Monday, January 17, 2022
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अल्पसंख्यक अधिकारों पर संकट

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वर्ष 2020 में कुछ जिज्ञासु शोधकर्ताओं ने यह जानने का प्रयास किया कि 2006 में आई सच्चर कमेटी की सिफारिशों के 14 वर्ष पूर्ण होने के बाद मुस्लिम अल्पसंख्यकों की स्थिति में क्या परिवर्तन आया है। उनके द्वारा एकत्रित आंकड़े निराश करने वाले हैं। मुसलमानों की जनसंख्या देश की कुल आबादी का 14 प्रतिशत है किंतु लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व 4.9 प्रतिशत है। सिविल सेवाओं के 2019 के नतीजों में 829 सफल उम्मीदवारों में केवल 5 प्रतिशत मुसलमान थे। 28 राज्यों में कोई भी पुलिस प्रमुख या मुख्य सचिव मुसलमान नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के 33 जजों में मुस्लिम समुदाय का केवल एक जज था। आईआईटी, आईआईएम तथा एम्स की प्रशासनिक समिति में कोई भी मुसलमान नहीं था। लगभग यही स्थिति निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र की श्रेष्ठ कंपनियों और मीडिया हाउसों की थी-सर्वोच्च स्तर पर मुस्लिम प्रतिनिधित्व का नितांत अभाव था। विकास के हर पैमाने पर पिछड़े मुस्लिम समुदाय के लिए 2014 के बाद का समय बहुत कठिन रहा है। सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मुसलमानों के विरुद्ध संदेह और घृणा फैलाने का एक सुनियोजित अभियान जारी है।

अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की गिरती स्थिति पर चिंता जाहिर की है। दिसंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने एक बयान जारी कर कहा कि ‘हम इस बात से चिंतित हैं कि नया नागरिकता संशोधन कानून मूलभूत रूप से भेदभाव पर आधारित है। उत्पीड़ित समूहों को संरक्षण देने का उद्देश्य सराहनीय है किंतु नया कानून मुसलमानों को सुरक्षा प्रदान नहीं करता।’ ह्यूमन राइट्स वाच की ‘इंडिया: इवेंट्स आॅफ 2019’ शीर्षक रिपोर्ट के अनुसार- ‘अल्पसंख्यकों द्वारा गोमांस के लिए गायों को बेचने या उनकी हत्या करने की अफवाहों के बीच अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के साथ भाजपा से संबंध रखने वाले हिन्दू अतिवादी समूहों द्वारा भीड़ की हिंसा की घटनाएं वर्ष भर चलती रहीं।

मई 2015 से ऐसी घटनाओं में करीब 50 लोग मारे गए हैं जबकि लगभग 250 लोग घायल हुए हैं। मुसलमानों को पीटने और हिन्दू नारे लगाने हेतु विवश करने की घटनाएं भी हुई हैं। पुलिस इन अपराधों का सम्यक अन्वेषण करने में असफल रही। जांच प्रक्रिया को ठप रखा गया, प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई, गवाहों को डराने एवं परेशान करने के लिए उन पर आपराधिक मुकद्दमे कायम किए गए।’ जनवरी 2020 में यूएस स्टेट कांग्रेस ने धार्मिक उत्पीड़न पर सुनवाई की और भारत के नागरिकता कानून एवं नागरिकता के सत्यापन की प्रक्रिया पर चिंता जाहिर की। इसी माह यूरोपीय संसद में नागरिकता कानून से संबंधित एक जॉइंट मोशन पर चर्चा हुई जिसमें इसे विभेदकारी प्रकृति का और खतरनाक रूप से विभाजनकारी बताया गया था।

फरवरी 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने एक साक्षात्कार में कहा कि वे इस बात से चिंतित हैं कि विभेदकारी नागरिकता संशोधन कानून के कारण 20 लाख लोगों के सम्मुख -जिनमें बहुत से मुस्लिम मूल के हैं-राज्य विहीन होकर नागरिकता गंवाने का संकट पैदा हो गया है। साउथ एशिया स्टेट आॅफ माइनॉरिटीज रिपोर्ट 2020 के अनुसार मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए भारत एक खतरनाक एवं हिंसक क्षेत्र बन गया है।

