘उसका बदला चुकाने’ के बावजूद उसका हाल अच्छा नहीं हो पा रहा।
बीते अगस्त से ही बात शुरू करें तो अयोध्या नगर के कांग्रेसी अतीत वाले (यानी कांग्रेस से भाजपा में आए) उसके मेयर गिरीशपति त्रिपाठी द्वारा महीने के आखिरी हफ्ते में प्रमोद वन तिराहे से प्रख्यात मृदंगाचार्य (पखावजवादक) स्मृतिशेष स्वामी पागलदास द्वारा अपनी कुटिया में स्थापित संगीत आश्रम तक के मार्ग का कांची कामकोटि के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के नाम पर नामकरण का मामला कई हल्कों, खासकर संगीत-प्रेमियों में, हफ्तों उसकी आलोचना व असुविधा का कारण बना रहा।
इसलिए और कि कोई पच्चीस साल पहले अयोध्या के तत्कालीन भाजपाई विधायक लल्लू सिंह इस मार्ग को स्वामी पागलदास का नाम दे चुके थे। स्वामी के शिष्य विजयराम दास के अनुसार लल्लू सिंह के वक्त मार्ग पर लगाया गया नामकरण का पट्ट मवेशियों की लड़ाई में टूट गया था, इसलिए उन्होंने गत जनवरी में उनकी पुण्यतिथि के मौके पर महापौर को इसकी जानकारी दी तो आश्वासन पाया था कि जल्दी ही उस पट्ट को फिर लगवा दिया जाएगा। लेकिन महापौर ने अचानक अपना वह आश्वासन भुलाकर उस मार्ग का नाम उक्त शंकराचार्य के नाम पर रख दिया। स्वाभाविक ही विजयराम दास इससे व्यथित हुए और उन्होंने यह कहकर इस पर सवाल उठाया कि उनके जिन गुरु ने अयोध्या की संगीत परंपरा को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया और जीवनपर्यन्त वैष्णव परंपरा को समृद्ध करने में लगे रहे, क्या उनके नाम को इस तरह हटाना उचित है? इसे लेकर खलबली मची तो महापौर इस दावे के साथ सामने आए कि स्वामी पागलदास की स्मृतियों को और प्रभावी ढंग से संजोने के उपायों की रूपरेखा बना ली गई है और शीघ्र ही महानगरवासियों को उससे अवगत कराया जाएगा।
लेकिन ये पंक्तियां लिखने तक फिलहाल ऐसी किसी रूपरेखा का कोई अता-पता नहीं है और कई लोगों को भाजपा व विश्व हिंदू परिषद द्वारा स्वामी के जीवनकाल से ही उनसे बरते जाने वाले सौतेलेपन का इतिहास याद आ रहा है। कई लोग 15 अगस्त, 2018 को ‘अयोध्या में अब कोई पागलदास नहीं रहता’ शीर्षक से द वायर हिंदी में प्रकाशित लेख भी उद्धृत कर रहे हैं, जिसमें जिक्र है कि कैसे पागलदास भाजपा विहिप के राम मंदिर आंदोलन के रंग-ढंग से असहमत होने की कीमत चुकाने को विवश कर दिए गये थे। लोग यह भी कह रहे हैं कि महापौर को उनकी स्मृतियों का ऐसा निरादर करते वक्त और कुछ नहीं तो कम से कम अपना कांग्रेसी अतीत तो याद रखना चाहिए था।
बहरहाल, इस मामले को लेकर महापौर की आलोचनाएं ठीक से शांत भी नहीं हुई थीं कि उनके कांग्रेस के वक्त के कथित सहयोगी और फैजाबाद के राठ हवेली मुहल्ले के निवासी आरिफ आब्दी व दो अन्य के खिलाफ नगर निगम का सोलर लाइट लगवाने और कूड़ा उठाने का कथित टेंडर दिलाने के नाम पर 45 लाख रुपए की ठगी की अयोध्या कोतवाली में दर्ज एफआईआर का मामला गरमा गया। यह एफआईआर प्रमोद वन के ही निवासी देवनारायण त्रिपाठी ने लिखाई और महापौर पर इसके छींटे इस कारण कुछ ज्यादा ही पड़े कि सोशल मीडिया पर आब्दी के साथ उनकी कई तस्वीरें सामने आ गईं, जिनमें से एक में वे केक काटते भी नजर आ रहे थे। कई अन्य में एक ईद के मौके की थी, तो दूसरी महापौर के घर की और तीसरी इमामबाड़े की। इस सबको लेकर महापौर और भाजपा की लानत-मलामत को इस बात से समझा जा सकता है कि वरिष्ठ पत्रकार इंदुभूषण पांडेय ने लिखा: सच बात मान लीजिए, चेहरे पे धूल है। इल्जाम आईनों पे लगाना फिजूल है।
