
अमेरिका के पूर्व रक्षा सचिव डोनाल्ड रम्सफील्ड ने कहा था, ‘आप लड़ाई उन सामानों से लड़ते हैं जो आज आपके पास हैं, न कि उनसे जिन्हें आप कल बनाने की सोच रहे हैं।’ स्वदेशी और आयातित, दोनों को मिलाकर भारत की रक्षा प्रणाली काफी मजबूत है।
इस मामले में सच्चाई यही है कि दुनिया का कोई भी देश सिर्फ अपने दम पर सारी रक्षा सामाग्री बनाने का दावा नहीं कर सकता। किसी न किसी रुप में सबको दूसरे देशों से मदद लेनी ही पड़ती है। किसी भी देश की आत्मरक्षा या प्रहारक क्षमता एक बहुस्तरीय और बहुत जटिल व्यवस्था होती है। भारत जैसे देश हैं जिन्हें जल-थल-नभ तीनों प्रकार से लड़ाई की व्यवस्था करनी होती है वहीं नेपाल सरीखे बहुत से ऐसे भी देश हैं जिन्हें ‘लैण्ड लॉक्ड’ कहा जाता है यानी जिनके पास समुद्री सीमा नहीं है। आजादी के बाद से ही भारत को पड़ोसी देशों से युद्ध करना पड़ा है और यही कारण है कि भारत ने सिर्फ आयातित सैन्य सामाग्रियों पर निर्भर रहने के बजाय देशी-विदेशी तकनीक को मिलाकर आत्मनिर्भर बनना शुरू किया और आज हमारे पास डीआरडीओ, एचएएल, बीईएल तथा इसरो जैसी संस्थाएं हैं। आत्मनिर्भर भारत के अन्तर्गत आइडिया फोर्ज, अडानी और टाटा जैसे स्वदेशी उद्योग समूह भी रक्षा सामग्री के अनुसंधान और उत्पादन में संलग्न हैं।
रूस हमेशा से भारत का सबसे बड़ा और भरोसेमंद रक्षा सहयोगी रहा है और भारत की सैन्य आवश्यकता का 60 प्रतिशत से भी अधिक का आपूर्तिकर्ता है। यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 1998 में बाजपेयी सरकार द्वारा किये गए पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद जब अमेरिका ने भारत पर तमाम प्रतिबंध लगा दिया था तब भी रूस भारत के साथ खड़ा था। महत्वपूर्ण यह है रुस न सिर्फ रक्षा सामाग्रियों का आपूर्तिकर्ता रहा है बल्कि वह हमेशा से रक्षा तकनीक भी साझा करता रहा है। आज आत्मनिर्भर भारत का रक्षा-लक्ष्य ही यही है कि आयातक से सहयोगी बनें फिर स्वयं अन्वेषक बनें। भारत आज इसी दिशा में काम कर रहा है।
आज हमारे पास ब्रह्मोस, अग्नि, आकाश, प्रलय तथा निर्भय जैसी मिसाइलें हैं तो रुसी लड़ाकू विमान मिग को हटाकर स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान तेजस, रुस्तम, तापस और घातक जैसे एयरक्राफ्ट और ड्रोन्स हैं। मिशन शक्ति के अन्तर्गत अपने आकाश की सुरक्षा, चैकसी तथा संचार सुविधाओं के लिये हमारी बहुउद्देशीय सेटेलाइट तकनीक है। इसी के साथ पूर्व चेतावनी देने वाली प्रणाली नेत्र भी है। अरिहन्त श्रेणी में न्यूकिलियर सबमेरीन भी हैं जिन्हें सायलेंट किलर भी कहा जाता है। टैंक में अर्जुन तो आर्टिलरी में धनुष है। इन सबमें महत्वपूर्ण यह है कि ये सब स्वदेशी तो हैं ही साथ ही इनको जरुरत के हिसाब से अपडेट भी किया जा सकता है।
भारत अभी जो आयात करता है उसमें सबसे महत्वपूर्ण जेट इंजन हैं। हालांकि भारत जेट इंजन के अनुसंधान में लगा है लेकिन सच्चाई यही है कि जेट एक बहुत ही कठिन प्रक्रिया वाले इंजन होते हैं। अमेरिकन कम्पनी जीई एयरोस्पेस तथा हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड मिलकर भारत में ही जेट इंजन बना रहे हैं तथा जीई इसकी 75 प्रतिशत तकनीक भी भारत को देगी। यह योजना कावेरी इंजन विकास प्रोग्राम के तहत चलाई जा रही है। मिसाइल्स, नेवी और परमाणु के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के बावजूद भारत जेट इंजन, चिप्स तथा हाई एंड ड्रोन के मामले में विदेशों पर निर्भर है लेकिन ये कमियां पता हैं और इनके निवारण के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम हो रहा है और रक्षा विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अगले एक दशक में भारत रक्षा क्षेत्र में काफी आत्मनिर्भर हो जाएगा।
रक्षा मंत्री का दावा है कि भारत सौ से अधिक देशों को सैन्य सामाग्री निर्यात कर रहा है। बीते वित्तीय वर्ष में भारत ने लगभग 24000 करोड़ रुपये का निर्यात किया था। इसमें सैन्य तथा सुरक्षा सामाग्री शामिल हैं। सरकारी क्षेत्र की कम्पनियों के अलावा इसमें प्राइवेट कंपनियां भी निर्यात कर रही हैं। अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में यह निर्यात दुगना हो जाएगा। अभी यह निर्यात अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया तथा आर्मेनिया आदि देशों को किया जा रहा है। भारत उक्त देशों की चीन पर रक्षा निर्भरता को कम कर रहा है। इसका अपरोक्ष लाभ भारत को यह भी है कि उसे इन देशों के बंदरगाहों पर प्रवेश, यातायात सुगमता, बेचे गए सामानों की मरम्मत इन देशों से सैन्य इंटेलीजेन्स साझा होने का लाभ मिलेगा।
यह चिंता की बात है कि आज भारत का समूचा पड़ोस अशांत और अस्थिर है और इन देशों के साथ भारत की लंबी सीमाएं हैं। ऐसे में आर्थिक और सैन्य रूप से भारत को मजबूत रहना ही होगा। दूसरे देशोें पर सैन्य निर्भरताएं देश को सामरिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर करती हैं तथा कूटनीतिक कदम भी असरदार नहीं हो पाते। जिनकी गिनती महाशक्तियों में होती है वे सारे देश आर्थिक के साथ सामरिक रूप से भी महाशक्ति हैं।

