Saturday, January 29, 2022
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विफल सरकार, असफल विपक्ष

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यह सतह पर दिखने वाला खुला तथ्य है कि भारत की केंद्रीय सत्ता एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूम रही है, वह व्यक्ति नरेंद्र मोदी हैं। संसदीय लोकतंत्र का एक आधार स्तंभ कैबिनेट व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, कैबिनेट मंत्री कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) बन चुके हैं। स्वतंत्र व्यक्तित्व और अस्तित्व रखने वाले अधिकांश मंत्री मंत्रिमंडल से बाहर किए जा चुके हैं, जो बचे हैं, उनमें मुंह खोलने की हिम्मत नहीं है। करीब सभी पर्यवेक्षक इससे सहमत हैं कि नौकरशाही प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) का जी-हजूरी करने वाली संस्था बनकर रह गई है, सभी नौकरशाहों को उसी दिशा में सोचना और चलना है, जो प्रधानमंत्री का इशारा है, नहीं तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। एक राष्ट्र एवं समाज के रूप में यह कितना खतरनाक है और होगा इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है। मोदी सरकार की दूसरी सफलता कुछ कॉरपोरेट घरानों की संपत्ति में कई गुना वृद्धि। यह इस बात का संकेत है कि भारतीय पूंजीवाद पूरी तरह क्रोनी कैपिटिलिज्म में बदल चुका है, जहां एक वर्ग के रूप में पूरे पूंजीपति वर्ग की जगह कुछ पूंजीपतियों के हितों के लिए नीतियां बनाई और बिगाड़ी जा रही हैं और क्रियान्वित की जा रही हैं और वे पूंजीपति बदले में सत्ता में बने रहने में नरेंद्र मोदी की हर तरह से मदद कर रहे हैं।

क्रोनी कैपिटलिज्म व्यापक जन के आर्थिक हितों को तो छोड़िए, किसी देश के पूंजीवादी विकास के लिए भी बहुत घातक होता है। यानी जो दो सफलाएं भी दिख रही हैं, वे गहरे स्तर पर देश और समाज के लिए घातक हैं।

पिछले तीन दशकों में भारत की दूसरी उपलब्धि जीडीपी के संदर्भ में तीव्र आर्थिक विकास रहा है, इस तीव्र आर्थिक विकास ने दुनिया में भारत को एक देश के रूप में आर्थिक हैसियत प्रदान की और दुनिया के देश भारत की ओर देखने लगे। भारत की अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अंतराराष्ट्रीय मंचों पर हैसितयत बढ़ी और भारत को आर्थिक तौर पर उभरते शक्तिशाली देश के रूप में देखा जाने लगा।

देश के स्तर पर भी जीडीपी में विकास का फायदा रिसकर ही सही और आम जनता को भी कुछ मिला। करोड़ों की संख्या में लोग गरीबी रेखा से ऊपर गए और रोजगार का एक हद तक विस्तार हुआ, लेकिन मोदी के सत्ता संभालते ही आर्थिक विकास पर भी ग्रहण लग गया।

मूर्खतापूर्ण नोटबंदी और आपाधापी में लागू की गई जीएसटी ने चंद कापोर्रेटे घरानों को जो भी फायदा पहुंचाया हो, अनौपचारिक एवं असंगठित क्षेत्र के बड़े हिस्से को अर्थव्यवस्था से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

अर्थव्यवस्था से बाहर होने वालों में रोजगार शुदा लोगों के साथ बड़े पैमाने पर छोटे कारोबारी और व्यापारी भी शामिल थे। बेरोजगारी ने 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया। यह सब कुछ कोरोना-काल से पहले हो चुका था।

कोरोना काल से पहले ही लगातार आठ तिमाही से अर्थव्यवस्था गिर रही थी। कोरोना काल ने तो अर्थव्यवस्था रसातल में ही पहुंचा दी। इसमें मोदी सरकार द्वारा आपाधापी में किए गए लॉकडाउन की बड़ी भूमिका थी, जिसने मजदूरों के पलायन के ऐसे दृश्य दिखाए, जिससे भारत-पाकिस्तान बंटवारे की याद आ गई।

कोरोना काल में मोदी सरकार की अमानवीयता और बदइंतजामी ने दुनिया भर के लोगों की रूह को कंपा देने वाली तस्वीरों को देखने के लिए विवश किया और भारत की बड़े पैमाने पर बदनामी हुई।

