डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
‘अरी ओ! दस दिये क्या भाव दिए?’ एक आवाज हवा को चीरती हुई आई, जैसे किसी महानगरीय देवी ने अपने स्वर्गिक मुख से धरती के तुच्छ प्राणी को संबोधित किया हो। सामने, धूल-धक्कड़ में सने ‘गोकुल’ नामक एक कुम्हार ने अपनी फटी-पुरानी धोती पर मिट्टी झाड़ते हुए कहा, ‘बीस के दस, माईजी।’ इतना सुनना था कि ‘मिसेज चंपावती’ की आँखों में पेट्रोल डाल दिया गया। वे फैलकर इतनी बड़ी हो गईं, मानो अभी-अभी उन्हें ‘सोने की चिड़िया’ के दर्शन हुए हों। ‘राम! राम! इतना महंगा? अरे ओ अभाग! कौन सा सोना-चांदी लगा है इसमें?
मुफ्त की मिट्टी, मुफ्त का पानी! हां! मिट्टी तो तुम क्या, तुम्हारी सात पीढ़ियां भी खरीदकर नहीं लाई होंगी! यह तो उस नदी की है, जिसके किनारे हम बचपन में लोटा धोते थे। और हां, पानी? अरे, उस पर तो सरकार का अधिकार है! तुम कौन होते हो उसे बेचने वाले? मेहनत! कैसी मेहनत? चाक घुमाना? यह तो तुम्हारे पुरखों का पाप है जो तुम भुगत रहे हो। एक तो पाप भुगतो, ऊपर से हमें लूटो! कैसा जमाना आ गया है!’ चंपावतीजी का स्वर इतना तीखा था कि आसपास के कुत्तों ने भी अपनी पूंछ दबा ली। गोकुल ने हाथ जोड़ लिए, उसकी आंखों में उस नदी का पानी छलक रहा था, जो अब केवल ‘माईजी’ के लोटे धोने के काम आती थी। उसने कहा, ‘माईजी, शहर में अब नदी-किनारा मॉल बन गया है। मिट्टी अब ‘स्पेशल अर्थ’ के नाम से बिकती है। पानी का बिल आता है, और जो यह मेरी बिजली वाली ‘चक्री’ है न, वह तो बिजली के बिल से मेरा खून चूस लेती है। मेहनत! हां माईजी, यह मिट्टी भी खून मांगती है, और भट्टी की आग तो आत्मा तक जला देती है। बचता क्या है? बस, यह टूटा-फूटा घर और दो वक्त की रूखी रोटी का जुगाड़!’
चंपावतीजी, जिनकी बेशकीमती कार चार गली दूर खड़ी, अपने ड्राइवर को सता रही थी, ने एक महान समझौता करने का निर्णय लिया। उनकी निगाह में गोकुल को ‘लूटना’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक न्याय’ की स्थापना करना था। ‘देख, गोकुलवा! मैं हूं सेठ की बहू। पांच-दस दिये वाली ग्राहक नहीं हूं मैं। मैं पूरे पचास दिये ले लूंगी। लेकिन मेरी एक शर्त है। मैं पचास दिये का एक दाम दूंगी, जिससे तेरा भी फायदा हो और मेरा भी। यह जो तू बीस के दस बता रहा है न, यानी सौ के पचास… तो तू एक काम कर। नब्बे रुपए दे दे। मेरी बात मान ले! मैं तेरा नाम सबको बताऊंगी।’ गोकुल ने मन ही मन हिसाब लगाया। अगर वह नब्बे में देता है, तो उसकी आज की मेहनत का मोल दो वक्त के खाने जितना भी नहीं बचेगा। पर ग्राहक छोड़ना भी तो आजकल का सबसे बड़ा पाप है। उसने मजबूरन हाथ जोड़े और कहा, ‘माईजी, बस अस्सी मत बोलो। नब्बे रुपए दे दो।’
अब आया चंपावतीजी का असली रंग। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और कस लिया, मानो किसी युद्ध की घोषणा करने जा रही हों। ‘अस्सी! हां, अस्सी के पचास! इससे एक रुपया ऊपर नहीं दूंगी मैं! यह ‘सौदेबाजी’ है, गोकुलवा। तुम नहीं जानते, बाजार में ऐसे ही माल बिकता है। नहीं तो मैं जा रही हूं। याद रखना, एक बड़े ग्राहक को खोने का पाप लगेगा तुझे!’ गोकुल का हाथ पैकेट से हटा, उसने नम आंखों से ‘न हो पायेगा, माईजी’ कहकर पैकेट पीछे खींच लिया।
