Tuesday, April 21, 2026
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नमस्कार का अर्थ अहम का परित्याग

SANSKAAR


भारत में प्राचीन काल से दूसरों के अभिवादन के लिए नमस्कार, नमस्ते या प्रणाम करने की परंपरा है। भारतीय संस्कृति में बड़ों का आदर सत्कार करना, घर आए मेहमान का आदर व अभिवादन करना शिष्टाचार दर्शाता है। अभिवादन करते हुए नमस्कार कहना आत्मा का आत्मा को आभार प्रकट करता है।

इसका भावार्थ है कि सभी मनुष्यों के हृदय में एक दैवीय चेतना और प्रकाश है, जो अनहद चक्र (हृदय चक्र) में स्थित है। हृदय चक्र पर हाथ लाने से दैवीय प्रेम का बहाव होता है। आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाता है।

यदि प्रणाम इस भाव से किया जाए कि सामने वाले व्यक्ति की आत्मा को प्रणाम कर रहे हैं तो यह कृतज्ञता और समर्पण की भावना जाग्रत करता है। विनम्रता को दर्शाता है। प्रणाम हृदय से किया जाता है तो उससे आशीर्वाद मिलता है। उसका प्रत्यक्ष फल मिलता है।

अर्थ एक-भाव अनेक

संस्कृत व्याकरण के अनुसार नमस्ते शब्द का संधि विच्छेद नम:+स्ते है। अर्थात तुम्हारे लिए प्रणाम। संस्कृत में प्रणाम या आदर के लिए ‘नम:’ अव्यय प्रयुक्त होता है, जैसे सूर्याय नम:। तुम्हारे लिए का संस्कृत में सामान्य प्रयोग ‘तु’ है। उसी का वैकल्पिक, संक्षिप्त रूप ‘ते’ भी बहुत प्रयुक्त होता है। इसका एक शाब्दिक अर्थ नम+अस+ते भी है। नम का अर्थ नमना या झुकना, अस अर्थात हम और ते का मतलब है तेरे लिए या आपके लिए।

यानि पूरे शब्द का अर्थ है हम आपके लिए झुकते हैं। किसी के प्रति पूरे मन से आदर और सम्मान के भाव से झुकना ही नमस्ते का मतलब है, जबकि नमस्कार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के नमस शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है एक आत्मा का दूसरी आत्मा से आभार प्रकट करना। दोनों शब्द एकदूसरे के पर्याय होते हुए भी उनके बीच एक आध्यात्मिक अंतर है। नमस्कार शब्द नमस्ते से अधिक सात्विक है।

नमस्कार दो शब्दों नमन व कार से मिलकर बना है। नमन अर्थात सत्कार या आदर और कार का मतलब करने वाला। अहम को त्याग कर दूसरों को सम्मान देना नमन होता है।

‘प्रणाम’ शब्द प्र व नम से मिलकर बना है। प्र आगे जुड़ जाने के कारण इसका अर्थ विशेष रूप से झुकना (अच्छे भाव से नमन) करना हो जाता है। यह इतने बड़ों से कहा जाता है जो बदले में इसे न दोहरा कर आशीर्वाद आदि कहते हैं, जबकि नमस्कार या नमस्ते पाने वाले व्यक्ति प्राय: यही वापस करते हैं।

हृदय के पास रखें हाथ

नमस्ते करने के लिए दोनों हाथों को अनहद चक्र पर रखा जाता है। आंखें बंद की जाती हैं और सिर व पीठ को झुकाया जाता है। इसके अलावा हाथों को स्वाधिष्ठान चक्र (भौहों के बीच का चक्र) पर रखकर सिर झुकाकर और हाथों को हृदय के पास लाकर भी नमस्ते किया जाता है। दूसरी विधि गहरे आदर का सूचक है।

सिर को झुकाने और आंखें बंद करने का अर्थ है अपने आप को हृदय में विराजमान प्रभु को अपने आप को सौंप देना। गहरे ध्यान में डूबने के लिए भी स्वयं को नमस्ते किया जाता है। जब यह किसी और के साथ किया जाए तो यह एक सुंदर और तीव्र ध्यान होता है।

