Sunday, June 13, 2021
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बिजनौर एडीएम प्रशासन की टीम ने खंगाला कस्तूरबा स्कूलों का रिकॉर्ड

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  • एडी बेसिक के बाद प्रशासन भी हरकत में
  • कस्तूरबा स्कूलों की जांच पर जांच होने से शिक्षा विभाग के अधिकारी परेशान

जनवाणी ब्यूरो |

बिजनौर: कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों की जांच रुकने का नाम नहीं ले रही है। एडी बेसिक मुरादाबाद की जांच के बाद अब जिला प्रशासन भी हरकत में आया है। एडीएम प्रशासन के नेतृत्व में बनी टीम ने कस्तूरबा स्कूलों की जांच पड़ताल की। इसे लेकर शिक्षा विभाग के अफसरों के हाथ पांव फूले हैं।

कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में विकास के लिए फरवरी में मार्च के महीने में बेसिक शिक्षा विभाग ने 74 लाख रुपए की खरीदारी की थी। शासन द्वारा प्रेरणा पोर्टल पर मामला आने पर जांच बैठा दी गई। राज्य परियोजना निदेशक ने सहायक शिक्षा निदेशक बेसिक मुरादाबाद को मामले की जांच सौंपी थी। ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

बुधवार को सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी संजय कुमार रस्तोगी ने जिले के चार कस्तूरबा स्कूलों में खरीदे गए सामान की मौके पर पहुंच कर जांच पड़ताल की तथा रिकॉर्ड भी खंगाला था। अब सीडीओ द्वारा मामले में बनाई गई टीम ने भी जांच शुरू कर दी है। एडीएम प्रशासन भगवान शरण ने जिला पूर्ति अधिकारी मनीष कुमार ने जिले के पांच स्कूलों का औचक निरीक्षण कर स्कूलों में खरीदे गए सामान को परखा है। उन्होंने कोतवाली क्षेत्र के स्कूल हीरा वाली ब्लॉक नूरपुर जलीलपुर चांदपुर व हल्दौर के कस्तूरबा गांधी स्कूल पहुंचकर खरीदे गए सामान को जांचा। निरीक्षण के दौरान स्कूलों में मार्च में खरीदी गई बच्चों की तौलिये अभी स्कूल में ही रखी पाई गई है।

कई पर कई सामान ऐसे बताए जाते हैं जो अभी तक बच्चों को नहीं दिए गए। स्कूल में ही पढ़े धूल फांक रहे हैं। प्रशासन द्वारा कड़ा रुख अपनाया जाने से शिक्षा विभाग के अफसर परेशान है। प्रेरणा पोर्टल पर छात्राओं की उपस्थिति भी शुन्य दिखाई गई है। जबकि स्कूलों की वार्डन कुछ भी कहने से इंकार करती है। निरीक्षण के दौरान जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी महेश चंद, जिला समन्वयक बालिका मित्र लाल गौतम भी मौजूद रहे।

नाम न छापने की शर्त पर एक वार्डन बताती है कि काफी सारा सामान तीन-चार दिन पहले ही स्कूलों में भेजा गया है। इससे पहले केवल सामान के बिल स्कूलों को उपलब्ध कराए गए थे। स्कूल की शिक्षिकाओं को डर है कि यदि उन्होंने मुंह खोला तो कहीं उन्हें नौकरी से हाथ में दो ना पड़े।

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