Sunday, February 8, 2026
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अंतिम सांसें गिन रहा लाल आतंक

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नक्सलवाद अब अंतिम सांसें गिन रहा है। टॉप लीडर्स का सुरक्षाबल के जवान एक-एक कर शिकार कर रहे हैं। बस्तर में सक्रिय रहे बड़े नक्सली अब तीन ही बचे हैं। सुरक्षाबलों ने तमाम बड़े नेताओं को चुन-चुनकर मारा है। वहीं, कुछ बड़े नेताओं ने सुरक्षाबलों के सामने हथियार डाल दिए हैं। करीब दो दशकों तक बस्तर के जंगलों में एक ही नाम दहशत की तरह फुसफुसाया जाता रहा माड़वी हिड़मा। सुरक्षा बलों के लिए वह मानो जंगल का भूत था, माओवादी संगठन के भीतर एक जीवित किंवदंती, और भारत के सबसे खूनी नक्सली हमलों का मास्टरमाइंड। उसकी कहानी क्रूरता, चतुराई और लगभग पौराणिक-सी बच निकलने की क्षमता का संगम थी। 18 नवंबर की सुबह छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश की सीमा से लगे घने मरेडमल्ली जंगलों में जब मुठभेड़ खत्म हुई, तब यह अध्याय भी खत्म हो चुका था। हिड़मा, जिसे भारत का सबसे भयावह गुरिल्ला कमांडर माना जाता था, मारा जा चुका था। उसके साथ उसकी पत्नी राजक्का और उसके चार सबसे भरोसेमंद लड़ाके भी ढेर मिले। भारत की आंतरिक सुरक्षा को वर्षों से दहला देने वाले घातक हमलों के दौर का अंत इसी के साथ हो गया।

हिडमा संगठन में सिर्फ हमले का मास्टरमाइंड ही नहीं था, बल्कि संचालन, रणनीति, निगरानी और कैडरों के प्रशिक्षण में भी उसकी भूमिका विशेष थी। वह संगठन के वित्तीय फैसलों में शामिल रहता था, हर कैडर की पृष्ठभूमि की विस्तृत जानकारी रखता था, रेडियो संदेशों पर पैनी नजर रखता था। हिड़मा पर 1 करोड़ रुपए का इनाम घोषित था। आंध्र प्रदेश के अलूरी सीताराम राजू जिले में सुरक्षाबलों ने जो घेराबंदी कर मुठभेड़ की, तो नक्सलियों के शवों में हिड़मा, उसकी पत्नी राजक्का उर्फ राजे और चार अंगरक्षकों के शव भी पाए गए। हिडमा कितना खूंखार और हत्यारा नक्सली था, इसी से स्पष्ट होता है कि वह 263 जवानों की जिंदगी छीनने का गुनहगार था। उसने 150 से अधिक नक्सली हमलों की रणनीति तय की थी, लेकिन 26 बड़े और खौफनाक हमलों का ह्यमास्टरमाइंडह्ण वही था। 2010 का वह दिन याद आते ही कंपकंपी छूटने लगती है और मन गुस्से, आक्रोश से भर उठता है, जब हिडमा की रणनीति के आधार पर, बारूदी सुरंग बिछा कर, दंतेवाड़ा में एक साथ सीआरपीएफ के 76 जवानों को ‘शहीद’ कर दिया गया था।

ऐसा हमला फिर दोबारा नहीं किया जा सका, लेकिन 2017 और 2021 में नक्सली सीआरपीएफ पर दो हमले करने में कामयाब जरूर रहे। उन हमलों में क्रमश: 24 और 23 जवान मारे गए थे। उसके बाद सीआरपीएफ ने अपनी रणनीति में आमूल परिवर्तन किया। हिड़मा छत्तीसगढ़ के 32 कांग्रेस नेताओं का भी हत्यारा था। उस हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र करमा सरीखे वरिष्ठ कांग्रेसी भी मारे गए। कांग्रेस का राज्य स्तरीय नेतृत्व ही शून्य हो गया था। बहरहाल ऐसे भी संकेत सामने आए हैं कि हिड़मा उस मुठभेड़ में मारे जाने से पहले आत्मसमर्पण की सोच रहा था।

उसने एक स्थानीय पत्रकार से संपर्क किया था और उसे बताया था कि वह जंगलों से बाहर आने पर विचार कर रहा है, लेकिन हथियार डालने से पहले वह सरकार के साथ अपने कुछ मुद्दों और चिंताओं पर बात करना चाहता था, लिहाजा उसने पत्रकार को मध्यस्थ बनाया था, लेकिन वह संवाद संभव न हो सका और अंतत: हिड़मा को ढेर होना पड़ा। दरअसल यह बड़ा मुद्दा नहीं है कि हिड़मा सरीखे नक्सली मारे जा रहे हैं और हिड़मा के बाद माओवादी सशस्त्र संघर्ष और विद्रोह बहुत कमजोर हो जाएगा, अंतत: वे 31 मार्च, 2026 से पहले ही समाप्त हो सकते हैं।

