Friday, May 8, 2026
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सीईओ कैंट के लिए आसान नहीं होगा सिंडिकेट से निपटना

  • कैंट अफसर ही नहीं बोर्ड के बडे असरदार सभासद भी हैं सिंडिकेट का हिस्सा
  • ध्वस्तीकरण के बाद भी बंगला 128 की बिक्री और अवैध निर्माण बता रहा है किसमें कितना है दम

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: अवैध बंगलों के खिलाफ कार्रवाई की हुंकार भरने वाले सीईओ कैंट नावेन्द्र नाथ के लिए बंगलों के सिंडिकेट से निपटना इतना आसान नहीं नजर आ रहा है जितना की दिखाई दे रहा है। अफसरों और स्टाफ की भारी भरकम फौज के होते हुए भी ओल्ड ग्रांट के भारत सरकार के बंगलों की जिस प्रकार से खरीद फरोख्त की जा रही है। उससे तो यही लगता है कि बंगलों का सिंडिकेट ही भारी पडेगा। यदि सीईओ इस सिंडिकेट की नाक में नकेल डालने में सफल हो गए तो यह भी कैंट बोर्ड के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया जाएगा।

अफसरों और सदस्यों का गठजोड़

बंगलों के जिस सिंडिकेट की बात की जा रही है उसको अपरोक्ष रूप से कैंट अफसरों व बोर्ड के सदस्यों का पूरा वरद हस्त हासिल है। इनकी मजबूत पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बंगले तो खुद बोर्ड के सदस्यों ने ही खरीद लिए हैं और इन दिनों इनमें धड़ल्ले से अवैध निर्माण जारी है। सब कुछ जानते हुए भी कोई कुछ नहीं कर पा रहा है।

हाईकोर्ट के स्टे बेमाने

जिन बंगलों की जिक्र यहां किया जा रहा है, उनमें से कुछ पर हाईकोर्ट का स्टे है, लेकिन बंगलों की खरीद फरोख्त के बाद मिलने वाले हिस्से के चलते हाईकोर्ट के स्टे को लागू कराने की जिन पर जिम्मेदारी है वो भी नींद में नजर आते हैं। ऐसे एक नहीं कई मामले हैं, जिनमें कोर्ट से स्टे है उसके बाद भी वहां अवैध निर्माण कर लिए गए।

तीन बार का ध्वस्तीकरण

रुड़की रोड जार्ज स्ट्रीट सरीखे बंगलों की यदि बात की जाए तो इस बंगले में अवैध निर्माण पर तीन बार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गयी। कार्रवाई को लेकर कितनी ईमानदारी बरती गयी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस बंगले में न केवल अवैध निर्माण हुआ बल्कि इस बंगले का एक बड़ा हिस्सा आबूलेन के एक भूमाफिया को बेच दिया गया है और वो भी अब अवैध निर्माण की तैयारी में लगा है। इसके लिए बोर्ड के कुछ भगवाधारी सदस्यों से बातचीत अंतिम चरण में है।

रिज्यूम और सील के बाद भी बन गयी शोरूम

आबूलेन स्थित बंगला 173 को दो बार रिज्यूम किए जाने के आदेश जारी हुए। सीईओ डीएन यादव व राजीव श्रीवास्तव ने आदेश दिए थे। इसको सील भी कर किया गया। कार्रवाई को करने वाले कितने गंभीर थे। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां भव्य शोरूम खडे कर दिए गए हैं। बंगला आज भी फाइलों में सील है।

बोर्ड के सदस्य भूमिका पर सवाल

आबूलेन बंगला 173 सरीखे दूसरे बंगलों की यदि बात की जाए तो इनमें बोर्ड के तमाम सदस्यों की भूमिका पर सवाल खडेÞ होते हैं। 173 के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर तमाम सदस्य बोर्ड के समाने अड़ गए। हालांकि सीईओ राजीव श्रीवास्तव कार्रवाई चाहते थे, लेकिन बोर्ड के सदस्यों के आगे उनकी एक नहीं चली।

हालांकि राजीव श्रीवास्तव के कार्रवाई पर अडे रहने के पीछे भी कहानी कुछ और ही बतायी जाती है। इसी प्रकार बीआई लाइन स्थित बंगलों की खरीद फरोख्त सरेआम की जा रही खरीद फरोख्त में बोर्ड के सदस्यों की भूमिका और कैंट अफसरों ने जिस प्रकार से चुप्पी साध ली है उससे इस बात की कम ही उम्मीद है कि नवागत सीईओ कैंट इस सिंडिकेट को तोड़ पाने में सफल हो सकेंगे।

सीईओ के तेवर से बोर्ड सदस्यों में बेचैनी

बोर्ड के सदस्यों से पहली मुलाकात में जिस प्रकार के तेवर बंगलों को लेकर सीईओ कैंट ने दिखाए हैं उसको लेकर बोर्ड के तमाम सदस्यों में भारी बेचैनी देखी जा रही है। यह बेचैनी उनकी बातचीत में भी साफ झलकती है, लेकिन फिलहाल वो इस मुददे पर अधिकृत रूप से कुछ भी कहने से कन्नी काट रहे हैं। माना जा रहा है कि बोर्ड के सदस्य अभी सीईओ के धार का पैनापन भांपने की कोशिश कर रहे हैं।

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