Thursday, March 26, 2026
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टीबी उन्मूलन में भारत की उल्लेखनीय प्रगति

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हाल ही में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत ने क्षय रोग (टीबी) के खिलाफ लड़ाई में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। वर्ष 2015 के बाद से देश में टीबी के नए मामलों में 21 प्रतिशत की कमी आई है, वहीं मृत्यु दर में 28 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। यह उपलब्धि न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था के सुदृढ़ होने का संकेत है, बल्कि सरकार और समाज के संयुक्त प्रयासों का भी परिणाम है। टीबी एक संक्रामक और गंभीर बीमारी है, जिसका इलाज और रोकथाम पूरी तरह संभव है। इसके बावजूद, यह आज भी दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में शामिल है। हर साल लगभग 13 लाख लोग इस बीमारी के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। यह संख्या एचआईवी/एड्स और मलेरिया से होने वाली कुल मौतों से भी अधिक है। एक अनुमान के अनुसार, हर 20 सेकंड में एक व्यक्ति टीबी के कारण मृत्यु को प्राप्त होता है।

इतनी गंभीर और जानलेवा बीमारी होने के बावजूद, टीबी अक्सर सार्वजनिक चर्चा और मीडिया की सुर्खियों से दूर रहती है। कभी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में महामारी का रूप लेने वाली यह बीमारी आज भी एशिया और अफ्रीका के कई देशों में गंभीर खतरा बनी हुई है। विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में इसके सबसे अधिक मामले सामने आते हैं। दुनिया के कुल टीबी मरीजों में से लगभग दो-तिहाई केवल आठ देशों में पाए जाते हैं, जिनमें भारत सबसे आगे है। इसके बाद इंडोनेशिया, फिलीपींस, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, कांगो और बांग्लादेश का स्थान आता है। भारत में अकेले लगभग एक चौथाई वैश्विक टीबी मरीज पाए जाते हैं, जो इस चुनौती की गंभीरता को दशार्ता है।

2024 में दुनिया भर में कुल 1.07 करोड़ लोग टीबी से बीमार हुए। जिनमें 58 लाख पुरुष, 37 लाख महिलाएं और 12 लाख बच्चे शामिल हैं। डब्ल्यूएचओ का ही साल-दर-साल सुधार का आंकड़ा देखें तो 2024 में दुनिया भर में टीबी से 12.3 लाख लोगों की मौत हुई, जो उसके एक साल पहले की तुलना में करीब तीन फीसदी की कमी है। इनमें से तीन लाख जानें केवल भारत में गईं यानी टीबी के कारण सबसे ज्यादा मौतें भारत में दर्ज हुर्इं। भारत में वर्ष 2015 से 2024 के बीच टीबी के मामलों में 21 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जो सकारात्मक प्रगति को दर्शाता है। इसके बावजूद, वैश्विक टीबी मरीजों में भारत की हिस्सेदारी अब भी लगभग 25 प्रतिशत बनी हुई है। राज्यों की बात करें तो 1.5 लाख से अधिक मामलों के साथ उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है, जबकि महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है। बिहार तीसरे और मध्य प्रदेश चौथे स्थान पर हैं। वहीं, राजस्थान की स्थिति में बदलाव आया है और अब यह तीसरे से खिसककर पांचवें स्थान पर पहुंच गया है।

टीबी, जिसे तपेदिक भी कहा जाता है, माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक बैक्टीरिया से फैलती है। यह मुख्य रूप से हवा के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बोलने से निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों के जरिए यह बैक्टीरिया दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है। यह रोग मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है, लेकिन शरीर के अन्य अंगों—जैसे हड्डियों, मस्तिष्क या किडनी—में भी फैल सकता है। इसके शुरुआती लक्षण सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे होते हैं, जैसे लगातार खांसी, बुखार, वजन घटना और रात में पसीना आना। यही कारण है कि लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे बीमारी गंभीर रूप ले लेती है।

टीबी के इलाज को अधिक प्रभावी बनाने के लिए भारत ने दवा प्रतिरोधी टीबी के लिए नई उपचार पद्धतियों को अपनाया है। बेडाक्विलिन आधारित रेजिमेन और बीपीएएलएम जैसी आधुनिक तकनीकों ने इलाज की सफलता दर को 68 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 प्रतिशत तक पहुंचा दिया है।
नई उपचार पद्धति के तहत अब ड्रग-रेसिस्टेंट मरीजों का इलाज मात्र 6 महीने में संभव हो गया है, जबकि पहले इसमें 9 से 18 महीने का समय लगता था। यह पद्धति न केवल अधिक प्रभावी है, बल्कि मरीजों के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक भी है। इस नई दवा प्रणाली में बेडाक्विलाइन, लाइनजोलिड, प्रीटोमैनिड और मोक्सीफ्लोक्सासिन जैसी दवाओं का संयोजन शामिल है। यह कदम भारत के टीबी उन्मूलन लक्ष्य को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

आईसीएमआर की तकनीकी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, देश में टीबी के मामलों में लगातार कमी आ रही है, जो इस बात का संकेत है कि भारत ह्लप्री-एलीमिनेशन फेजह्व की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, देश के कई पिछड़े और गरीब जिले अभी भी इस लड़ाई में चुनौती बने हुए हैं। इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, जागरूकता का अभाव और सामाजिक-आर्थिक समस्याएं टीबी उन्मूलन के प्रयासों को धीमा कर रही हैं।

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