विदेश नीति के मामले में भी मोदी सरकार पूरी तरह असफल रही, सरकार चाहे लाख छिपाए चीन भारत के कहे जाने वाले एक हिस्से पर नए सिरे से कब्जा कर लिया। भारत के पड़ासी देशों से भारत की तुलना में चीन के संबंध ज्यादा प्रगाढ़ हो चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की हैसियत की कमतरी का अंदाज नरेंद्र मोदी को भी लग चुका होगा, हाल की अमेरिका यात्रा ने उनको उनकी हैसियत बता दी और यह भी बता दिया कि उनकी वैश्विक हैसियत एक तेजी से आर्थिक तौर पर उभरते लोकतांत्रिक देश के नाते थी, न कि उनके व्यक्तिगत हैसियत के चलते। देश की आर्थिक-राजनीतिक हैसियत गिरेगी तो, प्रधानमंत्री की हैसियत बरकार नहीं रह सकती है।

जब सारे तथ्य चीख-चीख कर कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के खाते में पिछले सात वर्षों में विफलता ही विफलता है, तो प्रश्न यह उठता है कि मोदी की सत्ता को विपक्ष मजबूत चुनौती क्यों नहीं दे पा रहा है? इसमें विपक्ष की कौन सी कमजोरियां आड़े आर रही हैं और विपक्ष उसका कैसे मुकाबला कर सकता है?

संसदीय लोकतांत्रिक राजनीति में विपक्ष का पहला मतलब उन राजनीतिक दलों से होता है, जो चुनावी राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी करते हैं, दूसरा मतलब जनता के जनसंघर्षों एवं जनांदोलनों से होता है। जहां तक विपक्ष के रूप में जनता के जनसंघर्षों एवं जनांदोलनों से है, उस अर्थ में भाजपा को निरंतर मजबूत चुनौती मिल रही है।

जहां एक ओर जनसंघर्षों और जनांदोलनों के रूप भारतीय जन विभिन्न रूपों में केंद्र की मोदी सरकार को निरंतर चुनौती दे रहे हैं, लेकिन संसदीय जनतंत्र में राजनीतिक दल सत्ता संघर्ष में वास्तविक सत्ता के विकल्प होते हैं और देश का वर्तमान एवं भविष्य तय करते हैं।

इन अर्थों में कुछ प्रदेशों को छोड़ दें तो, राजनीतिक विपक्ष एक हद तक पंगु सा दिख रहा है, विशेषकर कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां और खुद को बहुजनों का प्रतिनिधि कहने वाली राजनीतिक पार्टियां। अगर नरेंद्र मोदी सरकार को निर्णायक चुनौती देने वाले दलों पर विचार करें, तो केरल और तमिलनाडु अंग्रिम पंक्ति में हैं, जहां से भाजपा-नरेंद्र को मोदी को वैचारिक, राजनीतिक और सांगठिनक तीनों स्तरों पर चुनौती मिल रही है और यहां विपक्ष के पास ऐसी शीर्ष नेतृत्वकारी शख्सियत भी हैं, जो नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत तौर पर क्षेत्रीय स्तर पर चुनौती दे रहे हैं।

विपक्षी पार्टियों में सबसे बदतर स्थिति राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस और उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों के रूप में बसपा और सपा की है और वामपंथी पार्टियों की है। एक तरह से इन पार्टियों ने उत्तर प्रदेश की जनता को योगी के रहमो-करम पर छोड़ दिया है।

सपा और बसपा दोनों नरम हिंदुत्व और तथाकथित अपरकॉस्ट को खुश करने की होड़ में लगे हैं। वे यह मानकर चल रहे हैं कि मुसलमानों और दलित-बहुजन का योगी से प्रताड़ित समूह उन्हीं के पास आएगा।

लोग आजीज आकर खुद-ब-खुद बिना कुछ किए उन्हें सत्ता सौंप देंगे, उन्हें कोई संघर्ष करने और जनता के सुख-दुख में निर्णायक तौर खड़े होने की जरूरत नहीं है।

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मोदी विरोधी राजनीतिक पार्टियों को भी छतरी के नीचे लाने की कोई कारगर पहलकदमी करते हुए नहीं दिखाई दे रहा है, जबकि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के चलते उसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी है।


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