Monday, April 6, 2026
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मुफलिसी निगल रही मासूमों का बचपन

  • खेलकूद की उम्र में बच्चे उठा रहे परिवार का बोझ
  • जांबाज हौसलों को सलाम पढ़ाई के साथ परिवार का भी खर्च उठा रहे मासूम बच्चे

जनवाणी संवाददाता |

परीक्षितगढ़: घर का बोझ उठाने वाले बचपन की तकदीर न पूछ घर से बच्चा काम के लिए निकला और संग किताबों का छूट गया। मासूम बच्चे जो घर की जिम्मेदारी में हाथ बंटाने के फेर में स्कूल जाने के बजाय कंधे पर बोरी लादकर कूड़े के ढेरों में भोजन का जुगाड़ खोजने निकल पड़ते हैं। घर की मुफलिसी ने इनके कंधों पर बस्ते की जगह कबाड़ की बोरी लाद दी। इन मासूमों की कोमल मुस्कान कूड़े के ढेरों में गुम हो गई है। स्कूलों में गुजरने वाला बचपन घर के चूल्हे की फिक्र में खप रहा है।

कहते हैं बालश्रम, बचपन पर गरीबी का अभिशाप है। बालश्रम शब्द हीं समाज के लिए अभिशाप या कलंक है। ‘बालश्रम’ है तो बहुत छोटा-सा शब्द, लेकिन चार अक्षर के इस शब्द में छिपी न जाने कितने मासूम बच्चों के बचपन की स्याह मजबूरी की दास्तां है। समाज की दरिंदगी इतनी बढ़ गई थी कि उससे कुचल कर मासूमियत की कराह ने इस कलंकित शब्द को पैदा कर दिया।

शायद कम उम्र में परिवार का बोझ उठाए नन्हे कंधों की सवालिया आंखें ये कहती है। आज भी हाइवे के किनारे ढाबों में, पंक्चर की दुकान पर या किसी दरिंदे द्वारा भीख मंगवाते सड़कों पर, हर जगह बालश्रम कानून को दरकिनार कर कुचलता बचपन दिख ही जाता है।

बचपन की किलकारी क्यों रोती है बेचारी?

शहर की गंदगी भरे कुड़ों के बीच कंधों पर गंदी-सी बोरी टांगे प्लास्टिक की टूटी समानों को चुनते मासूम हाथ, पंक्चर की दुकान पर अपनी उम्र से ज्यादा ताकत लगा कर गाड़ियों के टायर उतारते मासूम कंधे, र्इंटों के भट्ठों पर भारी भरकम र्इंटों तले कुचलता मासूमियत या होटलों और रईस के घरों में जुठे बर्तन धोते कोमल हाथ।

ये आज हमारे रईस समाज की स्याह हकीकत है। जहां हर तरफ गरीबी और मजबूरी तले कुचलते बचपन की दास्तां है। सरकार ने इन लाचार मासूमों के तबाह होते बचपन को बचाने के लिए बहुत कानून बनाए हैं, लेकिन इन कानूनों के बाद भी आज मजबूरी के मारो का बचपन उमंगों की किलकारी भर रहा है।

बाल मजदूरी नहीं, परिवार की मजबूरी

दोनों बच्चों का कार्य परिवार की मजबूरी है। यह बाल मजदूरी नहीं है। क्योंकि दोनों भाई शिक्षा के साथ-साथ मासूम बच्चों के कंधों पर परिवार का बोझ भी उठा रहे हैं। हंसने, खेल कूदने की उम्र में दोनों भाई खेलकूद भूलाकर दायित्व निभा रहे हैं। अन्य बच्चों को खेलता देख बच्चों का मन भी उनके साथ खेलने का करता है, लेकिन बच्चों के आगे परिवार का पेट भरने की जिम्मेदारी है। जिसके आगे वह मजबूर है।

नन्हे हाथों से छूटे खेल-खिलौने

इसे आप गरीबी कहे या हमारे देश की पेट की बेबसी। इन जैसे हजारों और लाखों लोग हैं, जिनके बदन पर कपड़े नहींं, खाने को दो वक्त की रोटी नहीं, सोने को छत नहीं। जिनकी जिंदगी का कोई वजूद नहीं। सुबह से शाम तक का भरोसा नहीं और हम बात करते हैं चांंद पर जाने की। क्या ये जरूरी नहीं कि इन जैसे लोगों पर सरकार ध्यान दे। परीक्षितगढ़ क्षेत्र में दो मासूम बच्चे विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

जिनके हाथों से बचपन में ही नन्हे हाथों से खेल-खिलौने छूट गए हैं। बच्चों के पिता मजदूरी करते हैं, लेकिन घर में आर्थिक तंगी के कारण दोनों बच्चों ने परिवार का पालन पोषण करने की जिम्मेदारी संभाली और क्षेत्र में जगह-जगह साइकिल से गुब्बारा बेचते हैं। उनसे मिलने वाले पैसों से वह अपना घर का खर्च चलाते हैं। साथ ही दोनों बच्चे स्कूल में पढ़ने भी जाते है। मासूम बच्चों को गुब्बारा बेचते देख लोगों को दिल भर आता है। बच्चों के हौसले अन्य बच्चों के लिए मिशाल बने हुए हैं। परिवार की आर्थिक तंगी बयां करते हुए मासूम बच्चों की आंखें भी भर आती है।

परिवार की तंगी से घर का खर्च उठा रहे मासूम

जब परिवार का पेट भरने वाले अचानक बीमार हो जाए तो घर में मुफलिसी आ जाती है। जिन कंधों पर स्कूल के बस्तों का बोझ होता है। उन्हींं कंधों पर परिवार का पालन पोषण के लिए गुब्बारे भी बेच रहे हैं। एक बच्चा पंप द्वारा गुब्बारे फुलता है तो बच्चा उन्हें साइकिल में बंधे लकड़ी के डंडे में बांधकर बेचता है।

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