जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: भारत में थोक महंगाई का दबाव लगातार बढ़ रहा है। सितंबर 2026 में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित महंगाई दर बढ़कर 11.39% हो गई, जबकि अगस्त में यह 9.92% दर्ज की गई थी। इस तरह एक महीने के भीतर थोक महंगाई दर में 1.47 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई। सरकार की ओर से बुधवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, खाने-पीने की वस्तुओं, ईंधन, बिजली और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में तेजी महंगाई बढ़ने की प्रमुख वजह रही। थोक महंगाई में यह बढ़ोतरी उत्पादन और कारोबार की लागत पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है, जिसका असर आगे चलकर आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
खाद्य महंगाई में भी तेजी, 8.66% पर पहुंची दर
सितंबर में खाद्य वस्तुओं की थोक महंगाई दर बढ़कर 8.66% हो गई। अगस्त में यह आंकड़ा 7.05% था। यानी एक महीने में खाद्य महंगाई में 1.61 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में इस तेजी ने कुल थोक महंगाई को ऊपर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
खाद्य वस्तुओं की महंगाई बढ़ने से उत्पादन, भंडारण और आपूर्ति की लागत पर भी दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़ों में अलग-अलग खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई वृद्धि का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
ईंधन और बिजली की महंगाई 25.85% पर पहुंची
सितंबर में ईंधन और बिजली क्षेत्र में महंगाई का दबाव और बढ़ गया। इस श्रेणी की महंगाई दर अगस्त के 22.93% से बढ़कर सितंबर में 25.85% हो गई। ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि का असर परिवहन, औद्योगिक उत्पादन और अन्य आर्थिक गतिविधियों की लागत पर पड़ सकता है।
वहीं, कारखानों में बनने वाले सामान यानी विनिर्मित उत्पादों की महंगाई दर भी अगस्त के 8.37% से बढ़कर सितंबर में 9.76% पर पहुंच गई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विनिर्मित वस्तुओं की यह महंगाई दर संबंधित सूचकांक शृंखला में अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर रही।
किन क्षेत्रों में बढ़ीं कीमतें?
सितंबर के आंकड़ों में कई प्रमुख क्षेत्रों में महंगाई का दबाव दिखाई दिया। इनमें शामिल हैं:
ईंधन और बिजली: महंगाई दर 22.93% से बढ़कर 25.85% हो गई।
खाद्य वस्तुएं: महंगाई 7.05% से बढ़कर 8.66% पर पहुंच गई।
विनिर्मित उत्पाद: कारखानों में बनने वाले सामान की महंगाई दर बढ़कर रिकॉर्ड 9.76% हो गई।
कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद: कच्चे पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेजी ने दबाव बढ़ाया।
धातु और रसायन: बुनियादी धातुओं और रासायनिक उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर भी देखने को मिला।
कपड़ा, रबर और प्लास्टिक: इन क्षेत्रों के उत्पादों की बढ़ती कीमतों ने थोक महंगाई को प्रभावित किया।
कोयला और बिजली के उपकरण: कोयला, लिग्नाइट और बिजली से जुड़े उपकरणों की कीमतें भी महंगाई के प्रमुख कारकों में शामिल रहीं।
पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी का असर
थोक महंगाई बढ़ने के पीछे वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और कच्चे माल की कीमतों में तेजी को भी प्रमुख कारण बताया गया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के मुताबिक, पश्चिम एशिया में युद्ध और इसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से कच्चे तेल तथा उर्वरकों की वैश्विक कीमतों पर दबाव पड़ा।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने से घरेलू स्तर पर ईंधन, परिवहन और उत्पादन की लागत प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, उर्वरकों और अन्य कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर कृषि उत्पादन और खाद्य वस्तुओं की लागत पर भी पड़ सकता है।
इन परिस्थितियों में ऊर्जा, विनिर्माण और खाद्य क्षेत्र की लागत बढ़ने से थोक महंगाई में तेजी आने की आशंका बनी रहती है।
खुदरा महंगाई भी बढ़ी, 5.54% पर पहुंची दर
थोक महंगाई के साथ खुदरा महंगाई में भी सितंबर के दौरान बढ़ोतरी दर्ज की गई। जारी आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर अगस्त के 4.83% से बढ़कर सितंबर में 5.54% हो गई। यह 23 महीने का उच्चतम स्तर बताया गया। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि को खुदरा महंगाई बढ़ने की प्रमुख वजहों में शामिल किया गया।
थोक और खुदरा महंगाई में अंतर होता है। थोक महंगाई उत्पादन और कारोबार के स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को दर्शाती है, जबकि खुदरा महंगाई उन कीमतों में बदलाव बताती है, जिनका सामना उपभोक्ताओं को करना पड़ता है।
थोक कीमतों में लगातार तेजी बने रहने पर कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। यदि कंपनियां इस अतिरिक्त लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो आने वाले समय में कुछ वस्तुओं और सेवाओं की खुदरा कीमतों पर भी इसका असर दिखाई दे सकता है।
आरबीआई की ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी
महंगाई के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति को लेकर भी चर्चा तेज है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने पिछले सप्ताह प्रमुख नीतिगत ब्याज दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया।
ब्याज दरों में बदलाव का असर कर्ज की लागत, आवास और वाहन ऋण की ईएमआई तथा आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। हालांकि, महंगाई को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति के साथ-साथ आपूर्ति, ऊर्जा की कीमतों और वैश्विक बाजार की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
आम लोगों और कारोबार पर क्या हो सकता है असर?
थोक महंगाई में लगातार बढ़ोतरी से उद्योगों और कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है। कच्चे माल, ईंधन, बिजली और परिवहन पर अधिक खर्च होने से कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। वहीं, यदि बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचता है, तो रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी का असर घरेलू बजट पर विशेष रूप से पड़ सकता है। आने वाले महीनों में महंगाई का रुख काफी हद तक वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों, पश्चिम एशिया के हालात, आपूर्ति व्यवस्था और घरेलू उत्पादन पर निर्भर करेगा।
सितंबर के आंकड़े संकेत देते हैं कि देश में थोक और खुदरा, दोनों स्तरों पर महंगाई का दबाव बढ़ा है। ऐसे में आने वाले समय में कीमतों की स्थिरता बनाए रखना सरकार और रिजर्व बैंक, दोनों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है।