हद तो यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 75वां जन्मदिन आया, तो भाजपा के लिए उसे भी ठीक से मनाना संभव नहीं हुआ। इस अवसर पर बहुप्रचारित ‘सेवा पखवाड़ा अभियान’ के तहत रामकथा पार्क में लगाई गई प्रधानमंत्री की जीवन यात्रा पर आधारित सरकारी प्रदर्शनी भी अच्छी चचार्एं नहीं बटोर पाई। 18 सितंबर से दो अक्टूबर तक के लिए लगाई गई इस प्रदर्शनी में भाजपा के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि, कार्यकर्ता और सरकारी अमले के लोग तो खूब पहुंचे, लेकिन आम लोगों की ओर से बेरुखी ही दिखाई दी। इसके कारणों की तलाश शुरू हुई तो ठीकरा इस पर फूटा कि प्रदर्शनी राम कथा पार्क के पीछे स्थित पार्किंग स्थल के एक कोने में लगा दी गयी। तिस पर लगभग 30़30 फीट की जगह में प्रधानमंत्री की महज 25 तस्वीरें लगाई गई हैं, जबकि 67 लगाई जानी थीं। 25 तस्वीरों से जो जगह बची, उसमें प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीरों वाली तस्वीरें लगा दी गई ।
इसको लेकर चर्चा-कुचर्चा शुरू हुई तो रातो-रात भूल सुधार कर की इमेज शेड के बाहर लगा दी गईं। लेकिन तब तक जो संदेश जाना था, वह जा चुका था। इनमें से एक संदेश मोदी योगी अंतर्विरोध और उनके बीच चलते रहने वाले कथित ‘तू बड़ा कि मैं’ के खेल का भी था। ओछेपन के प्रदर्शन का तो था ही। यह सब चल ही रहा था कि फैजाबाद के फतेहगंज क्षेत्र की खीर वाली गली के पास के एक गेस्ट हाउस में एक बड़े सेक्स रैकेट के भंडाफोड़ ने भाजपा और उसकी प्रदेश सरकार को नये सिरे से असहज कर दिया। पुलिस ने आधी रात को मारे गये छापे में गणेश अग्रवाल नामक शख्स द्वारा संचालित उक्त चार मंजिला गेस्ट हाउस के चौथे तल से बिहार व गोरखपुर की 11 युवतियों समेत 14 लोगों को पकड़ा और मौके से देह व्यापार से अर्जित एक लाख 62 हजार रुपये बरामद किए। आसपास के लोगों की बार-बार की शिकायतों के बावजूद पुलिस ने आखिरकार किसके दबाव में रैकेट की ओर से आंखें मूंदे रखीं?
अखिलेश यादव ने पूछा कि जो सरकार अयोध्या जैसे उच्चतम पावन स्थल की पवित्रता व शुचिता बचाने और बनाए रखने में सक्षम नहीं है, क्या उसको सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार है? फैजाबाद के सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने सम्बंधित गेस्ट हाउस पर बुलडोजर चलाने की मांग करते हुए कहा कि पुलिस अपनी नाक के नीचे चल रहे इस सेक्स रैकेट को संरक्षण दे रही थी, जबकि आसपास के लोग रैकेट चलाने वाले की लगातार शिकायतें कर रहे थे। उन्होंने मांग की कि इसके लिए जिम्मेदार पुलिस अफसरों पर कड़ी कार्रवाई और रैकेट से जुड़े लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए।

