Saturday, April 25, 2026
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कृपया ध्यान दें.. भ्रष्टाचार का ठेका नगर निगम के पास है..?

  • पौधों, गमलों और तारबाड़ के ठेकों के विवरण की जांच कराने की मांग
  • चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के हाथ में है निगम के खास अमलों की चाबी

मुख्य संवाददाता |

सहारनपुर: बात अपने आप में बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली है। सवाल है कि बात कौन सी है? दरअसल बात ये है कि नगर निगम में चौथी श्रेणी के कुछ कर्मचारी, वरिष्ठ लिपिकों के पद पर काबिज होकर सरकारी धन को खा-पचा रहे हैं। ठेकेदारों से मिलकर।

अफसरों पर भी उंगलियां उठ रही हैं। वैसे इन दिनों भ्रष्टाचार को लेकर योगी सरकार सख्त है। ऐसे में तो नगर निगम को सहम जाना चाहिए था। लेकिन, कमाल है। यहां किसी पर भी शिकन नहीं। न माथे पर, न चेहरे पर। अफसरों पर न तथाकथित बाबुओं पर। शिकायतें होती रहें, विरोध होता रहे पर होता कुछ नहीं।

किसी का भी बाल बांका नहीं होता। सूत्रों का कहना है कि 2018-2019 तथा 19-20 के ठेकों के विवरणों की अगर जांच कराई जाए तो कलई खुल जाएगी और हमाम में तमाम नंगे पाए जाएंगे। अफसोस कि ऐसा कुछ हो कहां रहा?

यह बताने की जरूरत नहीं कि नगर में महत्वपूर्ण पदों पर चंद चतुर्थश्रेणी कर्मियों का कब्जा है। उनकी दबंगई के आगे अफसरों की भी घिग्घी बंधी रहती है। स्टोरी कीपर की तो बात ही निराली है।

इस पर उद्यान विभाग और रिकार्ड रूम ही नहीं, इन दिनों नवादा की गौशाला का भी जिम्मा है। इसी तरह गैराज में भी अंधेरगर्दी मची है। सूत्रों का कहना है कि नगर निगम के लगभग सभी अनुभाग में लूट-खसोट हो रही है। सन 2018-19 और 19-20 के ठेकों के विवरण की यदि जांच कराई जाए तो करोड़ों का घालमेल पकड़ में आ सकता है।

इस समयावधि में बेंच के ठेके, गमलों के ठेके, पार्कों और तारबाड़ के ठेके में बड़े घपले हुए हैं। उल्लेखनीय है कि 2018 में विभाग ने गमलों का आकार 30 इंच ऊंचाई और 30 इंच चौकोर रखा था।

1100 रुपये प्रति गमलों के हिसाब से खरीदारी की बात की गई थी। 2019 में इसी साइज के गमलों का ई टेंडर हुआ। इसमें गमलों का रेट इस बार 1250 रखा गया। लेकिन, खेल यहीं से शुरू हुआ। सूत्रों का कहना है कि उद्यान विभाग के बाबू और ठेकेदार ने मिलकर बाजार से मात्र 500 रुपये प्रति गमले के हिसाब से खरीदारी की।

इसकी साइज भी कम थी। यानि कि 18 से 20 इंच। कम दाम पर गमले खरीद कर और पूरा पेमेंट करा कर रुपयों की बंदरबांट हुई। पौधरोपण अभियान निगम ने जोर-शोर से चलाया।

अधिकारी मीडिया की सुर्खियां बनते रहे हैं। लेकिन सचाई इसके इतर है। बता दें कि पौधों का भी ई-टेंडर होता है। ई टेंडर करते समय लंबाई लिखी जाती है। उसी आधार पर रेट दिए जाते हैं।

पौधों के टेंडर में लंबाई 8,10 और 12 फुट दी गई। बाद में ठेकेदार से मिलकर पौधे कम लंबाई के खरीदे गए। ठेकेदार जिन पौधों को खरीदते हैं या खरीदे, उनकी लंबाई क्रमश: 4, 6 या फिर आठ फुट रही।

जाहिर है कि इन पौधों की कीमत भी आधी रही। लेकिन, भुगतान बड़ी साइज का हुआ है। बेंचों की खरीदारी में भी यही घपला होता है। ई-टेंडर में मानक कुछ होता है और खरीदारी उसके विपरीत कम गुणवत्ता की होती है।

सूत्रों का कहना है कि अगर पौधों, बेंच और तारबाड़ तथा गमलों के ठेकों के विवरणों की जांच कराई जाए तो निगम की काली करतूतों का पर्दाफाश हो सकता है।

गहराई में जाएं तो पांवधोई की सफाई के नाम पर ही निगम ने मोटी रकम खर्च की है। लेकिन, नदी में गिर रहे नालों को आज तक बंद नहीं कराया जा सका। ऐसे में नदी दुर्दशाग्रस्त है।

स्मार्ट सिटी के नाम पर जनता-जनार्दन को अभी तक ठोस कुछ नहीं मिला है। आम आदमी पार्टी के नेता योगेश दहिया का कहना है कि वह निगम के काले कारनामों को लेकर मुख्यमंत्री से मिलेंगे और जरूरत पड़ी तो यहां भी आंदोलन किया जाएगा। कुछ अन्य सामाजिक संगठन भी निगम के खिलाफ लामबंद होने जा रहे हैं।

लंबे समय से एक पटल पर जमे बाबुओं को हटाया जाएगा। घपलों की गुंजाइश कहीं नहीं है। अगर शिकायतें हैं तो उनकी जांच कराई जाएगी।
                              -नगर आयुक्त, ज्ञानेंद्र सिंह

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