Thursday, May 21, 2026
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आजादी के नायक मौलवी अहमदउल्लाह शाह

SAMVAD


05 18ऐ शहीदे मुल्को मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार/अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है। अजीमाबाद त्रपटनात्न के स्वतंत्रता सेनानी/शायर बिस्मिल अजीमाबादी (कुछ लोगों के अनुसार ऐतिहासिक काकोरी ऐक्शन के शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, जो अपने नामराशि अजीमाबादी की ‘सरफरोशी की तमन्ना’ के मुक्तकंठ प्रशंसक थे) की ये काव्यपंक्तियां 1857 में लड़े गए देश के पहले स्वतंत्रता सग्राम के हरदिलअजीज महानायक मौलवी अहमदउल्लाह शाह के व्यक्तित्व और कृतित्व के सिलसिले में इतनी मौजूं हैं कि लगता ही नहीं कि इन्हें उनकी शहादत के कई दशकों बाद रचा गया।

निस्संदेह, यह मौलवी (जिनका आज शहादत दिवस है) के अप्रतिम जीवट का करिश्मा ही था कि अवध के हिंदू-मुसलमान सितंबर, 1857 में दिल्ली के पतन के बाद भी कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते रहे और अंगे्रज लाख जतन करके भी उनकी एकता खंडित नहीं कर पाए। इसको लेकर मौलवी की हिम्मत का अंग्रेजों की महफिलों में ऐसा चर्चा हुआ कि वे उन्हें 1857 का फौलादी शेर कहने लगे। उनके अधिकारियों ने भी बारम्बार मौलवी की प्रशंसा की।

थॉमस सीटन ने उन्हें ‘अद्भुत क्षमताओं वाला नायक’ और ‘विद्रोहियों के बीच सबसे अच्छा सैनिक’ बताया। साथ ही उनके दृढ संकल्प, साहस, वीरता व संगठन शक्ति को अवध से अंग्रेजों के पांव उखड़ने का सबसे बड़ा कारण करार दिया। एक अन्य अंग्रेज अधिकारी जार्ज बूस मॉलसन ने अपनी छ: खंडों में विभाजित पुस्तक में मौलवी का कई बार जिक्र किया और लिखा कि जब तक अपने देश की जबरन छीन ली गई आजादी की वापसी के लिए लड़ने व शहीद होने वालों को देशभक्त कहने की परम्परा कायम रहेगी, मौलवी देशभक्त कहे जाएंगे।

मॉलसन के मुताबिक, ‘यह संदेह से परे है कि 1857 के विद्रोह के पीछे, मौलवी का दिमाग और प्रयास महत्वपूर्ण थे। विद्रोह के प्रसार के लिए रोटी और कमल के फेरों की योजना पर अमल के पीछे भी उनका ही दिमाग था। इस योजना के तहत छावनी-छावनी, गांव-गांव और शहर-शहर साधु-फकीरों, सिपाहियों व चौकीदारों के जरिये रोटी व कमल का फेरा लगाया जाता था।

फेरे के तहत जो रोटियां आती थीं, उन्हें खाकर वैसी ही दूसरी रोटियां बनवाकर दूसरी छावनियों, गांवों या शहरों को रवाना कर दी जाती थीं। जो लोग वे रोटियां खाते, जाति व धर्म के भेदभाव के बगैर वे मान लेते थे कि हम भी गदर में शामिल हो गए हैं। कहते हैं कि लड़ाइयों के दौरान मुकाबला कितना भी कांटे का हो, मौलवी अपनी नैतिकताओं का दामन नहीं छोड़ते थे।

न ही निर्दोषों, मासूमों और महिलाओं का खून बहाकर अपनी तलवार को कलंकित करते थे। सत्ता सुख से वे दूर-दूर ही रहते थे। इसलिए अवध पर बागियों के कब्जे के बाद वीरांगना बेगम हजरतमहल के अवयस्क बेटे बिरजिस कदर की ताजपोशी हुई तो मौलवी हुकूमत का हिस्सा नहीं बने। महल की राजनीति से दूर रहकर रेजीडेंसी में शरण लिए अंग्रेजों को मजा चखाने की जुगत करतें रहे।

हालांकि उसमें सफल नहीं हुए। इससे पहले फरवरी, 1857 में वे अपने लश्कर के साथ फैजाबाद में जमा हुए तो अंग्रेजों ने उन्हें हथियार डाल देने का आदेश दिया। उन्होंने उसे नहीं माना तो उनकी गिरफ्तारी के आदेश दे दिये। अवध की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने से मनाकर दिया तो 19 फरवरी को एक कडे मुकाबले में गोरी फौज ने न सिर्फ उन्हें पकड़ लिया, बल्कि जंजीरों में बांधकर घुमाया। फिर मुकदमे का नाटक कर फांसी की सजा सुना दी।

लेकिन आठ जून, 1857 को बगावत भड़की तो देसी फौज ने जेल पर हमला करके मौलवी को छुड़ा लिया। फिर अपना चीफ चुनकर उनकी आमद में तोपें दागीं। फिर तो मौलवी ने इस फौज की कमान संभाल ली और फैजाबाद को आजाद कराकर राजा मान सिंह को उसका शासक बनाया।

यह भी उनके हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रयत्नों के ही तहत था। आगे वे फैजाबाद के मोर्चे तक ही सीमित नहीं रहे। अवध के अन्य हिस्सों व आगरा सूबे में घूमघूम कर क्रांति की ज्वाला जगाते रहे। कई बार बागियों को पीछे हटना पड़ा तो मौलवी ने उन्हें छापामार लड़ाइयों की रणनीति भी प्रदान की। जानकारों के अनुसार अंग्रेज आमने-सामने की लड़ाइयों से कहीं ज्यादा इन छापामार मुकाबलों से आतंकित हुए।

15 जनवरी, 1858 को गोली से घायल होने के बावजूद मौलवी का मनोबल नहीं टूटा और 21 मार्च, 1858 को लखनऊ के पतन के बाद भी उन्होंने शहर के केन्द्र में गोरी सेना से दो-दो हाथ किये। वहां से निकले तो अंग्रेज छ: मील तक पीछा करके भी उनके पास नहीं फटक सके।

बगावत पूरी तरह विफल हो गई तो भी मौलवी निराश नहीं हुए। शाहजहांपुर को अपना केंद्र बनाकर अंग्रेजों की नाक में दम करते रहे। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने और मार देने की कई साजिशें रचीं मगर सबमें असफल रहे। बाद में उन्होंने उनका सिर लाने वाले को पचास हजार रुपये देनें का एलान कर दिया। पचास हजार रुपये 1858 के। इन्हीं के लालच में शाहजहांपुर जिले की पुवायां रियासत के विश्वासघाती राजा जगन्नाथ सिंह के भाई बलदेव सिंह ने 15 जून, 1858 को तब धोखे से गोली चलाकर मौलवी की जान ले ली, जब वे अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में मदद मांगने उसकी गढ़ी पर गए थे।

कहते हैं कि शाहजहांपुर के कलेक्टर ने उसे मौलवी के सिर की मुंहमांगी कीमत दी। फिर उनके सिर को शाहजहांपुर कोतवाली के फाटक पर लटकवा दिया ताकि लोग उसे देखें, आगे अंग्रेजों के खिलाफ सिर उठाने की जुर्रत न करें। मगर देशभक्त युवकों ने जान पर खेलकर मौलवी का सिर वहां से उतार लिया और पास के लोधीपुर गांव के एक छोर पर पूरी श्रद्धा व सम्मान के साथ दफन कर दिया।


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