Wednesday, May 20, 2026
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विनिवेश बना बिकवाली, फिर भी झोली खाली

NAZARIYA


भारत में विनिवेश हमेशा से ही विमर्श का विषय रहा है। विभिन्न परिस्थितियों में देश की माली हालत को देखते हुए विनिवेश के कई कारण रहे हैं। एक तो उन संस्थाओं का विनिवेश किया गया जो पूरी तरह से करदाता के ऊपर घाटा पैदा कर रही थीं और वे संस्थाएं घाटे से उबर पाने में सफल नहीं हो पा रहीं थी।

दूसरा विनिवेश अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और नीतिगत कारणों से किया गया। क्या आज यह दोनों परिस्थितियां उपस्थित हैं? अगर नहीं तो भारत की जनता के मन में घुमड़ता यह सवाल जायज लगता है कि आखिर विनिवेश जिसे अब खुद सरकार विक्रय कहने लगी है क्यों जरूरी है?

1990 में जब रूस का विघटन हुआ था, तब व्यापार में हमारी मुद्रा परिवर्तन एक्सचेंज उन्हीं के साथ जुड़ा था और इस कारण भारत को व्यापार में दिक्कतें आई ।1990 में ही खाड़ी युद्ध ने हमारी परिस्थितियां और विकराल कर दीं। तब भारत में विदेशी मुद्रा का भंडार मात्र 3 हफ्ते के आयात के लायक ही शेष था।

तत्कालीन चंद्रशेखर सरकार अपने वित्तीय दायित्व पूरा करने के लिए रुपये का अवमूल्यन करने के लिए विवश हुई और दो तरफा डेफिसिट की समस्या खड़ी हुई। चंद्रशेखर सरकार फरवरी में अपना बजट भी पेश नहीं कर सकी और भारत की बॉन्ड रेटिंग को मूडी ने एकदम गिरा दिया ।

विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने हमें सहायता देना बंद कर दिया । तब चंद्रशेखर सरकार को भुगतान संतुलन के लिए देश के सोने को गिरवी रखना पड़ा था। 1991-92 में जो सरकार बनी वह नरसिम्हा राव की सरकार थी।

आईएमएफ और विश्व बैंक से लोन लेने के लिए हमें स्ट्रक्चरल रिफॉर्म करने पड़े और इन हालात में भारत को विदेशी निवेश का रास्ता विनिवेश के रूप में खोलना पड़ा। राज्य की पब्लिक सेक्टर यूनिट्स में विनिवेश करना पड़ा। विनिवेश की इस प्रक्रिया को मजबूरन धारण करना हमारी विवशता थी। एयर इंडिया, बीएसएनएल, एमटीएनएल जबरदस्त घाटे में चल रहे थे। इसकी कीमत टैक्सपेयर को चुकानी पड़ रही थी।

अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने तो एक विनिवेश मंत्रालय का ही निर्माण कर डाला था, अरुण शौरी जिसके मंत्री थे। उस दौरान ज्यादातर सरकारी होटल्स बेच डाले गए। जिनके मूल्यांकन पर शिवसेना से इतना विवाद हुआ कि बाजपेयी को इस्तीफे की धमकी तक देनी पड़ी थी।

उसके बाद मनमोहन सरकार ने आते ही विनिवेश मंत्रालय को खतम कर दिया, इस दौरान बैंकिंग क्षेत्र में खूब भर्तियां हुईं और सरकारी बैकों का करोबार बढ़ा। नरेंद्र मोदी सरकार ने आते ही पुन: विनिवेश मंत्रालय तो नहीं बनाया किंतु बिकवाली के लिये ‘विनिवेश एवं सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग’ का निर्माण कर दिया।

इससे लगता है कि परिसंपत्तियों को निजी खिलाड़ियों के हाथों में देना भाजपा की नीति का हिस्सा है। शायद इसीलिए मुनाफा कमाने वाले संस्थान भी मोनोटाइज हो रहे हैं।

आज क्या परिस्थिति है, इसे कैसे समझें? सभी 257 पीएसयू का वित्तीय वर्ष 16-17 में शुद्ध मुनाफा 127602 करोड़ था जो 2015-16 के 114236 करोड़ के मुकाबले 11.7 फीसद अधिक था, जिससे जो घाटे में घाटा हो रहा था वह भी घटकर 25045 करोड़ तक रह गया था जो 2015 के 39758 करोड़ से 18.58 फीसदी कम है।

आज मात्र तेल क्षेत्र से ही सरकार ने लगभग 25 लाख करोड़ की कमाई की है। जीएसटी संग्रह बढ़ने का दावा खुद सरकार कर रही है। अर्थव्यवस्था में 20 फीसदी के उछाल की घोषणा सरकार ने ही कर दी है। तब मात्र 6 लाख करोड़ जुटाने के लिए लाभ में चल रहे संस्थानों की संपत्ति बेचने की आवश्यकता क्यों है? यह सवाल अब भी खड़ा हुआ है।

1991 से 2020 तक 30 साल में कुल 482709 करोड की परिसंपत्तियों का विनिवेश किया गया है। इसमें मोदी सरकार के कार्यकाल के 6 साल में ही 329917 करोड़ का विनिवेश हुआ है, जबकि 6 लाख करोड़ का विनिवेश मोनेटाइजेशन पाइपलाइन में प्रस्तावित है।

यानि इस विनिवेश के बाद मोदी कार्यकाल में कुल विनिवेश 929917 करोड़ हो जाएगा। यह समझना उचित ही होगा कि जीवन बीमा निगम की शुरुआत 1956 में मात्र 5 करोड़ की पूंजी से हुई थी, जिसकी आज 38 लाख करोड़ से अधिक मूल्य की संपत्तियां हैं। एक लाख 14 हजार कर्मचारी हैं और जिसका 2668 करोड़ से अधिक शुद्ध मुनाफा है।

2018 में ही उसने सरकार को 2610 करोड़ का डिविडेंट दिया है और उसके बाजार मूल्यांकन में 53214 करोड़ की वृद्धि हुई है। इसी तरह जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन को 1972 में 52 कंपनियों को राष्ट्रीयकृत कर मात्र 100 करोड़ रुपये से शुरू किया गया था, जिसकी कुल संपत्तियां ही आज एक लाख 16 हजार करोड़ से अधिक है। इसी तरह वीपीसीएल मुनाफा कमाने वाली कंपनी है।

जीवन बीमा निगम में सरकार की पूरी मालकियत है, जबकि जीआईसी में 86 फीसदी। क्या ये संस्थान देश पर भारी हैं? क्या यह फल देने वाले वृक्षों को काटना नहीं है?

1991 में विनिवेश की प्रक्रिया उन परिस्थितियों में शुरू हुई थी, जब चंद्रशेखर सरकार को देश का सोना गिरवी रखना पड़ा था। कोई भी नया ऋण लेने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तें मानने के लिए भारत को बाध्य होना पड़ा था। ऐसी परिस्थितियां आज नहीं हैं।

भारत सरकार जब विनिवेश से 6 लाख करोड़ जुटाना चाहती है और उसी काल में वह लालकिले से 110लाख करोड़ की योजनाओं की घोषणा भी कर देती है। यानि यह स्पष्ट है कि यह विनिवेश किसी वित्तीय दायित्व की पूर्ति के लिए नहीं किया जा रहा प्रतीत होता। न ही विनियोजन के उद्देश्य से। शायद मात्र निजीकरण की अवधारणा की हठधर्मी को पुष्ट करने के लिए ही ऐसा किया जा रहा हो।


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