पंकज चतुर्वेदी
जब दिल्ली में कड़ाके की सर्दी, कोहरे और दमघोंटूं स्माग की मार चरम अपर होगई तब 10 जनवरी से नौ दिन के लिए दुनिया के सबसे बड़े पुस्तक मेलों में गिने जाने वाले नई दिल्ली पुस्तक शुरू हो गया। इस बार प्रगति मैदान, जो अब भारत मंडपम हो गया है, में प्रवेश के लिए टिकट नहीं लगेगा। भले ही इसे बड़े जोर शोर से प्रचारित किया जा रहा हो लेकिन असली पुस्तक प्रेमियों के लिए निशुल्क प्रवेश व्यवधान ही होता है। इससे पहले भी एक बार निशुल्क प्रवेश किया गया तो बेशुमार भी से व्यवस्थाएं चरमरार्इं और किताबों से अधिक खाने-पीने के स्टाल पर लोगों ने खर्चे किए। किताबों को चाहने वालों के सामने आज असली समस्या किताबों के बढ़ते दाम हैं-एक तो कागज की कीमत और ऊपर से कागज पर 12 प्रतिशत व मुद्रण पर 30 प्रतिशत जीएसटी की मार। वैसे भी दुनिया के बड़े पुस्तक मेलों से तुलना करें तो नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला भीड़ तो खींचता है, लेकिन इसे अंतर्राष्ट्रीय कहे जाने वाले न तो प्रकाशक होते हैं न ही लेखक।
54 साल पहले 18 मार्च से 04 अप्रेल 1972 तक नई दिल्ली के विंडसर पैलेस के मैदान में कोई 200 भागीदारों के साथ शुरू हुआ नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला तब ‘वसंतोत्सव’ के रूप में शुरू हुआ था । वसंत के सुखद मौसम में , जब न ज्यादा ठंड, न गर्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित। तब दो साल में एक बार पुस्तक मेल लगता था और देश-विदेश के प्रकाशक इसके लिए खासी तैयारी करते थे। 2016 में चीन अतिथि देश के रूप में आमंत्रित किया गया था, चूंकि चीन में फरवरी के महीने में सालाना जश्न होता है और वहां प्राय: सभी जगह अवकाश होता है, सो उनके लिए वसंतोत्सव की परंपरा को तोड़ कर जनवरी में पुस्तक मेले का आयोजन शुरू हुआ। हालांकि इस मौसम में यातायात साधनों में विलंब और व्यवधान से बाहरी पुस्तक प्रेमियों को आने में दिक्कत होती है, लेकिन इस मौसम में आयोजकों का प्रगति मैदान को वातानुकूलित तंत्र चलाने का खर्च काम हो जाता है, शायद इसीलिए जनवरी के कड़ाके की ठंड में पुस्तक मेल जारी रहा। सन 2013 तक यह हर दो साल में लगता था, फिर यह सालाना जलसा हो गया।
लेखकों, प्रकाशकों, पाठकों को बड़ी बेसब्री से इंतजार होता है नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले का। हालांकि फेडरेशन आफ इंडियन पब्लिशसर् (एफआईपी) भी हर साल अगस्त में दिल्ली के प्रगति मैदान में ही पुस्तक मेला लगा रहा है और इसमें लगभग सभी ख्यातिलब्ध प्रकाशक आते हैं, बावजूद इसके नेशनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक मेले की मान्यता अधिक है। हमारे यहां केवल किताब खरीदने के लिए तो दर्जनों वेबसाइट उपलब्ध हैं जिस पर घर बैठे आदेश दो और घर बैठे डिलीवरी लो, इसके बावजूद यहां 1200 से 1400 प्रतिभागी होते हैं और कई चाह कर भी हिस्सेदारी नहीं कर पाते, क्योंकि जगह नहीं होती या फिर यहां भागीदारी का खर्च बहुत अधिक होता है। एक स्टाल लगाने का कम से कम एक लाख रुपये। असल में पुस्तक भी इंसानी प्यार की तरह होती है, जिससे जब तक बात ना करो, रूबरू ना हो, हाथ से स्पर्ष ना करो, अपनत्व का अहसास देती नहीं है। फिर तुलना के लिए एक ही स्थान पर एक साथ इनसे सजीव उत्पाद मिलना एक बेहतर विपणन विकल्प व मनोवृति भी है।
