Tuesday, April 21, 2026
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राष्ट्रपति चुनाव लोकसभा चुनाव की ड्रेस रिहर्सल !

Nazariya 1


Rajesh Maheshwariचुुनाव आयोग ने राष्ट्रपति चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर दिया है। देश के प्रथम नागरिक, सेनाओं के ‘सुप्रीम कमांडर’ और संवैधानिक प्रमुख का चुनाव बेहद अहम होता है। इस बार राजनीतिक रूप से ये चुनाव दिलचस्प भी होगा। वास्वत में राष्ट्रपति चुनाव से सत्तारूढ बीजेपी की भविष्य की राजनीति सामने आएगी। वहीं विपक्ष की राजनीतिक दशा और दिशा भी ये चुनाव तय करेगा। राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए का पलड़ा बिखरे विपक्ष के सामने भारी है। फिलहाल भाजपा-एनडीए को अभी अपने उम्मीदवार की घोषणा करनी है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन होगा? जानकारों के अनुसार 2014 के बाद से भाजपा वही कर रही है, जो किसी ने सोचा नहीं होगा। जैसे 2017 में अचानक से रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति और वैंकैया नायडू को उपराष्ट्रपति चुना गया। उस वक्त तक इन दोनों नाम पर कोई चर्चा नहीं थी। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो सकता है। वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश के दलित और उपराष्ट्रपति वैंकैया नायडू आंध्र प्रदेश के कायस्थ परिवार से आते हैं। जिस वक्त रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति बनाए गए थे, उस वक्त वह बिहार के राज्यपाल भी थे। मौजूदा राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद का कार्यकाल 25 जुलाई, 2022 को खत्म हो रहा है।

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक ऐसा संभव है कि इस बार भाजपा महादलित या किसी आदिवासी को देश के राष्ट्रपति या फिर उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के रूप में उतार सकती है। खासतौर पर दक्षिण के महादलित या आदिवासी चेहरे को यह मौका मिल सकता है। चर्चा ये भी है कि एक बार फिर से भाजपा किसी दलित चेहरे पर दांव लगा सकती है। इसमें कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत के नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है। मौजूदा समय भाजपा का पंजाब पर काफी फोकस है। किसान आंदोलन के बाद सिख समुदाय में भाजपा के प्रति नाराजगी बढ़ गई थी। ऐसे में संभव है कि सिख चेहरे को राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया जा सकता है। किसी मुस्लिम चेहरे को भी राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाए जाने के कयास लगाए जा रहे हैं।

सत्तारूढ़ भाजपा की अगुआई वाले एनडीए के पास कुल 10.79 लाख वोटों के आधे से थोड़ा कम यानी 5,26,420 है। उसे वाईएसआर कांग्रेस और बीजू जनता दल के सहयोग की दरकार है। पीएम नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को लेकर अंतिम फैसला लेना है, लेकिन इन दोनों क्षेत्रीय पार्टियों के सहयोग की भगवा दल को जरूरत होगी। अभी इन दोनों पार्टियों ने कोई संकेत तो नहीं दिए लेकिन पिछले दिनों वाईएसआर और ओडिशा के सीएम, दोनों नेताओं ने दिल्ली आकर मोदी से मुलाकात की थी। फिलहाल एनडीए को करीब 13,000 वोट कम पड़ रहे हैं। बीजेडी के पास 31 हजार से ज्यादा वोट हैं और वायएसआरसीपी के पास 43,000 से ज्यादा वोट हैं। ऐसे में इनमें से किसी एक का समर्थन भी एनडीए को निर्णायक स्थिति में पहुंचा देगा। विपक्ष की तुलना में भाजपा गठबंधन की स्थिति काफी मजबूत है।

यदि विपक्ष अप्रत्याशित तौर पर लामबंद होता है, तो उसकी चुनावी ताकत करीब 51 फीसदी है। चुनाव आयोग ने कुल वोट-मूल्य 10,80,131 घोषित किया है। जिस उम्मीदवार को 5.40 लाख से अधिक वोट-मूल्य मिलेगा, वही विजेता होगा। भाजपा-एनडीए इस चुनावी आंकड़े के ज्यादा करीब है। विपक्ष का एक ही उम्मीदवार होगा, अभी यह घोषित नहीं किया गया है और न ही ऐसे आसार पुख्ता हैं। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अगले महीने होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए एक बार फिर विपक्ष को लामबंद करने की कवायद शुरू की है। ममता ने इस बाबत 22 विपक्षी राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं को पत्र लिखकर उन्हें आगे की रणनीति तैयार करने के लिए 15 जून को दिल्ली में होने वाली बैठक में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है। इनमें गैर-भाजपा शासित राज्यों के ज्यादातर मुख्यमंत्री शामिल हैं। फिलहाल विपक्ष भी एकजुट नहीं है। बिखरती, टूटती कांग्रेस का दखल और दावा कम हुआ है, इसका एहसास पार्टी नेतृत्व को है, लिहाजा चयन-प्रक्रिया में कौन उम्मीदवार सामने आएगा, यह बिल्कुल अनिश्चित है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव विपक्षी एकता के प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वह कांग्रेस को हाशिए पर रखकर तय करना चाहते हैं। उनके अलावा, ममता बनर्जी, शरद पवार, एम. के. स्टालिन और अरविंद केजरीवाल भी महत्त्वपूर्ण विपक्षी नेता हैं। बेशक राष्ट्रपति चुनाव जीतना विपक्ष का फिलहाल मकसद न हो, लेकिन 2024 के आम चुनावों की ड्रेस रिहर्सल इसी चुनाव के जरिए की जा सकती है। राष्ट्रपति कोविंद ऐसी पार्टी और गठबंधन के प्रतिनिधि थे, जिनकी ताकत को केंद्र में कोई चुनौती नहीं है। राष्ट्रपति भवन की क्षमता और शक्ति तब दिलचस्प बन जाती है, जब राष्ट्रपति सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के विपरीत दूसरे पक्ष का चुना गया हो।

हमारे संघीय ढांचे में राष्ट्रपति सर्वशक्तिमान हैं, लेकिन उनकी ताकतों का इस्तेमाल प्रधानमंत्री और कैबिनेट करते हैं। संघीय ढांचे की व्यवस्था में राष्ट्रपति भवन ‘अपील का सर्वोच्च संस्थान’ होता है, बेशक निर्णय तत्कालीन सरकार के मुताबिक लेने पड़ते हैं। इस व्यवस्था में कुछ संशोधन किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति को कुछ विशेष कार्यकारी शक्तियां भी दी जानी चाहिए, बेशक वह अपना अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री से सलाह के बाद ही लें। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव का असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर तो दिखाई देगा ही वहीं देश की राजनीति को एक नयी दिशा भी प्रदान करेगा।


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