- 25 सालों से खुले में जलती है चिताएं
- पौने दो लाख की आबादी के लिए नहीं है श्मशान
- जलती चिताओं पर पानी बरसने पर छोड़कर चले जाते हैं लोग
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: जयभीम नगर में 15 हजार से अधिक वोटर है, जबकि 70 प्रतिशत लोगों की वोट नहीं है। यहां पर पिछले 25 सालों से विकास कार्य नहीं हुए है, चुनावों में ही प्रत्याशी वोट मांंगने आते हैं। निगम की ओर से 45 सफाई कर्मचारी नियुक्त है, लेकिन सफाई फिर भी नहीं होती। 20 प्रतिशत जनता के पास आधार कार्ड जैसी सुविधा भी नहीं है। जबकि 10 प्रतिशत परिवारों के राशन कार्ड भी नहीं है।

पांच प्रतिशत लोेगों को ही आयुष्मान कार्ड उपलब्ध है। कुल मिलाकर ये ऐसा इलाका है। जिसमें रहने वाली जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जी रही है, लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं है। जब किसी मुर्दे को अंतिम संस्कार के लिए जगह भी नसीब न हो तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है। वहीं, अगर चिता सज भी जाए और उसमें आग भी लगा दी जाए तो अचानक बारिश होने से चिता पूरी तरह जले भी नहीं तो मृतक के परिजनों के दिल पर क्या बीतती है। इसका अंदाजा मात्र लगाने से ही शरीर में सिहरन पैदा होने लगती है। कुछ ऐसा ही हाल है मेरठ दक्षिण विधानसभा के जयभीम नगर का।
रेनू चौहान का कहना है कि गंदगी के साथ जलभराव की समस्या है। सबसे बड़ी परेशानी चिता जलाने को लेकर है, यहां पर कोई श्मशान घाट नहीं है। नाले किनारे खुले में चिताएं जलाई जाती है। लोग बरसात में जलती चिता को छोड़कर चले जाते हैं। इसके बाद जानवर चिता से शव तक खींच लेते हैं।
प्रमोद सिंघल का कहना है कि 25 साल से रह रहे हैं, लेकिन आजतक हालात नहीं बदले हैं। पौने दो लाख की आबादी है, लेकिन श्मशान घाट नहीं है। लोग अपनों की चिता को नाले किनारे जलाते हैं। बरसात आने पर चिता जलती छोड़कर चले जाते हैं, जिन शवों को चिता पर नहीं रखा जा सका होता है तो बारिश रुकने का इंतजार किया जाता है। कोई जनप्रतिनिधि इस समस्या का हल नहीं करा सका।
अक्षय छाबड़ा का कहना है कि पिछले कई सालों से यहां की स्थिति बद से बदतर है। श्मशान घाट नहीं है, नदी-नाले किनारे अंतिम संस्कार किया जाता है। चिता जलते समय बारिश आने पर भारी परेशानी होती है। बरसात रुकने का इंतजार करना पड़ता है। कई बार मांग की गई है कि यहां पर श्मशान घाट का निर्माण हो, लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। हर बार चुनावों से पहले प्रत्याशी वोट मांगने तो आते हैं, लेकिन जीतने के बाद कोई आकर नहीं देखता।
मंजु शर्मा का कहना है कि यहां के हालात बेहद खराब है, हर तरफ गंदगी फैली है। नालियां टूटी पड़ी है, श्मशान घाट नहीं है। खुले में चिताएं जलती है, बारिश आने पर हालात और खराब हो जाते हैं। कोई स्थिति समझने को तैयारी नहीं है, खासकर विधायक।
राजबीर उपाध्याय का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या श्मशान घाट की है। बारिश आने पर अंतिम क्रिया को रोकना पड़ता है। बारिश बंद होने पर ही संस्कार होता है। सीवरों की हालत खराब है, गंदा पानी भरा रहता है। पांच सालों में विधायक ने कभी आकर नहीं देखा, बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है, लेकिन अनदेखी का शिकार आजतक है।
मनीषा भारती का कहना है कि श्मशान घाट न होने के कारण नदी-नाले के किनारे अंतिम संस्कार होता है। पिछले तीन साल से रह रही है, कोरोना काल में सबसे ज्यादा हालात खराब हो गए थे। अगर किसी को मरने के बाद उचित अंतिम संस्कार भी न मिले तो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है?