दो बिन्दु गौरतलब हैं। एक, इस साल सुरक्षाबलों के लगातार आॅपरेशन और आक्रामक दबाव के कारण 1225 नक्सलियों को आत्मसमर्पण करना पड़ा है। हिड़मा का अंत ताड़मेटला के 76 शहीदों का दर्द नहीं मिटाता, न झीरम की राजनीतिक खाली जगह, न बुरकापाल की विधवाओं की रातें, न मिनपा के परिवारों का शोक। लेकिन यह बस्तर के लिए एक नए दौर की शुरूआत जरूर करता है। जंगल जहां कभी उसका राज था, अब गोलीबारी की खामोशी में इतिहास एक नया पन्ना पलटता है। डर गायब है। किंवदंती खत्म हो गई है। और बहुत समय बाद बस्तर उसकी छाया के बिना सांस ले रहा है। हिडमा के खात्मे के एक दिन बाद नक्सलियों के टॉप लीडर देवजी को भी ढेर करने की खबर है। चर्चा है कि छत्तीसगढ़-आंध्र प्रदेश बॉर्डर पर मारेडुमिल्ली के जंगलों में हुई मुठभेड़ में पोलित ब्यूरो मेंबर और नक्सल महासचिव देवजी समेत कुल सात नक्सली मारे गये है। इनमें तीन महिला नक्सली भी शामिल हैं। एक नक्सली की पहचान मेटुरी जोगा राव उर्फ ‘शंकर’ के रूप में हुई है, जो आंध्रझ्रओडिशा बॉर्डर यानी एओबी डिवीजन का टेक्निकल एक्सपर्ट माना जाता था। दूसरी ओर 50 नक्सली भी गिरफ्तार किये गये हैं। इनमें नक्सलियों का जगरगुंडा एरिया कमेटी प्रमुख नक्सली कमांडर लखमा भी शामिल हैं।

आपरेशन और मुठभेड़ों में 270 से अधिक नक्सली मार दिए गए हैं और 680 से अधिक गिरफ्तार किए जा चुके हैं। दरअसल माओवादी नक्सलियों में नेतृत्व और रणनीति को लेकर विभाजन गहराता जा रहा है। नक्सलवाद के वैचारिक प्रमुख एवं मुख्य प्रवक्ता एम. वेणुगोपाल राव ने नक्सलियों के नाम दो पत्र जारी किए थे। सारांश यह था कि अब सशस्त्र संघर्ष पर विराम लगा देना चाहिए। वामपंथी विद्रोह के बुनियादी कारणों को संबोधित करना चाहिए।

जिस सोच के साथ नक्सलवाद की शुरुआत की गई थी, वह मकसद नाकाम रहा है, क्योंकि देश की आदिवासी आबादी आज भी भूमिहीन है और हाशिए की जिंदगी जीने को विवश है। वे समुदाय भारत में सबसे अधिक गरीब हैं। करीब 12.90 करोड़ में से 6.50 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी के शिकार हैं। अर्थात आय के अलावा, अपर्याप्त पोषण, शिक्षा की कमी, खराब स्वास्थ्य, पेयजल की कमी, बिजली और आवास सरीखी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित हैं। वनों पर अधिकार के उनके दावों को नकारा जाता रहा है, बल्कि उनसे जबरन छीन लिए जाते हैं। उनके इलाकों में ग्राम सभा की अनुमति के बिना ही कथित विकास की परियोजनाएं स्वीकृत कर दी जाती हैं।

मोदी सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूरी तरह अंत का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब सुरक्षा अभियानों के साथ सामाजिक-आर्थिक न्याय की गति भी समानांतर चले। इतिहास बताता है कि किसी उग्रवादी आंदोलन को केवल गोलियों से खत्म नहीं किया जा सकता-उसकी जड़ें विकास, सम्मान और विश्वास से ही कमजोर पड़ती हैं। वामपंथी आतंकवाद पर संपूर्ण जीत के लिए इन मुद्दों को पहले संबोधित करना जरूरी है। लेकिन जिस वैचारिकता के आधार पर उनका आंदोलन करीब छह दशक तक जारी रहा, वह किसी अन्य रूप या विद्रोह में दोबारा उभर सकती है।

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