फरवरी 2021 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने जम्मू कश्मीर की स्वायत्तता खत्म करने और नए कानून लागू करने पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इससे वहां की राजनीतिक प्रक्रिया में मुसलमानों की भागीदारी पहले जितनी नहीं रह जाएगी। फरवरी 2021 में ही ह्यूमन राइट्स वॉच की साउथ एशिया डायरेक्टर मीनाक्षी गांगुली ने कहा-सरकार न केवल मुसलमानों एवं अन्य अल्पसंख्यकों को हमलों से बचाने में नाकाम रही है बल्कि वह हमलावरों को राजनीतिक संरक्षण एवं सुरक्षा प्रदान कर रही है।

पिछले कुछ वर्षों में न्यायेतर हत्याओं में वृद्धि हुई है, जिन्हें एनकाउंटर किलिंग भी कहा जाता है। बहुत से मानवाधिकार संगठन इन एनकाउंटरों को फेक एनकाउंटर मानते रहे हैं। अनेक राजनीतिक दल सरकार पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि इन एनकाउंटरों में अल्पसंख्यक ज्यादा हताहत हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र के पांच मानवाधिकार विशेषज्ञों ने उत्तरप्रदेश में मार्च 2017 के बाद हुई ढेरों मुठभेड़ हत्याओं पर चिंता जाहिर की है।

यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन आॅन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम ने वर्ष 2021 की अपनी रिपोर्ट में लगातार भारत को रिलीजियस फ्रीडम ब्लैक लिस्ट में रखते हुए हमारे देश को “कंट्री फॉर पर्टिकुलर कंसर्न” की श्रेणी में रखा और कहा कि यहां धार्मिक स्वतंत्रता का षड्यंत्रपूर्वक हनन किया जा रहा है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की स्टेट आॅफ वर्ल्ड ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट 2020-21 में भारत के संदर्भ में कहा गया-धार्मिक अल्पसंख्यकों पर, कानून पर भरोसा न करने वाली एवं आत्मस्फूर्त दंड देने की इच्छुक भीड़ तथा पुलिस कर्मियों द्वारा किए गए हमलों एवं इनकी हत्याओं के विषय में व्यापक रूप से गैर जिम्मेदारी पूर्ण तथा इन्हें संरक्षण देने वाला रवैया सरकार द्वारा अपनाया गया। भारत सरकार द्वारा हाल ही में पारित कानून नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 के प्रावधानों की कसौटी पर भी खरे नहीं उतरते। 30 जुलाई 2018 को असम में प्रकाशित नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटीजन्स का सम्पूर्ण ड्राफ्ट, आईसीसीपीआर के अनुच्छेद 2(भेदभाव का निषेध),अनुच्छेद 7(अमानवीय व्यवहार से मुक्ति) तथा अनुच्छेद 14( मुकद्दमे की निष्पक्ष सुनवाई और स्वतंत्र न्यायपालिका विषयक अधिकार) का उल्लंघन करता है।

देश में अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा और घृणा फैलाने वाले भाषणों की बाढ़ सी आ गई है। एक निजी टेलीविजन चैनल द्वारा अप्रैल 2018 में किए गए अध्ययन के अनुसार अप्रैल 2014 से अप्रैल 2018 के बीच शीर्षस्थ नेताओं द्वारा घृणा और विभाजन को बढ़ावा देने वाले भाषणों में 500 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी अवधि में हेट स्पीच देने वाले 45 नेताओं में से केवल 6 को चेतावनी दी गई या फटकार लगाई गई या इन नेताओं द्वारा सार्वजनिक क्षमा याचना की गई। 45 में से 21 नेता ऐसे थे जिन्होंने एक से ज्यादा बार ऐसे घृणा फैलाने वाले भाषण दिए।

भारतीय दंड संहिता की धारा 153, 153(ए), 295(ए) तथा 505 का उपयोग भली प्रकार नहीं किया गया। रिप्रजेंटेशन आॅफ द पीपल एक्ट 1951 के सेक्शन 123(3ए) (जो चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर बाध्यकारी है) का प्रयोग भी उचित रीति से नहीं किया गया। हेट स्पीच आईसीसीपीआर के अनुच्छेद 20 का स्पष्ट उल्लंघन है। मुस्लिम समुदाय में भी सामाजिक पिछड़ापन है, धार्मिक कट्टरता है, अशिक्षा-अंधविश्वास और लैंगिक असमानता का बोलबाला है। इन कमजोरियों को दूर करने का काम भी मुस्लिम समाज के पढ़े लिखे और प्रगतिशील लोगों को करना होगा।


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