Friday, May 8, 2026
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किसान के जख्मों पर फूलों का मरहम

  • कोरोना काल से आहत है किसान
  • रजनीगंधा, जरबेरा के फूलों से महक रही खेती

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: क्या किसान मजबूर हैं और खेती मजबूरी? यह प्रश्न आने वाले दिनों में बहुत अहम होगा। फिलहाल पूरे देश में किसान उपहास के विषय से ज्यादा कुछ नहीं हैं। समय के साथ बदले सामाजिक परिवेश में किसानों की हैसियत जहां बहुत दयनीय होती जा रही है, वहीं सरकारी नजरअंदाजी के चलते वे खुद को खेती से अलग करते जा रहे हैं। जहां खेती का घटता रकबा भी बड़ा सवाल है, वहीं बढ़ती लागत और घटते दाम से बदहाल किसान परेशान है। हालात कुछ यूं हैं कि खुद को खतरे में देख आत्महत्या तक को अंजाम दे रहे हैं!

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लगता है किसान कहीं राजनीति का शिकार हैं, तो कहीं सरकारी लापरवाही के चलते आत्महत्या जैसे घातक फैसले लेने को मजबूर हैं, लेकिन सवाल यही कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला मुल्क खेती से मुंह मोड़ेगा, तो इसका पेट भरेगा कौन? समय के साथ सब कुछ बदल गया है।

जहां नयी पीढ़ी खेती के बजाय शहरों का रुख कर मजदूरी को बेहतर मानने लगी है, तो जमीन के मोह में गांव में पड़ा अकेला असहाय किसान कभी बारिश, तो कभी सूखे की मार झेल रहा है। वह कभी भरपूर फसल होने पर उचित दाम न मिलने और पुराने कर्ज को न चुका पाने से घबरा कर आत्महत्या को ही आसान रास्ता बनाता जा रहा है। भारतीय किसान की यही बड़ी बदकिस्मती है।

किसानों के नाम पर सियासी रोटी और प्रायोजित आयोजनों से जख्मों पर मरहम के बजाय नमक लगाने से आहत असली किसान बेहद मजबूर दिख रहा है। नौकरशाहों और कर्मचारियों को महंगाई भत्ता देकर सरकारें अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देती हैं, लेकिन किसान कर्ज और ब्याज माफी के लिए सड़क पर भोजन खाने, तपते आसमान के नीचे खुले बदन आंदोलन, पानी में गले तक डूब कर जल-सत्याग्रह जैसे कठिन फैसलों तले जीने को मजबूर है।

कोरोना काल में आर्थिक संकट से जूझ रहे किसानों और इनसे जुड़े लोगों को फूलों की खेती ने राहत देनी शुरू कर दी है। कोरोना काल में कई माह कर संकट से जूझ रहा फूलों का बाजार व व्यापार फिर पटरी पर आने लगा है। फूलों का व्यापार खेतों से लेकर बाजार तक सजने लगा है।

अच्छी मांग के चलते न केवल किसान खुश हैं, बल्कि मेरठ की जमीन भी महक उठी है। वहीं, शादी समारोह के अलावा पूजा, सगाई व अन्य आयोजनों से बाजार में फूलों के ठीक दाम मिल रहे हैं। मेरठ से सजावटी फूलों की भारी मांग है। इनमें जरबेरा और रजनीगंधा की सर्वाधिक मांग है। इसके पीछे देहरादून में कोरोना काल में दर्जनों पाली हाउस खत्म होना भी मुख्य कारण बताया जा रहा है।

दिल्ली भेजा जा रहा जरबेरा: रमेश कुमार

कोरोना काल में फूल उत्पादकों को बाजार न मिलने से आर्थिक तौर पर काफी नुकसान उठाना पड़ा है। इन दिनों जरबेरा के फूलों की खेप निकल रही हैं। पॉली हाउसों में सजावट के लिए मांग पर इनकी कई किस्में उपलब्ध हैं। परतापुर निवासी प्रगतिशील किसान रमेश कुमार का कहना है कि उनके पास एक एकड़ के पाली हाउस में जरबेरा फूल लगे हैं। इस समय प्रतिदिन मेरठ के अलावा दिल्ली के लिए फूलों के बंडल भेजे जा रहे हैं। इसमें प्रतिदिन आठ से 10 हजार रुपये मिल रहे हैं।

मेरठ में गुलजार हुआ रजनीगंधा: महेश

रजनीगंधा एक बहु उपयोगी पौधा है। जिसका पुष्प और सुगंध उद्योगों में महत्वपूर्ण स्थान है। रजनीगंधा के फूल ऐसे समय उपलब्ध होते हैं, जब बाजार में अन्य सजावटी पुष्पों का अभाव होता है। इसके कटे फूल उत्तम गुणवत्ता व लंबे समय तक ताजा बने रहने और परिवहन में सुविधा के कारण पसंद किए जाते हैं। रजपुरा निवासी महेश किसान ने बताया कि इन दिनों मेरठ में रजनीगंधा के फूलों का कारोबार प्रगति से चल रहा है। रजनीगंधा के फूलों की मांग बाहर के राज्यों से भी की जा रही है। ऐसे में किसानों को काफी मुनापा हो रही है। कोरोना काल में किसानों को बहुत नुकसान हुआ। वहीं, अब एक बार फिर से फूलों का कारोबार पटरी पर लौटने से किसानों के जख्मों पर मरहम लगा है।

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