- निगम ने कंपनी के भुगतान की संस्तुति भी शासन को भेजी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: नगर निगम शहर को दूधिया रोशनी से नहलाने के बड़े दावे कर रहा हैं। निगम के इस दावे में कितनी हकीकत और कितना फसाना है, यह रात के समय शहर की गलियों और सड़कों पर निकलने के बाद भली-भांति महसूस किया जा सकता है।
शहर में घूमने के बाद धरातल की सच्चाई निगम प्रशासन के दावों सेबिल्कुल अलग दिखाई देगी। शहर में पसरा अंधेरा दावों की पोल खोलता दिखेगा। इसके बावजूद शहर में लाइट लगाने वाली कंपनी के भुगतान की संस्तुति निगम प्रशासन ने की है। बाकायदा विभाग की ओर से भुगतान किए जाने के संबंध में शासन को पत्र भेजा गया है।
गौरतलब है कि, नगर निगम ने मार्च 2017 में दिल्ली की ईईएसएल कंपनी को शहर में एलईडी लाइटों को लगाने का ठेका दिया था। कंपनी ने इसी साल सितंबर में खराब लाइटों को बदलने और सोडियम लाइटों की जगह एलईडी लाइट लगाने के कार्य की शुरुआत की थी। ठेके की शर्तों में तय हुआ था कि शहर के मुख्य चौराहों पर हाईमास्क लाइटें लगाई जाएगी। वहीं, गलियों और सड़कों पर खराब लाइटों को बदलने के साथ ही नई लाइटें लगेगी।
इस कार्य को ईईएसएल कंपनी को 2024 तक पूरा करना है। करार के समय शहर में 42 हजार एलईडी लाइटें लगाने का ठेका छोड़ा गया था। नगर निगम का दावा है कि शहर में कंपनी द्वारा अब तक 39 हजार लाइटें लगाई जा चुकी हैं और शहर को लगभग सोडियम मुक्त कर दिया गया है।
निगम प्रशासन की ओर से दावा किजा जा रहा है कि 18, 35 और 70 वाट की लाइटों को गली-मोहल्लों में लगाया गया है। 110 वाट की लाइटें सड़कों के किनारे और 140 वाट की हाईमास्क लाइटों को शहर के मुख्य चौराहों और बड़े स्थानों पर लगाया गया है।
मगर, निगम के ऐसे बड़े दावों के बाद भी शहर की गलियां दूधिया रोशनी के बजाए अंधेरे में नहाई हुई नजर आ रही हैं। दावों के हिसाब से शहर की सड़कों पर भी रोशनी दिखाई नहीं पड़ रही है। ऐसा हाल तब हैं जब स्वच्छता सर्वेक्षण 2022 सिर पर है और इस बार नगर निगम स्मार्ट सिटी बनने का सपना देख रहा है।
इसके बावजूद भी सपने को पूरा करने के लिए अभी तक निगम की स्मार्ट शहर बनने की तैयारियां धरातल पर उतनी बेहतर नहीं दिख रही हैं, जितनी इसके लिए होनी आवश्यक हैं। शहर की स्वच्छता को लेकर निगम प्रशासन के दावे भले ही बड़े हो, मगर इन दावों की जमीन हकीकत अलग ही दिखाई पड़ती है।
ऐसे में निगम अपनी व्यवस्थाएं दुरुस्त करने में अभी नाकाम है, जो स्मार्ट सिटी का सपना पूरे करने में बाधक हो सकता है। उधर, ऐसी व्यवस्था के बावजूद निगम का कंपनी के भुगतान की शासन को संस्तुति भेजना खुद में सवाल खड़े करता है।

