Friday, May 8, 2026
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आंबेडकर पर घड़ियाली आंसु

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07 2814 अक्तूबर 1956 को नागपुर में हिंदू धर्म को त्याग कर डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाते समय- ‘धम्मचक्र प्रवर्तन के दिन’ जो 22 प्रतिज्ञाऐं की थीं, उनमें से एक प्रतिज्ञा थी कि मैं सच बोलंूगा और अहिंसा के मार्ग पर चलूंगा। आज हास्यास्पद यह है कि अपने को आंबेडकर के विचारों का अनुयायी और उनका संरक्षक बताने की होड़ करने वाले राजनीतिक दल संसद परिसर में ही हिंसा पर आमादा हैं। इसे भारतीय संसद के इतिहास का काला दिन ही कहा जाएगा कि उसके प्रवेश द्वार पर भीतर न घुसने देने को लेकर कथित तौर पर धक्का-मुक्की हुई बतायी जा रही है।

25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में दिया गया आंबेडकर का ऐतिहासिक भाषण सामाजिक असमानता, जातिगत उत्पीड़न तथा तानाशाही के संभावित खतरों को लेकर ही था और उन्होंने भारतीयों से अनुरोध किया था कि वे ऐसी प्रवृत्तियों को छोड़ दें जिनसे लोकतान्त्रिक मूल्यों का क्षरण होता हो। उन्होंने उसी समय यह आशंका व्यक्त की थी कि यह संविधान उतना ही अच्छा रहेगा, जितने अच्छे लोगों के हाथों में यह रहेगा। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यदि इस संविधान के लागू होने के बाद भी चीजें गलत होती हैं, तो इसका यह मतलब नहीं होगा कि यह संविधान ही गलत है बल्कि यह मतलब होगा कि यह गलत हाथों में है।

आंबेडकर का हिन्दुत्व का अनुभव बहुत अपमानजनक था। उनके दु:ख का अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी भावावेश में नहीं बल्कि अपने पूर्ण बौद्धिक परिपक्वता के समय में 13 अक्तूबर 1935 को नासिक के येवला में उन्होंने घोषणा की थी कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू होकर मरूंगा नहीं। आज धर्म, जाति और हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने वाले लोग जब आंबेडकर की प्रशंसा के गीत गाते हैं तो एक जुगुप्सा सी होती है। आंबेडकर ने सामाजिक और आर्थिक समानता को आधार बनाकर संविधान में व्यवस्थाएं दीं, लेकिन बाद के दिनों में उन्होंने देखा कि यह आधार महज संविधान का खोखला पन्ना बनकर ही रह गया है। वे जन्म और विरासत से होने वाली असमानता को खत्म करने पर सर्वाधिक जोर देते थे लेकिन बाद के दिनों में उन्हें लगा कि यह असमानता खत्म करने की दिशा में सरकारी प्रयास नगण्य हैं।

आज केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी जब आंबेडकर की प्रशंसा करती है या भाजपा की मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जब कहता है कि उसके और आंबेडकर के विचारों में समानता है तो यह बहस का मुद्दा बन जाता है। असल में आंबेडकर सामाजिक समता पर जोर देते हैं तो संघ सामाजिक समरसता पर। दोनों में काफी फर्क है। समता का मतलब बराबरी है तो समरसता का मतलब मिलजुल कर रहने से है। बराबरी के बिना अगर मिलजुल कर रहना है तो वह किसी मजबूरी या दबाव से ही संभव हो सकता है।

आंबेडकर ने संघ को उसके स्थापना काल से ही देखा था। वर्ष 1923 में वे अपनी शिक्षा पूरी कर विदेश से लौटे और सन 1925 में संघ की स्थापना हुई और नागपुर इसका मुख्यालय बना। जैसा कि सभी जानते हैं संघ मनुस्मृति को अत्यधिक महत्त्व देता है। संघ के विरोधी अक्सर आरोप लगाते हैं कि मनुस्मृति ही संघ का संविधान है और संघ उसको देश का संविधान बनाना चाहता है। आंबेडकर मनुस्मृति को सामाजिक भेदभाव और छुआछूूत बढ़ाने का प्रतीक मानते थे और यह ध्यान देने वाली बात है कि उसी मनुस्मृति को आंबेडकर ने संघ की स्थापना के महज दो साल बाद वर्ष 1927 में नागपुर में ही सार्वजनिक रुप से जला कर अपना विरोध प्रकट किया था।

