
बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी से सामने आए नतीजे किसी एक राष्ट्रीय रुझान की ओर इशारा नहीं करते। इसके बजाय, वे ऐसे राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाते हैं, जहां अलग-अलग ताकतें अलग-अलग तरीकों से सत्ता को मजबूत कर रही हैं। भारत की चुनावी राजनीति अपनी अभिव्यक्ति में तेजी से क्षेत्रीय होती जा रही है, जबकि अपने प्रभाव में वह राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बनी हुई है। सबसे बड़ा बदलाव तमिलनाडु में देखने को मिला। अभिनेता विजय और उनकी पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ का उदय केवल एक चुनावी उलटफेर का संकेत नहीं है; यह उस राजनीतिक व्यवस्था में एक ढांचागत बदलाव का प्रतीक है, जिस पर लंबे समय से ‘द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम’ और ‘आॅल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम’ का वर्चस्व रहा है। दशकों तक द्रविड़ राजनीति ने ही राज्य के वैचारिक और संगठनात्मक ढांचे को परिभाषित किया था। युवाओं और शहरी मतदाताओं द्वारा समर्थित एक व्यक्तित्व-केंद्रित विकल्प का उदय यह संकेत देता है कि यह ढांचा अब राजनीतिक आकांक्षाओं को समेटने के लिए पर्याप्त नहीं रह गया है।
उधर असम का चुनाव एक सामान्य पुनर्चुनाव नहीं है। यह राज्य के भीतर पार्टी की ढांचागत रूप से अपनी जड़ें जमाने की सफलता को दर्शाता है—जो संगठनात्मक गहराई, लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के वितरण और विकास को पहचान की राजनीति के साथ जोड़ने वाले एक नैरेटिव के माध्यम से संभव हुआ है। पिछले दस साल में विपक्ष को एक ठोस विकल्प प्रस्तुत करने में संघर्ष करना पड़ा है; यह इस बात का संकेत है कि असम अब प्रतिस्पर्धी सत्ता-परिवर्तन के दौर से आगे बढ़कर राजनीतिक एकीकरण के दौर में प्रवेश कर चुका है। भाजपा का 37.81 प्रतिशत वोट शेयर कांग्रेस के 29.84 प्रतिशत वोट शेयर से बहुत ज्यादा आगे नहीं था, जो बताता है कि विपक्ष के वोट भले ही काफी हों, फिर भी बिखरे हुए हैं। केरल में इसके विपरीत तस्वीर देखने को मिलती है। यहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया है। यह बदलाव उस राज्य में ‘सत्ता-विरोधी लहर’ की स्थायी शक्ति को रेखांकित करता है, जहां चुनावी चक्र ऐतिहासिक रूप से सत्ता-परिवर्तन द्वारा ही परिभाषित होते रहे हैं। जैसे-जैसे वामपंथ अपनी सत्ता का आखिरी अहम गढ़ खो रहा है, यह भारत में कम्युनिस्ट राजनीति की भविष्य की प्रासंगिकता के बारे में गहरे सवाल खड़े करता है। साथ ही यह भी बताता है कि कांग्रेस की वापसी भौगोलिक रूप से सीमित बनी हुई है।
बंगाल चुनाव हिंदुत्व की यात्रा में एक खास मील का पत्थर है। भाजपा के लिए तीन राज्य जम्मू-कश्मीर, असम और बंगाल हमेशा से बड़ी चिंता का विषय रहे हैं, क्योंकि यहां मुस्लिम आबादी काफी ज्यादा है। जम्मू-कश्मीर ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मुस्लिम बहुमत में हैं। असम में मुस्लिम आबादी 35 प्रतिशत से ज्यादा है, और बंगाल में यह आंकड़ा लगभग 28 प्रतिशत है। अब इन दोनों ही राज्यों में भाजपा सत्ता में है। एक तरह से चुनावी तौर पर भाजपा ने मुस्लिमों को सफलतापूर्वक बेअसर कर दिया है, तो वैचारिक तौर पर ‘हिंदू एकता’ के अपने प्रोजेक्ट में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर पार कर लिया है। गौरतलब है, इन दोनों ही राज्यों में मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले भाजपा की मौजूदगी न के बराबर थी। यह भाजपा की स्मार्ट राजनीति और इस बात का भी सबूत है कि वह क्षेत्रीय पार्टियों का इस्तेमाल करके सत्ता के ढांचे में खुद को कैसे स्थापित करती है और अंतत: अपनी जड़ें जमा लेती है।
असम और बंगाल में धर्मनिरपेक्ष ताकतों की भारी हार को देखते हुए विपक्षी पार्टियों को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा। उन्हें खुद को नए सिरे से गढ़ना होगा। उन्हें यह भी समझना होगा कि अगर वे बंटे रहे, तो भले ही चुनाव लड़ने की स्थिति में रहें, पर जीतने से दूर रहेंगे। उन्हें यह समझना होगा कि भाजपा कोई साधारण पार्टी नहीं है। यह एक ऐसी पार्टी है जिसमें जीतने का जुनून है और जो जीतने के लिए हमेशा अतिरिक्त प्रयास करने को तैयार रहती है। भाजपा का हिंदुत्व एजेंडा सभी के सामने है और इसकी चुनावी सफलताएं इसके प्रति इसकी निडर और अटूट प्रतिबद्धता के कारण हैं। चुनावी राजनीति की कुछ सतर्कताओं के साथ वह ऐसा कहने और करने में गुरेज भी नहीं करती। अगर विपक्षी पार्टियां भाजपा और हिंदुत्व के बढ़ते वर्चस्व को हराने का सपना देखती हैं, तो विपक्षी पार्टियों की एकता ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है। इसके अलावा उनके पास अब कोई विकल्प बचा भी नहीं है! ऐसा लगता है कि नकद हस्तांतरण और लक्षित लाभों वाली योजनाएं अब अपनी प्रभावशीलता की चरम सीमा तक पहुंच चुकी हैं। मतदाताओं ने अपनी प्राथमिकताएं बदल ली हैं।

