Friday, May 22, 2026
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कांग्रेस को सहारा देती रही है द्रविड़ भूमि

Samvad


12 21भारत भूमि के निर्माण की प्रक्रिया गोंडवानालैंड के एक हिस्से से दक्षिण भारत के सृजन के साथ आरंभ हुई। उत्तर में हिमालय पर्वत और विशाल मैदान लाखों वर्षों के अंतराल पर टेथीस महासागर के नितल में उभार से निर्मित हुआ। तमिल अनुश्रुतियों एवं लोकगीतों में पृथ्वी पर मानव सभ्यता के प्रथम विकास का श्रेय 14000 वर्ष पूर्व जलमग्न हो चुके ‘कुमारी कंदम’ द्वीप को है। इस द्वीप के तमिल नागरिकों ने ही चीन, यूरोप, अफ्रीका में पहुंचकर वहां सभ्यताओं का विकास किया। हमारे देश में जब कभी समावेशी संस्कृति को खंडित करने की प्रवृत्ति बलवती हुई तब भारत को जोड़ने की प्रक्रिया दक्षिण से ही आरंभ हुई। प्राचीन कालखंड एवं मध्यकालीन जटिल हालातों में जब हमारी सांस्कृतिक गतिशीलता अवरुद्ध हुई, तब द्रविड़ भूमि से ही शंकराचार्य की आध्यात्मिक दिग्विजय एवं भक्ति आंदोलन प्रकट हुआ। शंकराचार्य और भक्ति आंदोलन ने समकालीन धार्मिक सांस्कृतिक जीवन के रूढ़िग्रस्त संस्कारों एवं प्रतिक्रियावादी तत्व को हटाकर संस्कृति में प्रगतिशील एवं मानववादी मूल्यों को स्थापित कर उसे नवजीवन प्रदान किया। सात सितंबर को कन्याकुमारी से आरंभ राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के राजनीतिक विरोधियों का दक्षिण भारत से यात्रा की शुरुआत पर तथाकथित प्रलाप उनकी ऐतिहासिक अज्ञानता का प्रतीक है। यह अकारण नहीं है कि ऋषि अगस्त्य ने भारत की जड़ों की तलाश में द्रविड़ अंचल को केंद्र बनाया और आर्य संस्कृति एवं तमिल संस्कृति के समन्वय का सफल प्रयास किया।

भारत की आत्मा से साक्षात्कार की प्रक्रिया में विवेकानंद ने भी अपना साधना स्थल कन्याकुमारी को ही बनाया। भारत की नियति से साक्षात्कार अथवा इसकी आत्मा के साथ संवाद की प्रक्रिया इस भारत भूमि के प्रस्थान बिंदु-कन्याकुमारी से ही शुरू हो सकती है। भारत यात्राओं का देश है। भगवान राम, महात्मा बुद्ध, शंकराचार्य एवं गुरु नानक आदि संतों की भ्रमणशील परंपरा से प्रेरणा लेकर महात्मा गांधी ने दांडी मार्च, हरिजन यात्रा से राजनीतिक यात्राओं को जनसंवाद एवं लोकतांत्रिक प्रतिरोध का माध्यम बनाया।

आजादी के बाद बिनोवा भावे, चंद्र्रशेखर आदि नेताओं ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। इस परंपरा में ही कन्याकुमारी से सात सितंबर को आरंभ हुई राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा 60 दिनों में द्रविड़ भूमि-तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में संपन्न हो गई। दमनकारी सत्ता एवं बाजार के विस्तारवादी दखल से हाशिए पर पहुंच चुकी देश की आवाम से संवाद एवं उनके बीच प्रवास करते हुए गुजरने वाले राहुल गांधी के इस तारीखी सफरनामें में स्वाभाविक आकर्षण पैदा हुआ। भारतीय इतिहास की एक विलक्षणता यह है कि विदेशी हमलावरों के समक्ष जब-जब उत्तर की केंद्रीय सत्ता ने घुटने टेक दिए तब दक्षिण प्रतिरोध की अपराजेय ढाल के रूप में खड़ा हुआ।