आंबेडकर जाति को लेकर होने वाली छुआछूत से सर्वाधिक आहत थे और अपने स्कूल के दिनों से लेकर व्यस्क होने तक इस अपमान को बार-बार झेला था। आज जिन्हें हम दलित कहते हैं पहले उनको घृणापूर्वक अछूत कहा जाता था और इस बात से आंबेडकर बहुत आहत होते थे। बौद्ध धर्म अपनाने से पहले वे सिख धर्म अपनाना चाहते थे लेकिन उन्होंने देखा कि वहां भी जातिगत समस्यायें विद्यमान हैं। यहां यह ध्यान रखना होगा कि आंबेडकर धर्म नहीं बदलना चाहते थे बल्कि वे जाति को खत्म करना चाहते थे जो कि हिंदू धर्म में रहते हुए उन्हें संभव नहीं लग रही थी।

आज कांग्रेस और भाजपा आंबेडकर पर कॉपीराइट लेने के फेर में हैं। भाजपा कहती है कि कांग्रेस ने अपने इतने लंबे शासनकाल में आंबेडकर को उचित महत्त्व ही नहीं दिया, उनका विरोध किया और उन्हें चुनाव हरा दिया था। और कांग्रेस कहती है कि आंबेडकर तो हिंदुत्व और संघ दोनों के घोर विरोधी थे। भाजपा जिस चुनाव की बात करती है, वह देश का पहला आम चुनाव था और उस वक्त आंबेडकर नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री भी थे। आंबेडकर की एक अपनी राजनीतिक पार्टी शेड्यूल कॉस्ट फेडरेशन थी, जिसके टिकट पर वे चुनाव लड़े थे और चाहते थे कि कांग्रेस उनके खिलाफ अपना प्रत्याशी न उतारे। पहले तो इस पर सहमति थी लेकिन आंबेडकर ने जब चुनावी रणनीति के तहत समाजवादियों से समझौता कर लिया तो कांग्रेस के महाराष्ट्र अध्यक्ष एस.के. पाटिल ने इससे चिढ़कर अपना उम्मीदवार उतार दिया, जिसने आंबेडकर को हरा दिया। हालांकि इसके दो साल बाद महाराष्ट्र के भंडारा में उपचुनाव हुआ। आंबेडकर उसमें भी मैदान में उतरे, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी से वह चुनाव भी हार गए। भाजपा इसी को आंबेडकर के प्रति कांग्रेस की भितरघात बताती है।

राजनीतिक दलों की वोट की भूख दिनोंदिन सनक की सीमा पार करती जा रही है। ऐसा लगता है कि आज देश में जो भी योजना बनती है या जो भी राजनीतिक-प्रशासनिक कार्य व्यापार होता है उसकी चिंता में वोट बैंक ही रहता है। सन 2011 के आंकड़ों के अनुसार देश में दलित और आदिवासी समुदाय की संयुक्त आबादी 25 प्रतिशत से अधिक है। यह एक बड़ा वोट बैंक है। यद्यपि यह आबादी देश भर में बिखरी हुई है, लेकिन बहुत सारे चुनाव क्षेत्रों में यह निर्णायक स्थिति में भी है। जाहिर है सभी राजनीतिक दलों की निगाह आंबेडकर के बहाने दलित वोटों पर जाल डालने की है।

वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा के हाथों सत्ता गंवाने के बाद अखिलेश यादव ने कहा था कि मुझे यह समझ में आ गया है कि यहां लोग समझाने पर नहीं, फुसलाने पर वोट देते हैं। आज भारतीय मतदाता और चुनावी व्यवस्था का यही कड़वा सच बन गया है। सारे राजनीतिक दलों में मानों इसी बात की होड़ सी लगी है कि मतदाताओं को कैसे फुसलाया जाए और जाहिर है कि जो सत्ता में होते हैं उनके पास मतदाताओं को फुसलाने के संसाधन और अवसर ज्यादा होते हैं।

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