यह बात भी तेजी से चर्चा में है कि इस पुस्तक मेले में विदेशी भागीदारी लगभग ना के बराबर होती जा रही है। यदि श्रीलंका और नेपाल को छोड़ दें तो विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन, स्वास्थ्य, यूनीसेफ आदि के स्टाल विदेशी मंडप में अपनी प्रचार सामग्री प्रदर्शित करते दिखते हैं। फेंकफर्ट और अबुधाबी पुस्तक मेला के स्टाल भागीदारों को आकर्षित करने के लिए होते हैं। दो-तीन देश के भारत दूतावास किताबें प्रदर्शित कर देते हैं। इक्का-दुक्का स्टालों पर विदेशी पुस्तकों के नाम पर केवल ‘रिमेंडर्स’ यानी अन्य देशों की फालतू या पुरानी पुस्तकें होती हैं। ऐसी पुस्तकों को प्रत्येक रविवार को दरियागंज में लगने वाले पटरी-बाजार से आसानी से खरीदा जा सकता है। पहले पाकिस्तान से दस प्रकाशक आते थे, लेकिन बीते 15 सालों से पाकिस्तान के साथ बाकी तिजारत तो जारी है लेकिन एक-दूसरे के पुस्तक मेलों में भागीदारी बंद हो गई। हर बार किसी देश को ‘विशेष अतिथि देश’ का सम्मान दिया जाता है, वहां से लेखक, कलाकार भी आते हैं, लेकिन उनके आयोजनों में बीस लोग भी नहीं होते। एक तो उनका प्रचार कम होता है, फिर प्रगति मैदान में घूमना और किसी सेमिनार में भी बैठना किसी के लिए शायद ही संभव हो। हालांकि विदेशी तो बहुत दूर है, हमारे मेले में संविधान में अधिसूचित सभी 22 भारतीय भाषाओं के प्रकाशक भी नहीं होते। पहले राज्यों के प्रकाशक संघों को निशुल्क स्टाल और आवास की व्यवस्था की जाती थी तो ढेर सारे भाषाई प्रकाशक यहां आते थे, जो अब बंद कर दिया गया।
नई दिल्ली पुस्तक मेला की छवि पर एक दाग वहां हर हाल में बजने वाले प्रवचन और हल्ला-गुल है। बाबा-बैरागियों और कई तरह के धार्मिक संस्थाओं के स्टालों में हो रही अप्रत्याशित बढ़ोतरी भी गंभीर पुस्तक प्रेमियों के लिए चिंता का विषय है। इन स्टालों पर कथित संतों के प्रवचनों की पुस्तकें, आडियों कैसेट व सीडी बिकती हैं। कुरान शरीफ और बाइबिल से जुड़ी संस्थाएं भी अपने प्रचार-प्रसार के लिए विश्व पुस्तक मेला का सहारा लेने लगी हैं। बीते कुछ सालों से हर बार वहां कुछ संगठन उधम करते हैं और सारा साहित्यिक जगत सांप्रदायिक विवाद में धूमिल हो जाता है। समझना होगा कि किताबें लोकतंत्र की तरह हैं-आपको अपनी पसंद का विषय, लेखक, भाषा चुनने का हक देती हैं। यह मेला ही है तो है जहां गांधी-और सावरकर, चे-गोवएरा और भागवत गीता साथ- साथ रहते हैं और पाठक निर्णय लेता है कि वह किसे पसंद करे। या तो इस तरह के धार्मिक स्टाल को लगाने ही नहीं देना चाहिए या फिर उन्हे किसी एक जगह एक साथ कर देना चाहिए।
पुस्तक मेला के दौरान बगैर किसी गंभीर योजना के सेमिनारों, पुस्तक लोकार्पण आयोजनों का भी अंबार होता है। कई बार तो ऐसे कार्यक्रमों में वक्ता कम और श्रोता अधिक होते है। यह बात भी अब किसी से छिपी नहीं है कि अब एक ही तरह की विचारधारा के लोगों को आयोजक द्वारा निर्धारित ‘लेखक मंच’ में समय दिया जाता है। असल में यह स्थान भागीदार प्रकाशकों के लिए बना था कि वे अपने स्टाल पर लोकार्पण आदि न करें और इससे वहां भीड़ न जमा हो। लेकिन लेखक मंच राजनीतिक मंच बन गया और प्रकाशक यथावत अपने स्टाल पर आयोजन करते हैं। बाल मंडप में भी बच्चे स्कूल्स से बुलाए जाते हैं, जबकि यह स्थान इस तरह का होना चाहिए कि मेले में आए बच्चे स्वत: यहां कि गतिविधियों में शामिल हों। आबूधाबी पुस्तक मेले में ऐसी ही गतिविधियां सारे दिन चलती हैं।
पुस्तक मेला के दौरान प्रकाशकों, धार्मिक संतों, विभिन्न संस्थाओं द्वारा वितरित की जाने वाली निशुल्क सामग्री भी एक आफत है। पूरा प्रगति मैदान रद्दी से पटा दिखता है। कुछ सौ लोग तो हर रोज ऐसा ‘कचरा’ एकत्र कर बेचने के लिए ही पुस्तक मेला को याद करते हैं। छुट्टी के दिन मध्यवर्गीय परिवारों का समय काटने का स्थान, मुहल्ले व समाज में अपनी बौद्धिक ताबेदारी सिद्ध करने का अवसर और बच्चों को छुट्टी काटने का नया डेस्टीनेशन भी होता है-पुस्तक मेला।
पार्किंग, मैदान के भीतर खाने-पीने की चीजों के बेतहाशा दाम, हाल के भीतर मोबाइल का नेटवर्क कमजोर होने, भीड़ के आने और जाने के रास्ते एक ही होने जैसी कई ऐसी दुविधाएं हैं, जिनसे यदि निजात पा ले तो सही मायने में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेल ‘विश्व’ स्तर का होगा। पाठक को प्रवेश शुल्क से कोई परहेज नहीं बस किताबें उसकी सीमा में हों!