अतीत में बैक्टिरिया ग्रीक, शक, कुषाणों के हमलों को रोकने में मगध की सत्ता अक्षम सिद्ध हुई। उत्तर पश्चिम पर विदेशी शासन कायम हो गया तब दक्षिण में चेर,चोल, पांडय एवं सातवाहन राजाओं ने सफल प्रतिरक्षा के साथ-साथ महान संगम साहित्य का सृजन कर सांस्कृतिक स्तर पर तथा भारत -रोम व्यापार से आर्थिक स्तर पर आश्चर्यजनक रचनात्मकता प्रदर्शित की। उत्तर गुप्तयुग में हूणों के आक्रमण के समय भी उत्तर की केंद्रीय सत्ता परास्त हो गई।

वहीं पल्लव, चालुक्य और चोल राजा बिदेशी हमलावरों के लिए अपराजेय बने रहे। महान चोलों ने तो मालदीव, श्रीलंका, अंडमान, इंडोनेशिया पर गौरवपूर्ण विजय भी हासिल की। मध्यकाल के मुस्लिम हमलावरों की बाढ़ में उतर के राजपूत राज्य बह गए तब भी सल्तनत के दौर में विजयनगर साम्राज्य ने प्रतिरोध की मशाल को प्रज्वलित रखा। शक्तिशाली मुगलों के दौर में छत्रपति शिवाजी एवं महान पेशवाओं ने मुगल विजय रथ को रोक कर उनके ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। इतिहास की यह विलक्षणता कांग्रेस से भी जोड़ती है। संकटग्रस्त होने पर कांग्रेस को दक्षिण से सहारा मिलता आया है।

आपातकाल के बाद आम चुनाव में संजय गांधी और इंदिरा गांधी अपनी सीट हार चुकी थी, तब भी कांग्रेस की कुल 153 सीटों में 92 सीट दक्षिण से आई। 1978 के उपचुनाव में इंदिरा ने कर्नाटक के चिकमंगलूर से और 1980 के आम चुनाव में आंध्र प्रदेश के मेढक से चुनाव जीता। 2019 में राहुल गांधी अमेठी में शिकस्त खाते हैं तो केरल की वायनाड सीट से विजयी हुए और कांग्रेस की कुल 52 सीटों में 28 द्रविड़ भूमि के खाते से दर्ज हुर्इं। 129 लोकसभा सीट वाले इस क्षेत्र में कांग्रेस के सहयोगी क्षत्रपों की स्टालिन, वामपंथी संघ, कुमारस्वामी, चंद्रबाबू नायडू की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं।

किंतु इस यात्रा से कांग्रेस के गठबंधन के वैचारिक आधार मजबूत हुआ है। संवैधानिक नैतिकता से मुक्त सर्वोच्च संसाधन एवं शक्ति से लैस दिल्ली के हुक्मरान के बरअक्स जनता के बीच पैदल चल रहे राहुल गांधी की हालत ‘रावण रथी विरथ रघुवीरा’जैसी है। इस यात्रा से जुड़ रहे द्रविड़ जनता के आंखों में आंसू के दृश्य भी दिख रहे हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी ‘भारत दुर्दशा’ नाटक में देश की दुर्दशा पर क्षुब्ध होकर सामूहिक रुदन का आह्वान किया था।

यह रुदन हमारी सामूहिक कमजोरी की अभिव्यक्ति नहीं था। बल्कि नवजागरण की प्रस्तावना था। भारत जोड़ो यात्रा के आत्मीय संवाद ने वृहत्तर द्रविड़ आवाम के दिलों में राहुल गांधी की ‘बिरथ रघुबीरा’ की छवि स्थापित की है। यह छवि ही इस यात्रा को नैतिक और आध्यात्मिक यात्रा का स्वरूप देती है। जनता के दिलों में ‘विरथ रघुवीरा’ के छवि के बूते ही राहुल गांधी और उनकी यात्रा द्रविड़ भूमि पर अपना दाखिल खारिज दर्ज करा देती है।


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