केपी मलिक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और धार्मिक समीकरण हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं। साल 2014 के बाद से भाजपा ने इन समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए कई स्तरों पर सियासी रणनीति बनाई है। लेकिन पार्टी 2024 के लोकसभा के यूपी के नतीजों से सकते में हैं। लोकसभा चुनावों से सबक लेते हुए अब पार्टी को तीसरी बार सत्ता में पहुंचाने के लिए भाजपा की नजर मुस्लिम समाज के उस हिस्से पर है, जिसे पसमांदा कहा जाता है, यानि वो तबका जो सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से वंचित और हाशिये पर है। भाजपा का यह कदम न सिर्फ उसके ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे को मजबूत करता है, बल्कि उसकी इस मंशा को भी उजागर करता है कि वह परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक वाली पार्टियों, विशेष रूप से समाजवादी पार्टी की राजनीतिक पकड़ को तोड़ना चाहती है। जिसके लिए वह अपने राजनीतिक सहयोगियों के साथ मिलकर अपनी तैयारी कर रही है।
दरअसल ‘पसमांदा मुस्लिम’ वर्ग है क्या? मुस्लिम समाज को परंपरागत रूप से अशराफ (सैयद, पठान, शेख, आदि), अज्लाफ और अर्जल जैसी श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें से पसमांदा (अज्लाफ और अर्जल) वे जातियां हैं, जो निचले सामाजिक स्तर पर आती हैं, जैसे—धुनिया (धोबी), अंसारी (बुनकर), कसाई, मच्छी, हलीफा, फकीर, दर्जी आदि। पुराने आंकड़ों के मुताबिक भारत में इनकी आबादी मुस्लिम समाज की करीब 80 फीसदी मानी जाती है। इतिहास गवाह है कि अशराफ जातियों ने धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक नेतृत्व पर कब्जा बनाए रखा, जबकि पसमांदा वर्ग हाशिये पर रहा। लेकिन माना जाता है कि राजनीति में उन्हें एकजुट स्वर नहीं मिल पाया है। इसी का फायदा उठाते हुए भाजपा की रणनीति है कि आगामी बिहार विधानसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा 2027 के चुनावों में सामाजिक न्याय बनाम वोटबैंक को तोड़ना होगा।
भाजपा पिछले कुछ वर्षों से इस वर्ग की ओर सक्रियता से बढ़ रही है। पार्टी के नेता बार-बार यह कहते रहे हैं कि सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे तथाकथित ‘सेक्युलर’ दलों ने पसमांदा मुस्लिमों को सिर्फ वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया, लेकिन उनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए कुछ नहीं किया। भाजपा पसमांदा पर पकड़ बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है भाजपा पसमांदा सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा है भाजपा ने अनेक जिलों में ‘पसमांदा मुस्लिम सम्मेलन’ आयोजित किए जहां इस वर्ग के सामाजिक नेताओं को मंच दिया गया। भाजपा के कुछ नेताओं ने यह मुद्दा उठाया कि मुसलमानों को भी उनकी सामाजिक स्थिति के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए, विशेष रूप से पसमांदा समुदाय को।
बहरहाल भाजपा पिछले कुछ समय से लगातार मुस्लिमों के गैर-राजनीतिक निकायों से संपर्क में है जैसे वक्फ बोर्ड, बुनकर समाज, मदरसों और अन्य सामाजिक संगठनों के माध्यम से यह वर्ग टारगेट करके स्थानीय निकाय में प्रतिनिधित्व नगर निकाय चुनावों में पसमांदा मुस्लिमों को टिकट देना आदि हैं। समाजवादी पार्टी की चिंता है कि उसके परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लग सकती है, क्योंकि सपा की ताकत लंबे समय से ‘मुस्लिम-यादव’ समीकरण में रही है। मुस्लिम समाज विशेष रूप से भाजपा के खिलाफ सपा को अपना स्वाभाविक राजनीतिक ठिकाना मानता रहा है। लेकिन अगर भाजपा पसमांदा मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने में सफल हो जाती है, तो यह सपा के लिए सीधी चुनौती बन जाएगा। वोटों का विभाजन सपा के लिए बड़ा झटका होगा यदि मुस्लिम वोट समान रूप से उसको नहीं मिले तो भाजपा को इसका बड़ा फायदा हो सकता है, खासकर अगर भाजपा त्रिकोणीय मुकाबला कराने में सफल होती है तो। मुस्लिम जातियों के इस उभार से यदि पसमांदा जातियां सपा नेतृत्व पर ‘अशराफ वर्चस्व’ का आरोप लगाती हैं, तो अंदरूनी असंतोष तो बढ़ ही सकता है। क्योंकि सपा की छवि एक ‘मुस्लिम समर्थक’ दल की है। इसलिए सामाजिक आधार में दरार डाल कर भाजपा इसे ‘अशराफ-समर्थक’ में बदलने की कोशिश कर रही है।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भाजपा की यह रणनीति कितना सफल होगी, लेकिन इसके कई संभावित प्रभाव भी हो सकते हैं, क्योंकि भाजपा की यह रणनीति उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में मुस्लिम समाज की राजनीतिक संरचना को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग हो सकती है। समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों को अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। केवल ‘धर्मनिरपेक्षता’ या ‘संघ विरोध’ की बातों से अब चुनाव नहीं जीते जा सकते। पसमांदा मुस्लिम अब सिर्फ वोट नहीं, नेतृत्व भी चाहते हैं। यह वर्ग अगर एकजुट हो गया, तो वह भारतीय राजनीति का संतुलन बदल सकता है।