जब एकदूसरे को नमस्ते कहते हैं तो दो व्यक्ति ऊर्जात्मक रूप से वे समय और स्थान से रहित एक जुड़ाव बिन्दु पर एकदूसरे के निकट आते हैं और अहं की भावना से मुक्त होते हैं। यदि यह हृदय की गहरी भावना से मन को समर्पित करके किया जाए तो दो आत्माओं के मध्य एक आत्मीय संबंध बनता है।

ध्यान रखने की बातें

ईश्वर या किसी व्यक्ति को नमस्कार करते समय आंखें बंद रखने से अपने अंत:करण में झांकना व स्वयं में ईश्वर का स्वरूप देख पाना सुलभ होता है। हाथ में कोई वस्तु न रखें। नमस्कार करते समय हाथ में कोई वस्तु रखने से अंगुलियां और उनके अग्रभाग सीधे नहीं रहते।

जिससे सात्विकता के प्रवाह का अंगुलियों के अग्रभाग में प्रवेश बाधित हो जाता है। नमस्कार कर रहे व्यक्ति के प्रति उत्सर्जित सात्विकता हथेली में रखी वस्तु से टकरा कर लौट जाती है।

यही नहीं, यदि हाथ में रखी वस्तु रज अथवा तम प्रधान हो और यदि नमस्कार करते समय उसका स्पर्श मस्तक या वक्ष से हो जाए तो उससे प्रवाहित हो रहा रज-तम नमस्कार कर रहे व्यक्ति की देह में प्रविष्ट हो सकता है।

शारीरिक संपर्क का न होना

शारीरिक सम्पर्क दो व्यक्तियों के बीच सूक्ष्म-ऊर्जा के प्रवाह को और सुगम बनाता है। अभिवादन की इस पद्धति में शारीरिक सम्पर्क न होने के कारण अन्य व्यक्ति के नकारात्मक रूप से प्रभावित करने की क्षमता न्यूनतम हो जाती है।

इसके आध्यात्मिक लाभों के कारण, नमस्कार करने वाले दोनों व्यक्तियों के बीच के नकारात्मक स्पंदन कम हो
जाते हैं और सात्विक स्पंदन का लाभ प्राप्त होता है। अभिवादन की इस पद्धति के आध्यात्मिक होने के कारण सत्व गुण बढ़ता है।

परंतु यदि किसी व्यक्ति को अनिष्ट शक्ति का कष्ट है तो उसके नमस्कार करने पर भी नकारात्मक स्पंदनों का ही प्रवाह होगा। अनिष्ट शक्ति उस व्यक्ति की अंगुलियों के माध्यम से अभिवादन किए जाने वाले व्यक्ति तथा वातावरण में नकारात्मक स्पंदन का वमन कर सकती हैं। लेकिन हाथ मिलाने से होने वाले शारीरिक संपर्क की तुलना में नकारात्मक स्पंदन सीमित होता है।

सेहत के लिए हितकर

आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार नमस्कार का अर्थ है अहम का परित्याग कर हस्तबद्ध नमन करना। तमाम भावों को दूर कर दूसरों को नमन करने से सहजता महसूस होती है, जिससे मानसिक तनाव दूर होता है और रक्त प्रवाह सामान्य रहता है।

रक्त प्रवाह ठीक रहने से दिल भी स्वस्थ रहेगा। कई बार बुरे व्यक्ति को सामने देख हृदय गति बढ़ जाती है, लेकिन जब उस व्यक्ति का भी सहज भाव से अभिवादन किया जाएगा तो हृदय गति फिर सामान्य हो जाती है।

वैज्ञानिक रहस्य

नमस्कार करने का स्टाइल भले ही थोड़ा पुराना हो गया हो, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क भी छिपा है। जब सभी अंगुलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है तो एक्युप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारे आंखों, कानों और दिमाग पर होता है ताकि सामने वाले व्यक्ति को हम लंबे समय तक याद रख सकें।

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