Saturday, May 9, 2026
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Khaleda Zia: भारत में जन्मी ‘पुतुल’ से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनने तक, खालिदा जिया की प्रेरक कहानी

जनवाणी ब्यूरो |

नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और प्रमुख राजनीतिक दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष खालिदा जिया का 30 दिसंबर (मंगलवार) को निधन हो गया। वे 80 वर्ष की थीं और लंबे समय से बीमार चल रही थीं। खालिदा जिया का इलाज ढाका स्थित एवरकेयर अस्पताल में चल रहा था, जहां उन्होंने सुबह लगभग छह बजे अंतिम सांस ली। बीएनपी ने इस संबंध में एक बयान जारी किया और खालिदा के निधन पर शोक व्यक्त किया।

खालिदा जिया की राजनीतिक यात्रा

खालिदा जिया का जन्म 1945 में बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के दिनाजपुर में हुआ था। उनका परिवार फेनी से था और उनके पिता इस्कन्दर अली मजूमदार चाय के व्यापारी थे। उनका शुरुआती नाम खालिदा खानम ‘पुतुल’ था। जब वे दो साल की थीं, तो भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान के हिस्से में चले गए और वहां बसे। उन्होंने अपनी शिक्षा मिशनरी स्कूल और गवर्नमेंट गर्ल्स हाईस्कूल से पूरी की। 1960 में, उनका विवाह पाकिस्तानी सेना के अधिकारी और तत्कालीन कैप्टन जियाउर रहमान से हुआ, और फिर उनका नाम खालिदा जिया रहमान पड़ा।

राजनीति में कदम रखना

जियाउर रहमान की हत्या के बाद, खालिदा जिया ने बीएनपी को पुनः जीवित रखने की कोशिश की। 1975 में, बंगबंधु मुजीब-उर-रहमान की हत्या और जियाउर रहमान द्वारा सैन्य तख्तापलट के बाद, खालिदा राजनीति से दूर रहीं। लेकिन उनके पति की हत्या के बाद, बीएनपी को बचाने के लिए उनका संघर्ष शुरू हुआ, और वे पार्टी की राजनीति में सक्रिय हो गईं। आठ साल के संघर्ष और आंदोलनों के बाद, खालिदा जिया ने बीएनपी को फिर से जीवित किया और 1991 में पहली बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं।

सत्ता और विपक्ष

पहला कार्यकाल (1991-1996)

1991 में, खालिदा जिया ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल की शुरुआत की। इस दौरान उन्होंने अपने पति की राजनीतिक धारा को आगे बढ़ाया और इस्लाम को शासन में प्रमुख भूमिका देने का समर्थन किया। साथ ही, निजी उद्यमों और उदारवादी विकास नीतियों को बढ़ावा दिया। इस समय बांग्लादेश के रुख में भारत से दूरी बढ़ी, और बीएनपी ने अमेरिका, चीन और अरब देशों से संबंधों पर जोर दिया। हालांकि, 1996 में चुनावों में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि विरोध प्रदर्शनों और चुनावी गड़बड़ियों के चलते उनका कार्यकाल समाप्त हुआ।

दूसरा कार्यकाल (2001-2006)

2001 में खालिदा जिया ने फिर से प्रधानमंत्री का पद संभाला। इस कार्यकाल में उन्होंने भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने का वादा किया। हालांकि, इस दौरान बीएनपी का गठबंधन जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी दलों से था, जिससे भारत विरोधी नीतियों को बढ़ावा मिला। इस समय बांग्लादेश में आतंकवादियों और अलगाववादियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन गया था, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद बढ़ा था। 2006 में बांग्लादेश में प्रदर्शन और असंतोष के कारण उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा, और 2008 तक अंतरिम सरकार का शासन रहा।

विपक्ष में रहना: 2008 के बाद की स्थिति

2008 में हुए चुनावों में बीएनपी को हार का सामना करना पड़ा, और इसके बाद से खालिदा जिया और उनकी पार्टी सत्ता से बाहर रही। वे विपक्षी नेता के तौर पर सक्रिय रहीं और जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी दलों के साथ गठबंधन किया। 2014 के चुनावों में बीएनपी ने बहिष्कार किया, और शेख हसीना ने फिर से सत्ता में वापसी की।

भ्रष्टाचार के आरोप और जेल में समय

2018 में खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी ठहराया गया और उन्हें 17 साल की सजा सुनाई गई। हालांकि, उनकी सजा को राजनीतिक प्रतिशोध माना गया। वे 2018 के चुनावों के दौरान जेल में रही थीं, लेकिन 2020 में कोरोनावायरस महामारी के कारण उनकी सजा को निलंबित कर दिया गया और उन्हें स्वास्थ्य कारणों से रिहा कर दिया गया।

स्वास्थ्य समस्याएं और हालिया स्थिति

खालिदा जिया का स्वास्थ्य 2010 के मध्य से ही बिगड़ने लगा था, और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। जनवरी 2024 में उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें इलाज के लिए लंदन भेजा गया। वहां से ठीक होने के बाद वे मई 2024 में बांग्लादेश लौटीं, लेकिन नवंबर 2024 में एक बार फिर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उन्हें ढाका के अस्पताल में भर्ती कराया गया। अंततः, 30 दिसंबर 2024 को उनका निधन हो गया।

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