Saturday, May 9, 2026
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कोरोना : शिक्षा पर फिर गहराया संकट

 

Nazariya 20


Yogesh Soniराष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना ने फिर एक बार दस्तक दे है, जिसकी वजह लोग विचलित होने लगे हैं। यदि बीते एक सप्ताह के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रतिदिन एक हजार से ज्यादा केस आने लगे हैं और सरकार ने दोबारा मास्क लगाने के लिए हिदायत दी है। कोरोना के बीते कालखंडों में किस तरह मानव जीवन की हानि हुई, यह हमने खुली आंखों से देखा और यदि पिछले साल इस ही समय की बात करें तो वैसा मौत का तांडव शायद ही कभी हुआ हो। अप्रैल की महीना सबसे खतरनाक था और अब भी वो ही समय चल रहा है। डीडीएमए के मुताबिक कोविड-19 के नए वेरिएंट बी.1.10, बी.1.12 के शुरुआती संकेत मिलने के बाद सब परेशान हैं। एक बार फिर से दिल्लीवासियों में तनाव की स्थिति देखने को मिल रही है और सबसे ज्यादा उन अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है, जिनके बच्चे छोटे हैं और वह स्कूल जा रहे हैं। बीते दो वर्षों से स्कूल नहीं खुले थे और अब कुछ राहत मिली ही थी कि एक बार फिर से संकट आ गया। ऐसे में अभिभावकों चिंता जायज भी है। दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने स्कूल बंद करने का फैसला नहीं लिया है। स्थिति अभी इतनी भयावह नही है, लेकिन हालात बिगड़ते देर नहीं लगती। लापरवाही भारी पड़ सकती है।

बहरहाल, अब शायद स्थिति यही बन रही है कि कोरोना काल में हमें जीना पड़ेगा। कहते हैं जिंदगी किसी के लिए नहीं रुकती। लेकिन आॅनलाइन क्लॉस से बच्चों की शिक्षा बहुत प्रभावित हुई है। दरअसल जो छोटी कक्षा में हैं-जैसे कि पहली से पांचवी तक तो ऐसे बच्चों के माता-पिता का चिंतित होना सही भी है। इतने छोटे बच्चों को सोशल डिस्टेंसिंग व अन्य नियम का पालन नहीं कर पाते। इसके अलावा अभिभावकों का कहना यह है|

कि यदि किसी के घर में कोरोना पेशेंट हुआ और उस बच्चे से स्कूल में पढ़ रहे बाकी बच्चों को हो गया तो सब प्रभावित हो सकते हैं। स्वाभाविक है कि छोटे बच्चों की इम्युनिटी बड़ों की अपेक्षा अधिक नहीं होती। यह भी है कि किसी भी लहर में बच्चे प्रभावित नहीं हुए, लेकिन ध्यान रखना जरूरी है। लोगों का सुझाव है कि कक्षा पांच तक के बच्चों के लिए स्कूल फिर से बंद कर दिये जाएं। कुछ लोगों ने तो अपने बच्चों को स्कूल जाना बंद करा दिया।

इसके विपरीत अधिकतर स्कूल प्रशासन का कहना है कि पिछले लगातार दो वर्ष को आॅनलाइन कक्षा से बच्चों की शिक्षा बहुत प्रभावित हुई है, क्योंकि अधिकतर बच्चों ने गंभीरता से कक्षा नहीं ली, जिसकी वजह से पढ़ाई में बहुत पिछड़ गए। उदाहरण के तौर पर तीसरी कक्षा में जो बच्चा था, वह बीते दो वर्षों में उतना योग्य नही हो पाया कि वह पांचवी कक्षा की शिक्षा के योग्य हो। लेकिन कक्षा पांच तक के बच्चे को फेल भी नहीं कर सकते, लेकिन उसको हाल ही की पढ़ाई व आगे उस को और ज्यादा समस्या आ सकती है।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि अधिकतर बच्चे घर पर उतनी मेहनत व लगन से नहीं पढ़ पाए, जितना स्कूल में पढ़ पाते हैं। मोबाइल में क्लॉस लेने के बहाने बच्चे गेम खेलते रहे या अन्य चीजों में लगे रहे और अपनी व्यस्तता के चलते अभिभावक ध्यान नहीं दे पाए। इसके अलावा स्कूल की ओर से यह भी कहा गया कि कोरोना के बाद से पूरे भारत के पहली से बारहवीं के बच्चों की नंबरों व ग्रेड की प्रतिशत में बहुत कमी आई है। बीते दो वर्षों में प्रैक्टिकल न होने की वजह से भी के प्रैक्टिकल वाले विषयों में विफल होना चिंताजनक हो गया। अब लोगों को कोरोना से राहत मिली तो फिर वही स्थिति बन रही है।

जो अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने का विरोध कर रहे हैं, उनके नजरिये को भी समझा जाए तो उनकी बात भी जायज लगती है। जिस तरह कोरोना का इलाज वयस्कों का होता है, वैसे बच्चों का होना असंभव है। पूरे भारत में यदि महानगरों की स्थिति पर चर्चा करें तो हालात बहुत खराब रहे हैं और आंकडे भी दिल्ली व मुंबई जैसे शहरों बहुत डराने वाले थे, इसलिए इन राज्यों की जनता का अधिक परेशान होना स्वाभाविक लगता है।

शिक्षाविदों के आधार पर यह माना जाता है कि यदि स्कूली शिक्षा मजबूत नहीं होगी तो आने भविष्य में अच्छे डॉक्टर, इंजिनियर, अध्यापक और देश का संचालित करने वाले लोगों की कमी आ जाएगी। कुछ अभिभावकों का कहना है कि घर में रहकर उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाए। वे डिप्रेशन के शिकार जरूर हो गए जो बेहद चिंताजनक मामला बन गया।

कुछ बच्चे आॅनलाइन क्लास की आड़ में अश्लील सामग्री देखने लगे थे। कुछ बच्चे इसका गलत रूप से शिकार भी हुए हैं। हर घटना के सिक्के की तरह दो पहलू होते हैं, लेकिन जिंदगी को सुरक्षा के साथ जीना भी जरूरी है तो इसलिए स्कूली बच्चों के लिए कुछ अलग से तरकीब सोचनी पडेगी। वो क्या होगी, यह सरकार की जिम्मेदारी है।

बीती मार्च को सरकार ने पहली बार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कोरोना वैक्सीन लगाने का अभियान शुरू किया था। तब से 15 से 18 वर्ष के बच्चों को टीके लगाए जा रहे हैं। इस कारण बड़े बच्चों के स्कूल खोलने में भी आसानी हुई थी। अब 12 वर्ष के बच्चों को भी टीका लगाने से छोटे बच्चों को भी स्कूल भेजने में कोई समस्या नहीं मानी जा रही और जिन बच्चों का जन्म वर्ष 2008, 2009 या 2010 में हुआ है, उन्हें टीके लगाने का अभियान चलाया जा रहा है।

लेकिन इसके बाद के वर्ष में किसी के लिए सरकार के पास कोई रणनीति नहीं हैं। स्पष्ट है कि छोटे बच्चों को लेकर स्वयं ही एहतियात बरतने होंगे। किसी के पास भी इतना बड़ा दिल नहीं है, जो अपने बच्चों पर रिस्क ले सके। अब सरकार व विभागों के सामने शिक्षा व सुरक्षा का जिम्मा है। देखना यह होगा कि किस नीति के तहत इस काम को अंजाम दिया जाएगा।


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