Sunday, July 21, 2024
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पैतृक संपत्ति में बेटियों से भेदभाव

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Nazariya 19


Share Singhहाल ही में विभिन्न विषयों एवं मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट से महत्वपूर्ण निर्णय और स्पष्टीकरण आए है। एक मामले में तो सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से यह स्प साफ करने के लिए कहा कि एनडीए, विशेषकर नौसेना एवं सैनिक स्कूलों में लड़कियों, महिलाओं की नियुक्ति-तैनाती में इतनी कम प्रतिशतता अथवा सीमित प्रतिनिधित्व क्यों है? देश के संविधान द्वारा प्रदत्त और उल्लेखित प्रावधानों तथा अधिकारों में, महिला तथा पुरुष को बराबर का दर्जा प्रदान किया गया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपेक्षित स्पष्टीकरण का जवाब क्या दिया है, यह अभी ज्ञात नहीं हुआ है।

महिला और पुरुषों में बराबरी का अधिकार विशेषकर पैतृक अथवा पिता की संपत्ति पर बेटा और बेटी को समान हकदार कहा या माना गया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह स्पष्टीकरण हिंदू उतराधिकार कानून के अन्तर्गत हिंदू महिलाओं और विधवाओं को संपत्ति अधिकारों से संबंधित था। विरासत में प्राप्त संपत्ति एवं पिता के अपने स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति में बेटा-बेटी का एक समान हक का प्रावधान है।

पितृसत्ता वाले समाज के लिए सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले बेटा और बेटी में पैतृक संपत्ति पर बराबर हक के लिए मार्ग दर्शन अथवा दिशा निर्देश दूरगामी परिणाम वाले हैं। उल्लेखनीय है कि संपत्ति पर समान अधिकार है, और इस प्रावधान को पहले से ही प्रयोग में लाया जाता है। परन्तु अधिकांश मामलों में भाई-बहन के आपसी रिश्ते तथा स्नेह सूत्र को बनाए रखने के लिए, बहनें अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं करते हुए पैतृक संपत्ति पर अपना अधिकार नहीं जताती हैं। लेकिन यदि कोई बेटी अपने पिता अथवा पैतृक संपत्ति पर अपना बराबर हिस्सा मांगती है, तो प्रचलित कानून एवं नियमनुसार उस संपत्ति पर अधिकार तथा किए गए दावे के अनुसार उसे अपना हिस्सा स्वाभाविक रूप से मिल जाता है।

लेकिन देश में कुछ क्षेत्र अथवा इलाके ऐसे भी हैं, जहां संविधान और सुप्रीमकोर्ट के द्वारा स्पष्ट उल्लेख, विवेचना के बावजूद, बेटी अथवा महिलाओं को पैतृक संपत्ति में कोई हिस्सा या हक नहीं मिलता है। ऐसे क्षेत्र अथवा मामलों में संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का नहीं, बल्कि समाज, क्षेत्र विशेष की परंपराएं, आम रीति-रिवाज ही मान्य होते हैं। हिमाचल प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे लाहुल-स्पिति एवं किन्नौर जिलों में पैतृक संपत्ति पर बेटी का कोई हक नहीं होता है।

इन जिलों में पिता द्वारा अर्जित अथवा पुश्तैनी संपत्ति पर केवल बेटे का ही अधिकार होता है। बेटा ही संपत्ति का उत्तराधिकारी होता है। विवाहित बेटी चाह कर भी कोई दावा नहीं कर सकती है। इसे रिवाज-ए-आम कहा जाता है। रिवाज-ए-आम प्राचीनकाल से प्रचलित विवाह, उत्तराधिकार, बंटवारा इत्यादि से संबंधित रिवाजों का संकलन है जो शताब्दियों से प्रचलन में है। लेकिन यदि कोई रजिस्टर्ड वसीयत करके बेटी को पैतृक संपत्ति में हिस्सा दे, तो अलग बात है।

हां, ऐसे मामलों में जहां किसी परिवार में केवल बेटी या बेटियां ही हों, ऐसी स्थिति में पैतृक अथवा पिता की संपत्ति पर बेटी का हक होता है। लेकिन यह केवल ऐसे मामलों में लागू होता है, जहां बेटा नहीं होता है। बौध धर्म बहुल क्षेत्र स्पिति में तो स्थिति और भी हैरतअंगेज है। इस क्षेत्र में प्रचलित स्थानीय रिवाजों के अनुसार किसी भी परिवार में घर का सबसे बड़ा बेटा ही केवल पिता अथवा पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी या हकदार होता है। यदि किसी परिवार में दो तीन-बेटे हों, तो केवल सबसे बड़े बेटे का ही जमीन- जायदाद पर अधिकार होता है। दो अन्य बेटों का किसी भी प्रकार की पैतृक संपत्ति पर कोई अघिकार नहीं होता है।

बड़ा बेटा ही घर का मुख्य बनता है। अन्य भाई या बहन उसके रहमोकरम पर जीते हैं। वे परिवार के सदस्य के तौर पर खेती-बाड़ी के काम में परिवार के मुखिया की सहायता करते हैं। सबसे बड़े बेटे से इतर, कुछ बेटे तो गोम्पार में लामा (संन्यासी) बन जाते हैं। बेटियों की शादी हो जाने पर वे दूसरे घर, यानी ससुराल में चली जाती हैं। लेकिन यदि किसी बेटी की शादी नहीं हुई हो, तो वह भी गोम्पा में चोम्मोू (संन्यासिन) बन जाती है। गोम्पा में इनके भरण- पोषण का खर्च बड़े बेटे द्वारा अथवा समाज, अनुयायियों द्वारा किए गए दान पर निर्भर रहता है।

यह अलग बात है कि अब शिक्षा के प्रचार-प्रसार और शिक्षित लोगों व समाज में जागरूकता के फलस्वगरूप परिवार के छोटे बेटे शासकीय सेवाओं में आ गए हैं। कुछ अपनी आजीविका हेतु अब अपना निजी कारोबार भी चलाते हैं। लेकिन शिक्षित होने के बावजूद, छोटे बेटों का आज भी पैतृक संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता है। बेटियों के बारे में तो सोच ही सकते हैं कि उनकी स्थिति कितनी दयनीय हो सकती है?

लाहोल-स्पिति एवं किन्नौर आदि जिलों में पैतृक संपत्ति पर बेटी का कोई अधिकार नहीं होना आश्चलर्यजनक तो है, परंतु सच्चाई यही है। इस स्थिति को बदलने अर्थात बेटी को भी पिता या पैतृक संपत्ति में बराबर का हक दिलाने हेतु कुछ सकारात्मनक सोच वाले लोगों ने इस विषमता, असमानता को समाप्ते करने के लिए देश के कानून का सहारा लिया। लंबी कानूनी लड़ाइयां लड़ीं। हिमाचल हाई कोर्ट ने अन्तत: बेटी को भी पिता अथवा पैतृक संपत्ति पर बराबर का अधिकार होने का अपना निर्णय दिया।

लेकिन कुछ लोगों को अदालत का यह फैसला रास नहीं आया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की हुई है।अब जब तक इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का कोई निर्णय नहीं आ जाता है, तब तक पैतृक संपत्ति में बेटी अथवा महिला का फिलहाल कोई अधिकार नहीं है। देश के अन्य भागों के आम लोगों को यह स्थिति अपने आप में विचित्र लग सकती है, लेकिन यह सत्य है।

शेर सिंह


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