
हाल ही में राजस्थान में महिलाओं की वर्जिनिटी टेस्ट के कुछ मामले सामने आए हैं, जिसके बाद एक बार फिर इस विषय पर बहस छिड़ गई है। यह ऐसा विषय है, जिस पर आमतौर पर बात करने से तो हम बचते हैं, लेकिन कुप्रथाओं में यही टेस्ट चादर में धब्बे नहीं लगने पर समाज में महिलाओं के लिए बड़ा कलंक साबित हो रहे हैं। वर्जिनिटी मसला यूं तो स्त्री और पुरुष दोनों से जुड़ा है, लेकिन 21वीं सदी जैसे आधुनिक युग में भी इसे अधिकांश महिलाओं की ही पवित्रता जांच यानी इस टेस्ट से तोला जाता रहा है। वर्जिनिटी टेस्ट की इस परंपरा को राजस्थान में कुकड़ी प्रथा के नाम से जानते हैं।एक समाज विशेष की प्रथा के चलते वर्जिनिटी टेस्ट में फेल होने पर एक युवती को ना सिर्फ प्रताड़ित किया गया, बल्कि दस लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया। इस मामले में वर्जिनिटी टेस्ट के लिए चली आ रही प्रथा के नाम पर युवती और उसके परिवार को ये प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
कुछ समय पहले भीलवाड़ा के बागौर गांव की 24 वर्षीय युवती की शादी उसी गांव में हुई। शादी के बाद सांसी समाज ने कुकड़ी प्रथा के तहत नई दुल्हन का वर्जिनिटी टेस्ट लिया। टेस्ट में दी गई सूत की गेंद, जिसे कुकड़ी कहा जाता है, में सुहागरात के दिन बिछाई चादर पर अगले दिन खून के धब्बे नहीं मिलने पर विवाहित युवती को टेस्ट में फेल बता मारपीट कर प्रताड़ित किया गया। टेस्ट में फेल होने का कारण पूर्व में एक युवक की ओर से युवती के साथ दुष्कर्म करना बताया गया। स्थानीय पंचायत में सांसी समाज की पंचायत बुलाई गई और वधू पक्ष पर दस लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया।
कुकड़ी प्रथा राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों में रहने वाली सांसी जनजाति में प्रचलित एक विवादास्पद और दमनकारी सामाजिक कुप्रथा है, जिसमें शादी के बाद दुल्हन के कौमार्य की परीक्षा ली जाती है। इस प्रथा के तहत सुहागरात (शादी की पहली रात) पर एक सफेद कपड़ा या धागा (जिसे कुकड़ी कहा जाता है) कमरे में रखा जाता है। सुबह समुदाय के बड़े-बुजुर्ग या पंचायत उस कपड़े की जांच करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संभोग के दौरान रक्तस्राव (यानी कौमार्य का प्रमाण) हुआ है या नहीं। यदि महिला इसमें विफल हो जाती है, तो उसे चरित्रहीन मानकर ससुराल वाले छोड़ सकते हैं। कभी-कभी उसके परिवार पर भारी जुर्माना भी लगाया जाता है।
असल में वर्जिनिटी टेस्ट एक अवैज्ञानिक और क्रूर तरीका है, जिसे सुप्रीम कोर्ट और कई अदालतों ने असंवैधानिक, पितृसत्तात्मक और मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया है, क्योंकि यह महिला की गरिमा और निजता का हनन करता है। आधुनिक विज्ञान और कानून भी इसे अस्वीकार करते हैं और पुरानी, अतार्किक प्रथा मानते हैं। कौमार्य भंग होने के कई कारण हो सकते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह एक सामाजिक अवधारणा है, चिकित्सा स्थिति नहीं है। इसका कोई एक निश्चित शारीरिक संकेत नहीं है। कई सामान्य कारणों में यौन क्रिया एक प्रमुख और सामान्य कारण है। किसी भी तरह की पेनेट्रेटिव यौन क्रिया, जिसमें यौन संभोग शामिल है, को पारंपरिक रूप से कौमार्य भंग का कारण माना जाता है।
आनुवंशिकी और प्राकृतिक विविधता में कुछ लोगों में जन्म से ही हाइमन बहुत कम या ना के बराबर होती है। वहीं शारीरिक गतिविधि जैसे घुड़सवारी, जिमनास्टिक या साइकिलिंग जैसी शारीरिक गतिविधियों या खेलकूद के कारण भी हाइमन खिंच सकती है या फट सकती है। पेल्विक क्षेत्र में कोई दुर्घटना या चोट लगना भी एक कारण हो सकता है। कुछ मामलों में टैम्पोन के उपयोग से भी हाइमन पर प्रभाव पड़ सकता है। कुछ चिकित्सा जांच या सर्जरी के दौरान भी हाइमन पर असर पड़ सकता है। वर्जिनिटी टेस्ट पूरी तरह से अवैज्ञानिक है और महिलाओं के शोषण का एक माध्यम बन गए हैं। आधुनिक समाज, शिक्षित लोग और महिला संगठन इस प्रथा का कड़ा विरोध करते हुए इसके उन्मूलन की मांग कर रहे हैं। कई मामलों में पीड़ितों ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई है। इस प्रथा ने ना सिर्फ कई बेटियों की जिंदगी खराब की है, बल्कि कुप्रथा की प्रताड़नाओं के चलते कई जीवन भी समाप्त किए हैं। इसके बाद समाज विशेष के कई लोग व संबंधित पंचायत भी अब कानूनी पेंच के चलते प्रथा को बंद करने के दावे भी करने लगे हैं।
विभिन्न देशों के सर्वोच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालयों ने भी वर्जिनिटी टेस्ट को असंवैधानिक और महिला की गरिमा के विरुद्ध माना है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार, यूएन वुमन और डब्ल्यूएचओ ने इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाने का आह्वान किया है। हालांकि ये प्रतिबंध सिर्फ सरकार, सामाजिक संगठन या न्यायालयों के दखल तक सीमित नहीं रखे जा सकते। हम सभी को मिलकर और सामाजिक दखल बनाकर ऐसी कुप्रथाओं को रोकना होगा, जो समाज में महिलाओं में लैंगिक भेदभाव को पनपा रहे हों।

