नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी का पर्व विशेष आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। होली के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला माता की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता रोगों की देवी मानी जाती हैं, जो अपने भक्तों को विभिन्न रोगों और कष्टों से सुरक्षा प्रदान करती हैं। देवी शीतला माता, मां पार्वती का ही स्वरूप हैं।
पूजा का महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार शीतला माता अपने हाथों में झाड़ू, सूप और कलश धारण करती हैं और उनकी सवारी गधा मानी गई है। इन प्रतीकों से यह संकेत मिलता है कि माता घर की अशुद्धियों और रोगों को दूर करती हैं। इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से घर में नकारात्मकता दूर होती है और परिवार को सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
शीतला अष्टमी पर क्या करें
प्रातःकाल स्नान और साफ वस्त्र
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनकर पूजा करें।
माता का जल से अभिषेक
शीतल जल में हल्दी मिलाकर माता को अभिषेक करें। शुद्ध मिट्टी के पात्र में जल से अभिषेक करना शुभ माना जाता है।
बासी भोजन का भोग
एक दिन पहले तैयार ठंडे भोजन का भोग माता को अर्पित करें और परिवार के साथ प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। कुछ स्थानों पर मिट्टी की सकोरियों में भोजन चढ़ाने की परंपरा है।
घर के दरवाजों पर हल्दी के छाप
मुख्य द्वार पर हल्दी के छाप लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
रोग निवारक मंत्र का जप
इस दिन माता का यह मंत्र श्रद्धा से जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है:
“शीतले त्वं जगत् माता, शीतले त्वं जगत् पिता। शीतले त्वं जगद्धात्री, शीतलायै नमो नमः॥”
नियमित जप से रोगों से मुक्ति मिलती है।
शीतला अष्टमी पर क्या न करें
- चूल्हा या गैस जलाना वर्जित: नया भोजन न बनाएं, सिर्फ़ एक दिन पहले तैयार भोजन ग्रहण करें।
- गरम या ताजा भोजन न खाएं: केवल ठंडा या बासी भोजन ही खाना चाहिए।
- झगड़ा या कटु वचन न बोलें: शांत और सकारात्मक वातावरण बनाए रखें।
- क्रोध और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहें: माता की कृपा बनी रहे।
- पूजा के नियमों की अवहेलना न करें: श्रद्धा और विधि के साथ ही पूजा करें।

