Tuesday, June 16, 2026
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सत्तर के दशक का विश्लेषण

Ravivani 32


किसी भी देश की सियासत में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिनका देश पर दूरगामी असर पड़ता है। ऐसी घटनाएं उस कालखंड को तो प्रभावित करती ही हैं, भविष्य की राजनीतिक दिशा भी निर्धारित करती हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘दस साल: जिनसे देश की सियासत बदल गई’ सत्तर के दशक की कुछ चुनिंदा घटनाओं को ध्यान में रखकर लिखी गई है। सत्तर के दशक में वैसे तो कई महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं लेकिन इस पुस्तक में मुख्यत: गरीबी, प्रिवी पर्स की समाप्ति, कोयला, परिवार नियोजन और आपातकाल जैसे मुद्दों का गंभीरता से विश्लेषण किया गया है। हालांकि इस पुस्तक में पांच मुद्दों पर विस्तार से बात की गई है लेकिन यह विमर्श उस कालखंड की राजनीति और कई राजनेताओं को गहराई से समझने का मौका भी देता है। दरअसल अंग्रेजी में इस तरह की किताबें खूब लिखी जाती हैं लेकिन हिन्दी में आमतौर पर ऐसी किताबें लिखने की परम्परा नहीं है। इसलिए हिन्दी में ऐसी किताबों का अभाव है।

लेखक ने ‘गरीबों हटाओ‘ नारे की गंभीरता से पड़ताल करते हुए उन कारणों का जिक्र किया है, जिनकी वजह से गरीबी से लड़ाई सरकारी नीतियों का हिस्सा बनी। 1967 में नई दिल्ली में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस के अधिवेशन में दस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम को मंजूरी दी गई। इसी कार्यक्रम के तहत बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने की घोषणा की गई। 1971 के चुनाव में विपक्ष के ‘इंदिरा हटाओ‘ नारे के सामने इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ‘ नारा दिया। प्रिवी पर्स की समाप्ति का भी सटीक विश्लेषण किया गया है। 28 दिसम्बर, 1971 को छब्बीसवें संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति की मुहर लगते ही प्रिवी पर्स की सुविधा खत्म हो गई। विमर्श के केन्द्र में कोयले को भी रखा गया है। इस खंड के अन्तर्गत कोयला भंडार की खोज, रेल लाइन बिछने के साथ ही कोयले की बढ़ती मांग और कोयला-खदान में होने वाले हादसों पर विस्तार से बात की गई है। नेशनल कोल डेवलॅपमेंट कॉरपोरेशन के गठन, कोयले के राष्ट्रीयकरण, कोयला-खदानों के साथ भ्रष्टाचार और माफिया की लूट का जिक्र भी किया गया है। कोयला-खनन के कारण पर्यावरण पर पड़ रहे प्रभाव, कोयला आवंटन, कैग की रिपोर्ट, इन मुद्दों के माध्यम से होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल तथा कोयले के कारण होने वाले विस्थापन और पुनर्वास की खामियों पर भी प्रकाश डाला गया है।

लेखक ने परिवार नियोजन का विश्लेषण करते हुए इस मुद्दे पर बनी नीतियों की तार्किक पड़ताल की है। आपातकाल लागू होने से पहले तक परिवार नियोजन कार्यक्रम सुचारू रूप से चल रहा था मगर संजय गांधी के परिदृश्य में आने के साथ ही सब कुछ उलट-पुलट गया। संजय गांधी ने मान लिया कि परिवार नियोजन का एकमात्र तरीका नसबन्दी है। देखते ही देखते उनका नसबन्दी कार्यक्रम बर्बरता की मिसाल बन गया। लेखक ने आपातकाल के मुद्दे पर भी सार्थक चिंतन किया है। आपातकाल के मुद्दे पर आज भी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया जाता है। आपातकाल लगाने की तात्कालिक वजह बना था, 12 जून 1975 को आया इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का वह चर्चित फैसला, जिसमें उन्होंने 1971 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के रायबरेली से इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध करार दिया था। हालांकि 24 जून, 1975 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी. आर. कृष्ण अय्यर ने कुछ शर्तों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्थगन दे दिया। 1973 में खाद्यान्न संकट के कारण जरूरी चीजों के दाम बढ़ने लगे। आनाज की कालाबाजारी शुरू हो गई और छात्र सड़क पर आ गए। इन आन्दोलनों की कमान मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण के हाथों में थी। उस दौरान ऐसी अनेक घटनाएं घटित हुईं जिनसे आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार हुई। इस खंड में जेपी और इंदिरा के रिश्तों, समाजवाद और सर्वोदय, जनता सरकार का आना और बिखर जाना तथा जेपी आन्दोलन में आरएसएस की भूमिका पर भी व्यापक चिंतन किया गया है।

बड़ी बात यह है कि इन सभी विषयों को केवल सत्तर के दशक तक ही सीमित नहीं रखा गया है बल्कि बाद के दशकों में इन मुद्दों के प्रभावों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है। कोई भी अध्ययन तब तक प्रासंगिक नहीं होता जब तक कि उसे वर्तमान से न जोड़ा जाए। लेखक ने इस अध्ययन को वर्तमान से जोड़कर इसे और भी महत्त्वपूर्ण बना दिया है।

पुस्तक: दस साल: जिनसे देश की सियासत बदल गई, लेखक: सुदीप ठाकुर, प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, मूल्य: 299 रुपये


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