उसका दिल जानता था, इस सौदेबाजी में उसकी कला, उसकी विरासत, और उसकी ‘अस्सी’ साल की मां की दवा का मोल लगाया जा रहा था। चंपावतीजी ने एक अंतिम ‘विजयी’ मुस्कान दी, अपनी अकड़ बरकरार रखी और कार में बैठकर, धूल उड़ाती हुई, शहर की ओर चली गईं।
कुछ ही घंटों बाद, चंपावतीजी एक ऐसे मॉल के स्वर्गिक, वातानुकूलित और भव्य प्रांगण में थीं, जहां की जगमगाहट में गोकुल के दीयों की रोशनी एक जुगनू के समान भी न ठहर पाती। सब कुछ ‘सेल’ के नाम पर दुगुने दाम पर बिक रहा था। चंपावतीजी की बेशकीमती ट्रॉली पहले से ही ब्रांडेड डिब्बों, अनावश्यक कपड़ों और ‘आफर’ वाली चीजों से भरी हुई थी। पतिदेव ने लंबी लाइन देखकर आह भरी। ‘अरे! सुनिए! दिये तो भूल ही गए!’ चंपावतीजी ने पति को याद दिलाया। उन्हें याद आया कि घर में ‘ट्रेडिशनल लुक’ देने के लिए दिये तो जरूरी हैं। तभी उनकी निगाह कोने में रखी एक शानदार टेबल पर पड़ी। वहां, चमकदार, प्लास्टिक के पैकेटों में कुछ दीये रखे थे। एक बड़ा सा बोर्ड लगा था, जो उनकी आंखों को शांति देने वाला था— ‘नदी की पवित्र मिट्टी से निर्मित हस्तकला के अद्भुत दीपक! 100 रुपये के दस, विशेष आफर मूल्य: मात्र 50 रुपये!’
पचास रुपये में दस! यानी सौ रुपये में बीस! गोकुलवा तो ‘बीस के दस’ मांग रहा था! यानी दस गुना ज्यादा!’ अरे! पापी कुम्हार! मुझे लूट रहा था!’ चंपावतीजी के मन में विचार आया। उन्होंने बिल काउंटर की असहनीय लंबी लाइन को देखा और एक सेकंड में हिसाब लगाया। उन्होंने तुरंत पांच पैकेट, यानी पचास दीये, उठाकर अपनी ट्रॉली में रख लिए। पांच पैकेट! कुल ढाई सौ रुपए! यह ‘अस्सी’ रुपए के पचास दीयों की मांग से कहीं ज्यादा था, लेकिन यह ‘आफर’ था! यह ‘डिस्काउंट’ था! और हां, यह मॉल से ‘खरीददारी’ थी, जो एक प्रकार का ‘पुण्य’ होता है। गोकुल के दीयों की ‘अस्सी’ रुपए की कीमत उन्हें ‘महंगी’ लगी थी, क्योंकि वह ‘सीधे गरीब’ को जा रहे थे।
लेकिन मॉल के दीयों की ‘ढाई सौ’ की कीमत उन्हें ‘सस्ती’ लगी, क्योंकि वह एक ‘महानगरीय ब्रांड’ के माध्यम से आ रही थी, जिसके बिल पर ‘जीएसटी’ का मुहर था। ट्रॉली में पड़े, पैकबंद, मॉल के दीये-जो शायद गोकुल की भट्टी के ही ‘रिजेक्टेड पीस’ रहे होंगे – अब गोकुल की किस्मत पर अट्टहास कर रहे थे। वे हंस रहे थे कि कैसे ‘पवित्र मिट्टी’ का नाम और ‘आफर’ का जाल महानगरीय चेतना को इतना अंधा बना देता है कि वह गरीब की रोटी की कीमत तोड़ने में गर्व महसूस करती है, लेकिन ब्रांडेड लूट पर सिर झुका देती है। और हां, गोकुलवा! तूने ग्राहक खोया! तूने अपनी कला का मोल नहीं समझा! तूने केवल दो रुपये कमाने की सोची, जबकि यहां तो तू ढाई सौ रुपये का ग्राहक खो चुका था! यह व्यंग्य नहीं, यह तो इस ‘महानगर’ की आत्मा की सिसकी है, जो मिट्टी के दीये में तेल नहीं, बल्कि गरीब का खून जलाती है।

