जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख खालिदा जिया का निधन हो गया है। उनका निधन बांग्लादेश की राजनीति के उस दौर का समापन है, जिसे सत्ता संघर्ष, तीखे टकराव और दो ध्रुवों में बंटी राजनीति के लिए जाना जाता है। खालिदा जिया और अवामी लीग की नेता शेख हसीना के बीच दशकों पुरानी राजनीतिक दुश्मनी ने बांग्लादेश की राजनीति की दिशा तय की थी।
खालिदा जिया और शेख हसीना की दुश्मनी
खालिदा जिया और शेख हसीना की दुश्मनी सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि इतिहास और सत्ता की विरासत से भी जुड़ी थी। खालिदा जिया जहां पूर्व राष्ट्रपति जिया-उर-रहमान की पत्नी थीं, वहीं शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं। 1975 में शेख मुजीब की हत्या और 1981 में जिया-उर-रहमान की हत्या, इन घटनाओं ने बांग्लादेश की राजनीति को दो विरोधी खेमों में बांट दिया, जिसकी अगुवाई आगे चलकर इन दोनों महिलाओं ने की।
संसद से सड़कों तक टकराव की राजनीति
खालिदा जिया और शेख हसीना के बीच यह अदावत इतनी गहरी थी कि संसद से लेकर सड़कों तक, हर मंच टकराव का अखाड़ा बन गया। चुनाव बहिष्कार, हड़तालें, हिंसक प्रदर्शन और सरकार गिराने की कोशिशें, इन सबने बांग्लादेश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बार-बार संकट में डाला। आलोचकों का मानना है कि इस व्यक्तिगत और राजनीतिक दुश्मनी ने देश में संवाद की राजनीति को लगभग खत्म कर दिया।
सत्ता बदली, लेकिन दुश्मनी कायम रही
खालिदा जिया के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों और उनकी जेल सजा को BNP ने शेख हसीना सरकार की बदले की राजनीति बताया, जबकि अवामी लीग ने इसे कानून का राज करार दिया। यह टकराव बांग्लादेश की राजनीति का स्थायी सच बन गया, जहां सत्ता बदलती रही, लेकिन दुश्मनी खत्म नहीं हुई।
‘आयरन लेडी’ के नाम से मशहूर खालिदा जिया
खालिदा जिया को ‘आयरन लेडी’ के नाम से जाना जाता था। उन्होंने बांग्लादेश की राजनीति में असाधारण सख़्ती, जिद और सत्ता से टकराने की क्षमता दिखाई। वे उस दौर में उभरीं, जब राजनीति पर पुरुषों और सेना का दबदबा था, लेकिन खालिदा जिया ने न सिर्फ उस व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि लंबे समय तक उसके बीच टिके रहने की हिम्मत भी दिखाई।
विपक्ष के प्रति कड़ा रुख
खालिदा जिया की पहचान एक कठोर फैसले लेने वाली नेता की रही। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने विपक्ष के दबाव, सड़क आंदोलनों और सत्ता विरोधी प्रदर्शनों के सामने अक्सर नरम रुख नहीं अपनाया। उन्होंने हमेशा राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रशासन और सत्ता की स्थिरता को सर्वोपरि रखा, भले ही इसके लिए आलोचना क्यों न झेलनी पड़ी।
शेख हसीना के साथ साझा राजनीतिक मोर्चा
बांग्लादेश की राजनीति में दशकों तक जारी तीखी प्रतिद्वंद्विता के बावजूद, एक ऐतिहासिक दौर ऐसा भी आया जब खालिदा जिया और शेख हसीना ने साझा मकसद के लिए साथ कदम बढ़ाए। यह दुर्लभ राजनीतिक सहयोग सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद के शासन के खिलाफ था। 1980 के दशक में जब जनरल इरशाद की तानाशाही बढ़ती जा रही थी, तब हसीना और खालिदा, अपनी वैचारिक व राजनीतिक खाई के बावजूद, सड़कों पर साथ उतरीं, संयुक्त आंदोलन चलाया और विपक्ष को एकजुट किया।
राजनीतिक टकराव के युग का अंत
खालिदा जिया के निधन के साथ बांग्लादेश की राजनीति के इस कड़े टकराव के युग का अंत हो गया है। हालांकि, उनकी राजनीति के असर आज भी बांग्लादेश की राजनीति में साफ दिखाई देते हैं। उनका जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक टकराव के युग का समापन है, जिसने दशकों तक बांग्लादेश को दो हिस्सों में बांटकर रखा।

