अब्राहम लिंकन भोले भाले और मासूम नेता थे, इसीलिए उन्होंने लोकतंत्र को जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन बताया था। आजकल लोकतंत्र नेता का, नेता के द्वारा और नेता के लिए शासन है, यकीन न हो तो नेता और जनता की हालत देख लीजिए। लोकतंत्र में नेता खुशहाल व जनता बदहाल होती है फिर भी नेता अपनी बदहाली दिखाकर वोट छिन लेते हैं और जनता को पांच साल तक तरसाते हैं।जनता की खुशहाली केवल सोशल मीडिया तक सीमित है। सोशल मीडिया ने बेकार लोगों को भी काम दे दिया है ये बेकार लोग दिन भर आए हुए संदेशों को फॉरवर्ड करते रहते हैं। सेवानिवृत्त व्यक्ति दिनभर मैसेज भेजते हैं या किसी न किसी से झगड़ा करते रहते हैं।
अमित से बैंक में मेरी पहली मुलाकात हुई। मैंने पूछा-तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं? अमित ने कहा बेरोजगार हैं? मैंने पूछा, क्या मतलब! उसने कहा, अरे यार रिटायर्ड हैं। ऐसे ही नवजात 272 बेरोजगारों को ग्यारह साल बाद होश आ रहा है कि लोकतंत्र को खतरा पैदा हो गया है। इन्होंने लोकतंत्र को नए ढंग से परिभाषित किया है। उनके अनुसार प्रश्न पूछने से लोकतंत्र कमजोर होता है। अब इन्हें कौन समझाए कि प्रश्न पूछने से लोकतंत्र मजबूत होता है। इन्होंने ग्यारह बरस तक एक भी चिट्ठी नहीं लिखी। न ही किसी का विरोध किया और न ही समर्थन। अचानक इनका जमीर जागा और लेटर लिख मारा। वैसे ये केवल 272 क्यों हैं, कम से कम यहां तो 400 पार कर सकते थे।
देश के बुद्धिजीवियों को समझना उतना ही कठिन है, जितना कि जीएसटी के नियमों को समझना। पत्र में काफी कुछ लिखा है। इन 272 बुद्धिजीवियों के पत्र लिखने के बहुत पहले ही उन्होंने हमें बता दिया था- हमारे देश के बुद्धिजीवी ऐसे शेर हैं, जो सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं। वैसे बुद्धिजीवी को अपनी बुद्धि से सोचना चाहिए, लेकिन बहुत से बुद्धिजीवी दूसरों की बुद्धि से सोचते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वैसे हमारे आज के बुद्धिजीवी ऐसे शेर हैं, जो भेड़िए के इशारे पर डिस्को करने लगते हैं।
बाजार में ऐसे ही एक सज्जन से मुलाकात हो गई। वह कहने लगे, नेता प्रतिपक्ष केवल सवाल पूछते हैं। मैंने कहा, यही उनका काम है। सज्जन बोले, वे चुनाव आयोग से भी लगातार सवाल कर लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। मैंने कहाख् सवाल पूछने से लोकतंत्र मजबूत होता है। सज्जन ने तंज किया, ऐसा है क्या! वे इतने बड़े पद पर हैं और आए दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करते रहते हैं। क्या उन्हें ऐसा करना शोभा देता है। मैंने कहा, इसमें आपको क्या दिक्कत है? सज्जन फिर ढिठाई से बोले, आपको बता रहा हूं, लेकिन आप किसी से भी नहीं कहेंगे। मैंने कहा, जी मैं यह बात किसी से नहीं कहूंगा। आप बताएं। बेफिक्र रहें। यह बात मेरे और आपके बीच ही रहेगी। किसी तीसरे तक नहीं जाएगी। सज्जन ने मेरे कान में फुसफसाया, उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस हमारे नेता को शर्मिंदा कर देते हैं! उनसे जवाब नहीं बनता।
न चाहते हुए भी हम दोनों हंस पड़े।

