Thursday, May 7, 2026
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मेहमान वही, जिसे मेजबान बुलाए

यदि मेहमान की परिभाषा का विश्लेषण किया जाए, तो निष्कर्ष निकलेगा, कि नश्वर जगत में जितने भी प्राणी हैं, सभी मेहमान हैं। फिर भी समाज में मेजबान और मेहमान को अलग अलग परिभाषाओं में विभक्त किया गया है। कार्यक्रम चाहे किसी भी प्रकार का हो, सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो, पारिवारिक हो या सरकारी। कार्यक्रम में मेहमान कौन होगा, यह तय करना मेजबान का दायित्व है। मेजबान की मर्जी, चाहे जिसे बुलाये, चाहे जिसे न बुलाये। फिर भी कुछ लोगों को लगता है कि आयोजन किसी भी प्रकार का हो, उसमें आमंत्रित होने का उन्हें मौलिक अधिकार है ही। निमंत्रण पत्र भले ही मधुर संबंधों के आधार पर दिए जाएं या मेहमान की हैसियत के आधार पर, इसमें किसी व्यक्ति, संस्था या रिश्तेदार को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

फिर भी देश में एक वर्ग ऐसा है, जो यह चाहता है, कि कोई भी आयोजन हो, बिना उसकी उपस्थिति के संपन्न नहीं होना चाहिए। वैसा आयोजन में उपस्थित होने या न होने का निर्णय लेना उसके अधिकार क्षेत्र में है, किन्तु उसे निमंत्रण अवश्य मिले, क्योंकि यह उसका विशेषाधिकार है। बहरहाल, पारिवारिक आयोजनों में ऐसा नहीं होता। कभी-कभी फूफा को भी मांगलिक उत्सवों का निमंत्रण नहीं दिया जाता। भले ही फूफा लाख प्रयास करे। आजकल तो परिवार में सगे रिश्तेदारों को भी बुलाने से परहेज किया जाने लगा है। ऐसे में किसी अन्य को बुलाने या न बुलाने पर मर्जी मेजबान की ही होती है। उसमें यदि कोई बुरा मानता है, तो मानता रहे. मेजबान को इसकी कोई परवाह भी नहीं होती। आजकल सम्मान दो, सम्मान दो, का चलन है। सम्मान दोगे तो सम्मान लोगे, वर्ना किसी का क्या बिगाड़ लोगे?

अभी एक सज्जन को किसी आयोजन में नहीं बुलाया गया, वे इतने नाराज नहीं हुए, जितने उनके परिवार के नौकर चाकर परेशान हुए। आयोजन का निमंत्रण न मिलने पर जमीन आसमान एक कर दिया, कि आयोजन में निमंत्रित होना, उन सज्जन का मौलिक अधिकार था, आयोजन में जाना या न जाना भी मौलिक अधिकार ही था। मुझे एक मित्र के बेटे ने अपने पुत्र के विवाह का निमंत्रण फोन पर दिया। मैंने स्वीकार किया। निमंत्रण जैसे भी मिले, उसे स्वीकार करना चाहिए, किंतु कभी कभी कुछ रिश्तेदार कुछ प्रतिष्ठित व्यक्ति मेहमानों की लिस्ट बनाते समय मेरा नाम मेहमानों की सूची में न लिखें, तो क्या मुझे भी बुरा मानकर विरोध करना चाहिए?

मुझे नहीं लगता कि निमंत्रण मिलने या न मिलने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर बात का बतंगड़ बनाया जाए। यह मेजबान के अधिकार क्षेत्र का विषय है, जिसमें मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। बाकी फूफा आचरण को अपने अपने मतानुसार बुरा मानने या न मानने का स्वतंत्र अधिकार है ही. एक बार को व्यक्ति मान अपमान को भूलकर बुरा न भी मानें, किन्तु उनके घर के नौकर चाकर, उसके मित्र, संबंधी निमंत्रण न मिलने से उनके अपमान की व्याख्या करने से बाज आएं, तो छोटी छोटी बातों पर बहस न हो तथा निमंत्रण मिलना या न मिलना कोई मुद्दा ही न बने।

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