Wednesday, May 13, 2026
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सरकारी पाठशालाओं में ई-पाठशाला बन रही कागजी घोड़ा

  • ई-पाठशाला बनी अभिभावकों व शिक्षकों के लिए का जंजाल
  • शिक्षकों के साथ अभिभावक भी जिम्मेदार होगे

जनवाणी ब्यूरो |

बिजनौर: बेसिक शिक्षा विभाग की पाठशालाओं में ई पाठशाला काजी घोड़ा बन कर रह गई। यह अभिभावकों व शिक्षकों के जी का जंजाल बन गई।

कोरोना काल में बेसिक शिक्षा विभाग ने विद्यालय बन्द होने के बावजूद बच्चों की पढ़ाई को सुचारू रूप से चलाने के लिए ई-पाठशाला शुरू की थी। इसमें व्हाटसऐप पर ग्रुप बनाकर बच्चों को पढ़ाने का प्रयत्न किया गया जो काजी घोड़ा ही साबित हुआ।

क्योंकि सरकारी विद्यालयों मे पढ़ने वाले अधिकांश अभिभावक संसाधनहीन व कम पढ़े लिखे हैं। यही काऱण है कि सरकार इन विद्यालयों मे बच्चों को आकृर्षित करने के लिए मिड-डे मील, यूनीफार्म, जूते-मोजे व स्वेटर पाठ्य पुस्तकें आदि सभी निशुल्क दिया जाता है।

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फिर उत्साही महानिदेशक वीके आनन्द ने नयी योजना बनाते हुए दूरदर्शन व आकाशवाणी पर शैक्षिक कार्यक्रम दिखाये जाने लगे। लेकिन इससे भी कोई खास प्रभाव नही पड़ा। अब 21 सितम्बर से शुरू ई-पाठशाला के फेज दो में कुछ नयी व्यवस्था की गयी हैं।

अब जहां एक ओर शिक्षकों को सप्ताह में तीन दिन बच्चों के लिए पाठ्य सामग्री भेजी जायेगी। जिसका प्रयोग वह बच्चों को पढ़ानें में करेगें। साथ ही शिक्षकों के पढ़ाने के लिए समय साऱणी बना दी गयी है।

जिसमे प्राइमरी के लिए प्रात: 9 बजे से 11 बजे तक विषयवार समय सारणी बनायी गयी है इसी तरह जूनियर के लिए सुबह 9 बजे से 11:45 तक समय निर्धारित किया गया है। वहीं दूसरी ओर से संसाधनहीन अभिभावकों के लिए भी व्यवस्था की गयी है जिनके पास एड्रायड़ मोबाइल नहीं है।

उनके परिवार के पढ़े-लिखे किसी सदस्य को प्रत्येक सोमवार को विद्यालय में बुलाकर पूरे सप्ताह की पढ़ाई कैसे करानी है, उस बारे में समझाया जाएगा ताकि वे अपनें घर जाकर अपने बच्चों को पढ़ा सकें। इन व्यवस्थाओं को देखकर लगता है कि विभाग के उच्चाधिकारी या तो ग्रामीण परिवेश के प्रति अनजान हैं या जानबूझकर अनजान बने हुए हैं।

जिन संसाधनहीन अभिभावक को विद्यालय में बुलाकर पाठ्य योजना समझाने की बात की जा रही है न तो उनके पास मजदूरी के कारण समय है ना ही वे इतने पढ़े लिखे हैं कि घर जाकर अपने बच्चों को पढ़ा सके। दूसरी बात सोशल डिस्टेंसिगं को ध्यान में रखते हुए एक घंटे में केवल दस अभिभावक को बुलाने के निर्देश प्रधानाध्यापकों को दिये गये हैं।

मतलब यह हुआ कि सौ बच्चों के लिए विद्यालय को 10 घंटे खोलना होगा जो कि व्यावहारिक नही है और न ही अभिभावक इस प्रकार आये। कुल मिलाकर प्रयास तो किया गया परन्तु व्यवहारिक पक्षों की पूरी तरह अनदेखी करने के कारण इन्हे पूरा करना आसमान से तारे तोड़ने के बराबर है। उधर, बीएसए महेश चंद्र का कहना है कि उच्चाधिकारियों के आदेश का पालन कराया जा रहा है।

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