Monday, April 27, 2026
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अपने लिए मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर रही बसपा

कद्दावर बसपाइयों को बाहर करने से कैसे बहुरेंगे बसपा के दिन

पश्चिम में भी कई बड़े नेताओं को मायावती कर चुकी हैं बाहर


अवनीन्द्र कमल |

सहारनपुर: बुनियाद के पत्थर ही अगर हिल जाएं तो तय समझिए कि इमारत खतरे से खाली नहीं है। बहुजन समाज पार्टी की इन दिनों यही स्थिति है। दो रोज पहले तीन जून को सूबे के अवध क्षेत्र के अंबेडकर नगर जिले के दो बसपा विधायकों क्रमश: राम अचल राजभर और लाल जी वर्मा को बसपा सुप्रीमो मायावती ने जिस तरह बाहर का रास्ता दिखाया, उससे पार्टी के तमाम पहरुए सन्न हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा अपने आप को कमजोर करती जा रही है। पार्टी की स्थापना के समय के ज्यादातर झंडाबरदार मायावती का साथ छोड़ चुके हैं। ऐसे में आने वाले विधान सभा चुनावों में बसपा का हाथी और ज्यादा दलदल में फंस सकता है।

बता दें कि पश्चिम में सहारनपुर और अवध क्षेत्र में अंबेडकरनगर बसपा का गढ़ रहा है। खुद मायावती ने 1996 में सहारनपुर की हरौड़ा विधान सभा सीट से चुनाव जीता था और सीएम बनी थीं। बाद में वह 2002 में भी इसी सीट से चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची।

इसी तरह कांशीराम ने भी 1998 में यहां की लोकसभा सीट पर चुनाव लड़कर भाग्य आजमाया था। हालांकि, उस दरम्यान भाजपा के नकली सिंह से कांशीराम चुनाव हार गए थे। अंबेडकर नगर की बात करें तो यहां की लोकसभा सीट से सन् 98, 99 और 2004 में भी मायावती ने चुनाव लड़ा और जीत कर देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंची। लेकिन अब अपने इन दोनों मजबूत किलों में बसपा खुद ही कील ठोक रही लगती है। या यूं कहिए कि ठोक चुकी है।

अतीत की ओर झांक कर देखें तो सन् 2007 का विधान सभा चुनाव मायावती के सियासी सफर का सबसे शानदार, जानदार और जबर्दस्त था। इस दफा सूबे की 403 सीटों में से 206 सीटों पर हाथी के महावत विजयी रहे। सरकार बसपा की बनी और पत्थर पूरे पांच साल तक पिघलते रहे।

मायावती ने पूरे रौ में सूबे की सुल्तानी की। सत्ताविरोधी लहरों ने आखिरकार बाजी पलट दी और 2012 के विधान सभा चुनाव में बसपा धड़ाम हो गई। सपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने अपने कुलदीपक अखिलेश यादव को सूबे की सत्ता सौंप दी।

इसी क्रम में आगे के 2017 के विधान सभा चुनाव की जिक्र करना लाजिमाी है। इस चुनाव में सपा की भद तो पिटी ही, बसपा का हाथी बेहाल हो गया। दरअसल, बसपा इस चुनाव में फकत 19 सीटों पर सिमट गई। फिलवक्त, अब जबकि आठ माह बाद सूबे में विधान सभा चुनाव होने हैं तो मायावती लगातार अपनी ही पार्टी के विधायकों को बाहर का रास्ता दिखा रही हैं।

राम अचल राजभर और लालजी वर्मा के निष्कासन के बाद स्थिति ये है कि पार्टी के पास केवल सात विधायक हैं। 9 पहले ही निलंबित हो चुके हैं। ऐसे में माया की सोशल इंजीनियरिंग का क्या होगा? सियासी टीकाकारों का कहना है कि कांशीराम के समय से बसपा की ए टीम में शामिल दीनानाथ भास्कर, जंगबहादुर पटेल, मसूद अहमद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, दद्दू प्रसाद जैसे जनाधार वाले नेता मायावती का साथ छोड़ चुके हैं।

बसपा की बी टीम में शामिल रहे स्वामी प्रसाद मौर्या, ब्रजेश पाठक, डा धर्म सिंह सैनी जैसे नेता भी सन 2017 के चुनाव से पहले ही भाजपा में आ गए थे और ये लोग चुनाव जीते। भाजपा ने इन्हें मंत्री पद से नवाजा है। पश्चिम में हाथरस के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय भी बसपा से बाहर हैं।

बुलंदशहर में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के एकाधिकार वाली डिबाई सीट को दो-दो बार फतह करने वाले श्रीभगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित भी बसपा से बाहर हैं। इसी तरह सहारनपुर की रामपुर सीट से दो बार विधायक रहे रवींद्र कुमार मोल्हू, मेरठ की दलित राजनीति में रसूख रखने वाले पूर्व विधायक योगेश वर्मा, मुजफ्फरनगर के पूर्व विधायक अनिल जाटव भी हाथी की सवारी छोड़ चुके हैं।

ऐसे कई और नाम गिनाए जा सकते हैं जो बसपा के सच्चे सिपाही हुआ करते थे। लेकिन, अब वह इस दल से दूरी बना चुके हैं। राजनीतिक मामलों के जानकार रिटायर्ड प्रोफेसर डाक्टर सुरेंद्र सिंघल का कहना है कि राजनीति में दो कदम आगे तो दो कदम पीछे हटना होता है। जिस दल का मुखिया ऐसा नहीं करता, उसे खामियाजा तो भोगना ही होता है। मतलब साफ है, क्यों?

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